महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में अश्व प्रजाति मददगार

महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में अश्व प्रजाति मददगार

बेहटा (शाहजहांपुर)। ऊषा को अब अपनी लड़की को पढ़ाने के लिए किसी के सहारे की ज़रुरत नहीं है, वो अपनी बचत से ही अपनी लड़की को अच्छी शिक्षा दिला रही हैं।

शाहजहांपुर जि़ला मुख्यालय से लगभग आठ किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में ददरौल ब्लॉक के बेहटा गाँव में रहने वाली ऊषा (29 वर्ष) बताती हैं, ''हम हर महीने 50 रुपए जमा करते हैं, इससे पूरे महीने में डेढ़ हज़ार रुपए जमा हो जाते हैं इन पैसों के आधे हिस्से से घोड़ा, खच्चर, गधे के प्रयोग में आने वाले नमक, खडिय़ा, घूंटा चौकल को तैयार करके उसे बेचते हैं।"

दरअसल ऊषा 10 सदस्यों वाले एक ऐसे स्वयं सहायता समूह का हिस्सा हैं, जो घोड़ा, गधा, खच्चर जैसे अश्व पशुओं की देखभाल, उनके खान-पान के लिए ज़रूरी वस्तुओं को तैयार करके कई बार बाज़ार और कई बार अपने ही क्षेत्र के अश्वपालकों को बेचता है। बिक्री से हुई कमाई का प्रयोग सभी सदस्य महिलाएं व्यक्तिगत बचत के साथ-साथ समूह के खाते में अपनी किश्त जमा करने के लिए भी करते हैं। 

गाँवों में अश्व पालन से जुड़े इस तरह के समूहों को बनवाकर उन्हें लगातार प्रोत्साहित करने का काम 'ब्रुक्स इंडिया' नाम की संस्था कर रही है। शाहजहांपुर जि़ला स्तर पर ब्रुक्स इंडिया का साथ दे रही है एक सर्वोदय गाँधी आश्रम संस्था। ऊषा व इन जैसे छह हज़ार से ज़्यादा अश्व पालक इस संस्था से जुड़े हैं।

''हमारी संस्था शाहजहांपुर जि़ले के 85 गाँव, 78 भट्टे  और 64 ताँगा स्टैंड पर काम कर रही है। गरीबी में अश्व पालन करने वाले लोगों की कमाई का ज़रिया अश्व ही होता है। अज्ञानता और जागरूकता न होने के कारण यह लोग पशु की देखभाल नहीं कर पाते हैं। जिससे इनका पशु मर जाता है। इसलिए हम महिलाओं का समूह बनाकर उनको अश्व पालन के सारे तरीके और खुद की आर्थिक स्थिति को कैसे सुधार जाए, से सिखाते हैं, ताकि वे आत्मनिर्भर हो सकें।" सर्वोदय गांधी आश्रम की प्रोग्राम डायरेक्टर उर्मिला श्रीवास्तव ने कहा।

वर्ष 2012 में जारी 19वीं ताज़ा पशुगणना के अनुसार देश में 11.30 लाख घोड़े, खच्चर व गधे हैं, जिनसे लाखों परिवारों की जीविका चलती है। समूह से जुड़ी रामदेवी (50 वर्ष) का भी पूरा खर्च, अश्व पालकों के लिए बनाई गई वस्तुओं से ही होता है। ''बाज़ार से सामान आधे दाम पर खरीद लेते हैं और एक किलो के पैकेट बनाकर 20 रुपए में आस-पास के गाँव में जहाँ लोग घोड़ा पालते हैं, उनको बेच देते हैं, इससे अच्छा पैसा मिल जाता है," रामदेवी ने कहा।

'सर्वोदय गांधी आश्रम' से जुड़ी हुई वेटेनरी असिस्टेंट ऊषा मिश्रा बताती हैं, ''ऐसे गाँवों का चयन किया जाता है जिन गाँवों में कम से कम 10 अश्वपालक ज़रूर हों। फिर उसी गाँव में हम समूह बनाते हैं और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें तमाम जानकारियां देते हैं। महिलाओं पर ध्यान इसलिए केंद्रित किया जाता है क्योंकि अश्वपालन में ज्यादातर गतिविधियां महिलाएं ही कर रही होती हैं।"

स्वयं सहायता समूह और अश्वपालन से जुड़ी नवीन जानकारियों के मेल ने महिलाओं के लिए आय के बहुत से नए आयाम खोल दिए हैं। बेहटा गाँव के समूह से जुड़ी एक महिला तो समूह से कजऱ् लेकर इस समय डेढ़ बीघा ज़मीन को गिरवी लेकर उसमे करबी घास बो रही हैं। ये महिला हैं बेहटा गाँव की घोड़ा पालक पुष्पा (30 वर्ष)। वे बताती हैं, ''पशु को जिस मौसम में जो भी हरा चारा खिलाना होता है उसको हम बो लेते हैं, यह चारा घोड़ा पालक बाज़ार में न खरीद कर हमसे खरीद लेते हैं। समूह के पैसे से ही ज़मीन गिरवी लेते हैं।"

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