मजबूत इरादों के सामने हारी शारीरिक अक्षमता

मजबूत इरादों के सामने हारी शारीरिक अक्षमता

प्रतापगढ़। अगर इरादे मजबूत हो तो कोई भी मुश्किल मंजिल तक पहुंचने में आड़े नहीं आती और इस बात को साबित किया है खुशबू (19 वर्ष) ने। शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद खुशबू ने न केवल अपनी पढ़ाई पूरी की बल्कि कौशल विकास योजना के तहत कम्प्यूटर भी सीख रही हैं।

जनपद प्रतापगढ़ मुख्यालय से 25 किमी पूरब बिबिया करनपुर गाँव में एक गरीब अनुसूचित परिवार में जन्म लेने वाली

खुशबू चार बहन व दो भाई में सबसे बड़ी है। पिता श्याम लाल परिवार चलाने के लिए गाँव में मेहनत मजदूरी करते हैं। खुशबू की मां निर्मला बताती हैं, ''खुशबू जब आठ वर्ष की थी एक दिन खेलते हुए पास में स्थित एक ट्यूबवेल पर चली गयी और वहीं उसका हाथ फंस गया, गाँव वालों ने किसी तरह उसे बचाया। किन्तु उसके दोनों हाथ उखड़ कर दूर जा गिरे। काफी इलाज के बाद खुशबू की जान तो बच गयी, किन्तु वह दोनों हाथ गंवा बैठी।"

इतना होने के बाद भी खुशबू ने हिम्मत नहीं हारी और पास के सोनाही बाजार के प्राथमिक विद्यालय में अपना दाखिला कराया। वहां से एक से पांच तक सफलतापूर्वक पढ़ाई करने के बाद आगे कक्षा छह से आठ तक की पढ़ाई गाँव के पूर्व माध्यमिक विद्यालय से पूरी की। कक्षा नौ से इण्टर तक की पढ़ाई दीवानगंज बाजार स्थित छविराजी इण्टर कालेज से की और अच्छे नम्बरों से पास किया। 

खुशबू के अध्यापक सुरेश का कहना है, ''खुशबू के दोनों हाथ नहीं होने से सभी परेशान थे कि यह स्कूल में लिखने का काम कैसे करेगी, किन्तु खुशबू ने अपने इच्छा शक्ति की बदौलत अपने पैरों के सहारे लेखांकन कार्य पूरा किया बल्कि बहुत अच्छी राइटिंग व सफाई के साथ लिखकर उसने सबको चौंका दिया।"

इण्टर के बाद परिवार के लोग उसे आगे पढऩे के लिए राजी नहीं थे, मगर खुशबू की जिद के आगे सभी को झुकना पड़ा और उसका नाम स्नातकोत्तर महाविद्यालय पट्टी में लिखाया गया, जहां वह आज बीए द्वितीय वर्ष की पढ़ाई कर रही है। पढ़ाई के साथ-साथ कौशल विकास योजना के अन्तर्गत कम्प्यूटर कोर्स भी कर रही है। कम्प्यूटर शिक्षक मनोज बताते हैं, ''खुशबू एक साहसी लड़की है। हाथ न होने के बाद भी उसे इसका अफसोस नहीं है वह कम्प्यूटर चलाने व लेखांकन का काम अपने पैरों से करती है।"

खुशबू बताती हैं, ''मेरे लिए शारीरिक रूप से अक्षम होना कोई मायने नहीं रखता, मेरे लिए सबसे बड़ी बाधा गरीबी है। कभी-कभी अपने परिवार की गरीबी को देखकर अपनी पढ़ाई छोडऩे का मन करता है। फिर दूसरे पल समाज को आइना दिखाने की प्रबल इच्छा कि एक अक्षम लड़की भी अपनी पहचान बना सकती है।"

खुशबू आगे बताती हैं, ''मैं बीएड करके शिक्षा के क्षेत्र मेंअपना कॅरियर बनाना चाहती हैं।"

खुशबू ने सरकार की कार्य प्रणाली पर भी सवाल उठाया कि आज तक उसे कोई सरकारी सहायता नहीं मिली। सामाजिक कार्यकर्ता अख़्तरुन ने प्रयास करके उसका विकलांग प्रमाण बनवाकर उसे विकलांग पेंशन योजना से जुड़वा दिया है। खुशबू पढ़ाई के साथ अपने घर का सारा काम, साफ-सफ़ाई, झाडू-बर्तन, कपड़े धुलना अपने पैरों से ही करती है।

रिपोर्टर - मो. सलीम खान

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