मन्दिर-मस्ज़िद नहीं हाशिम को अस्पताल चाहिए था

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लखनऊ। आयोध्या मामले में मस्जिद बनाने के पैरोकार रहे हाशिम अंसारी की बुधवार को 95 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई। हाशिम को यूं तो पूरे देश ने अयोध्या मामले पर बोलते सुना था और उनके बारे में एक सोच भी बनाई थी। लेकिन हाशिम अपने आखिरी समय में विवादित ज़मीन पर मंदिर-मस्जिद दोनों ही नहीं बनने देना चाहते थे। उनके मन में कुछ और ही ख़याल था।

पिछले लोकसभा चुनाव से पहले मार्च 2014 में अयोध्या शहर के छोटे से घर में रहने वाले बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी से मेरी मुलाकात उम्मीद के बिल्कुल उलट रही थी। बेबाकी से अपनी बात रखने वाले हाशिम अंसारी में उम्र के आखिरी पड़ाव में भी गजब का जोश था। मेरे मन में पूर्वाग्रह था कि कि वे सिर्फ मस्जिद बनाने की ही बात करेंगे। लेकिन जब बात शुरू हुई, तो वो बोले कि उन्हें न तो मंदिर चाहिए न ही मस्जिद। उन्होंने मुझसे विवादित स्थल पर अस्पताल या स्कूल बनाने की बात कर रहे थे। जहां हर धर्म के लोगों को लाभ मिले। 

उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर मसले को बातचीत से हल करने की वकालत करते हुए भी कहा, "ये राजनेता नहीं चाहते कि राम मंदिर मामला निपटे। हमें नहीं चाहिए मस्जिद, नहीं चाहिए मंदिर। अयोध्या को चाहिए विकास। जो कोई नहीं करना चाहता, सब राजनीति करना चाहते हैं।"

हाल के वर्षों में मंदिर-मस्जिद प्रकरण को राजनीतिक लाभ के लिए राजनेताओं द्वारा उपयोग करने से आहत हाशिम ने बताया था, "कोर्ट में हम बाबरी मस्जिद के पैरोकार थे, और महंत राम चंद्र परमहंस मंदिर मामले के। लेकिन हम लोग एक ही इक्के पर बैठ मुकदमे की तारीख पर जाते थे। हमारी उनसे अच्छी दोस्ती थी, रास्ते में साथ खाना भी खाते थे। लेकिन आज लोग हिन्दू-मुस्लिम को बांट रहे हैं।"  

हाशिम अंसारी और महंत परमहंस दीपावली और ईद पर एक दूसरे के घर भी जाते थे। लेकिन तारीख के दिन कोर्ट में एक दूसरे के सामने खड़े होते, वापस भी साथ-साथ आते। 

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