मरती पान की खेती को जिंदा रखे है एक किसान

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फूलपुर (इलाहाबाद)। स्वागत सत्कार का कभी अहम हिस्सा रहा पान का जायका अब खत्म होता जा रहा है। पूजा-पाठ से लेकर विवाह संस्कार तक में इसकी ज़रूरत पड़ती है लेकिन कम कीमत पर उत्पाद बिकने और मेहनत वाला काम होने की वजह से इसकी खेती कम होती जा रही है।

जिस इलाहाबाद ज़िले में एक समय पर पान की सम्मानजनक रकबे में खेती होती थी, वहां आज गिनती के किसान ही पान की खेती को अपनाए हैं, वो भी केवल पुश्तैनी काम होने की वजह से।

फूलपुर के रानीगंज मौजा अंतर्गत चिलोंडा गाँव में रहने वाले किसान कमलेशचंद्र (60 वर्ष) के पिता ने वर्षों पहले पान की खेती शुरू की थी उसके बाद पूरे गाँव में बड़े पैमाने पर यह काम शुरू हो गया था। आस-पास इसकी बड़ी मांग थी और आमदनी भी खूब होती थी। समय बीतने के साथ रोजी-रोटी और रोज़गार के सिलसिले में गाँव वालों के शहर की ओर पलायन करने से इसकी खेती खत्म सी हो गई। लेकिन कमलेश विरासत में मिली पान की खेती को अब भी पूरे उत्साह से कर रहे हैं। उनकी छह बिसवे के खेत में देशी पान की फसल दूर से ही देखी जा सकती है।

फागुन महीने में सूखे और बिखरे गवों पर जगह-जगह थोड़ी-थोड़ी दूर पर मिट्टी का टीला बनाया जाता है जिससे सिंचाई करते रहने से नमी के चलते सूखे गवों से दोबारा शाखाएं निकलने लगती हैं। गवे से पान के पत्ते के आकार में आने तक चार से पांच महीने लग जाते हैं। 

एक बार तुड़ाई शुरू होने के बाद कमलेश हर हफ्ते लगभग 100 ढोली (एक ढोली में 200 पान) पान तोड़ते हैं। एक ढोली की बाजार में कीमत 15-20 रुपए होती है।

पान की खेती के लिए सपाट के बजाय ऊंची-नीची जमीन उपयुक्त मानी जाती है। “लगभग बीस-तीस हजार रुपए की लागत से तैयार खेती का असली मजा बारिश के बाद ही मिलता है।” कमलेश आगे बताते हैं, “सामान्य हालत में तीस चालीस हज़ार रुपए का लाभ मिल जाता है। अच्छी पैदावार होने पर पचास हज़ार तक भी पहुंच जाते हैं।”

पान के लिए छायादार स्थान जरूरी होता है इसीलिए इसके चारों ओर सरपत और बांस से बाड़नुमा घेरा बना लिया जाता है और ऊपर से माड़ो बना देते हैं ताकि सूर्य की तेज रोशनी से फसल को कोई नुकसान न पहुंचे। इस खेती में भराई के बजाय पानी का छिड़काव किया जाता है। परिवार के लोग मिलकर रोजाना दिन में दो घण्टे कंधे पर घड़ा रखकर सिंचाई करते हैं। 

पान की सर्वाधिक खेती बंगाल के कलकत्ता और मध्य प्रदेश के सतना मैहर ज़िले में होती है। देशी और आकार में छोटे होने से इलाहाबाद के पान की मांग कम ही है। हालांकि जौनपुर की मण्डी में यह आसानी से बिक जाता है।

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