मथुरा हिंसा: खुफिया एजेंसियों ने लगातार किया था सतर्क

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लखनऊ। मथुरा में पुलिसवालों की जान नहीं जाती अगर समय रहते खुफिया रिपोर्ट पर कार्रवाई की गई होती। एलआईयू द्वारा पिछले एक साल से जवाहरबाग में इन उपद्रवियों की गतिविधियों की रिपोर्ट शासन के उच्च अधिकारियों को भेजी जा रही थी। यहां तक कि संघर्ष से एक दिन पहले भी एक जून को रिपोर्ट भेजी गई थी।

प्रदेश में खुफिया विभाग के एक उच्च अधिकारी ने ‘गाँव कनेक्शन’ से कहा, “हमने एक जून, 2016 को भी रिपोर्ट दी थी।

इन उपद्रवियों ने मार्च, 2014 को धरने के लिए स्थान मांगा था, जब वह तीसरे दिन नहीं हटे, तो हमारे इंटेलिजेंस के अधिकारी तो वहां घूमते ही रहते थे, तब से लगातार रिपोर्ट भेजी जा रही थी।”  मथुरा कांड के लिए खुफिया विभाग की लापरवाही बताई जा रही है।

इस पर खुफिया विभाग के उच्च अधिकारी ने कहा, “जब से विजयपाल सिंह तोमर ने हाईकोर्ट में पीआईएल दायर की, उसके बाद से हम इन दंगाइयों की पूरी रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को देते आ रहे थे। उपद्रवियों के पास मचान, बंदूक, सुतली बम, तलवार, सब मौजूद होने की बात कही गई थी।” 

इस बारे में मथुरा में तैनात खुफिया विभाग के एक अधिकारी ने अपनी नौकरी का हवाला देते हुए बस इतना कहा, “ मुंह खोलने पर नौकरी खतरे में पड़ जाएगी। बच्चे हैं।” 

कई बार पूछने पर डरते हुए बताया, “ एलआईयू पर जो आरोप लग रहा है कि वह फेल हो गई, वह गलत है। डीएम और एसएसपी को हर रिपोर्ट दी जाती थी। जब से जवाहर बाग में उपद्रवी कब्जा जमाए थे तब से रिपोर्ट दी जा रही है। असलहों से लेकर लाठी-डंडों तक, तलवार से लेकर गोला-बारूद तक सबकी रिपोर्ट दी गई।” 

उधर, इन आतंकियों के सरगना रामवृक्ष यादव का शव उसके परिजनों ने लेने से मना कर दिया। पुलिस उसके शव को लेकर रामवृक्ष के गाँव गाजीपुर जिले के रायपुर बाघपुर को भेजा था। 

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए शासनस्तर के खुफिया विभाग के अधिकारी ने कहा, “आप उच्च अधिकारियों से पूछिए कि एलआईयू इनपुट था कि नहीं। वो मना तो करें।”

रिपोर्टर - गणेशजी वर्मा

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