Nalin Chauhan

Nalin Chauhan

Nalin is literature enthusiast working with the gov of Delhi.


  • दिल्ली की देहरी : गुड़गांव से गुरूग्राम की ऐतिहासिक यात्रा  

    आज राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दिल्ली और गुड़गांव भौगोलिक निकटता के कारण एक दूसरे के सहोदर शहर कहे जा सकते हैं। जबकि गाजियाबाद और फरीदाबाद के भी इस क्षेत्र में होने के कारण यह जुड़ाव नहीं है। दोनों शहरों के संबंधों के इस सूत्र की कहानी इतिहास में छिपी है। दुनिया भर की आई टी कंपनियों में साइबर सिटी...

  • दिल्ली की देहरी में पढ़िए कैसी थी रस्किन बॉन्ड की दिल्ली

    प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक रस्किन बॉन्ड ने अपने लिखे गद्य साहित्य में आजादी से पहले अंग्रेजों की नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान से उजड़कर आए हिन्दू-सिख शरणार्थी आबादी से बसी बाहरी दिल्ली के इलाके सहित तत्कालीन जनजीवन और समाज का प्रमाणिक वर्णन किया है।रस्किन तब की नई दिल्ली के...

  • दिल्ली की देहरी : दिल्ली में बिजली आने की कहानी  

    देश में सबसे पहला बिजली उत्पादन कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लाई कॉरपोरेशन ने 1899 में शुरु किया था जबकि 20 वीं शताब्दी की शुरूआत में दिल्ली में बिजली पहुंची और राजनीतिक कारणों से शहर का महत्व बढ़ा।ये भी पढ़ें- दिल्ली की देहरी : जब दिल्ली वालों ने अपनाया, पाइप वाला पानी नारायणी गुप्ता की पुस्तक "दिल्ली...

  • दिल्ली में हिंदुओं की उच्च शिक्षा का पहला केंद्र: हिंदू कॉलेज  

    दिल्ली के हिंदुओं में 1860 के दशक के बीच में लगातार अकाल पड़ने के कारण ईसाई मिशनरियों की मतांतरण गतिविधियों के बढ़ने की गंभीर चिंता थी। खासकर मिशनरियों के गरीब परिवारों को भौतिक सहायता के बदले में मंतातरण करवाए जाने की आशंका थी। जबकि एक असली डर यह था कि मिशनरी संचालित शैक्षिक संस्थानों का मंतातरण के...

  • दिल्ली की देहरी : जब दिल्ली वालों ने अपनाया, पाइप वाला पानी 

    जब अंग्रेज सरकार ने पहली बार पाइप से आबादी वाले इलाकों में पानी को पहुंचाने की योजना बनाई तो उनके दिल में खटका था। सरकार इस बात को लेकर दुविधा में थी कि क्या यमुना के जल को शुद्व मानने वाले हिंदू, लोहे के पाइप में आने वाले पानी को सहजता से स्वीकार करेंगे। दूसरा, क्या वे इस पानी का मोल चुकाने के लिए...

  • दिल्ली का पहला महिला कॉलेज था, इंद्रप्रस्थ कॉलेज

    अंग्रेजी राज ने 1911 में कलकत्ता से बदलकर दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया। इस बदलाव के साथ दिल्ली के स्थानीय समाज की सोच में भी खासा परिवर्तन आया। इस परिवर्तन का प्रभाव यहां के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में भी दिखा। ऐसी परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में ही वर्ष 1924 में दिल्ली का पहला महिला कॉलेज,...

  • बीते समय का मील का पत्थर : कोस मीनार

    जब नई पीढ़ी शहर के इतिहास को बिसराते हुए, आधुनिकता की दौड़ में अपनी पुरातात्विक विरासत की अनदेखी करने लगें तो हालात बदतर हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ हो रहा है, दिल्ली की पुरातात्विक धरोहर कोस मीनारों के साथ जबकि ये मीनारें शहर की ऐतिहासिक विरासत की धरोहर हैं। 'कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी' जैसी...

  • दिल्ली की देहरी : शायर-शायरी की जुबानी, उर्दू की कहानी

    नलिन चौहानअमीर खुसरो को उर्दू भाषा का प्रथम कवि माना जाता है। पटियाली (अवध) में पैदा हुए खुसरो ने सबसे पहले उर्दू में कविताएं कीं। उर्दू की सबसे पहली गजल अमीर खुसरो की ही है। इस गजल की विशेषता यह है कि इसकी एक पंक्ति फारसी की है तो दूसरी उर्दू की।जहाल मस्कीं मकुन तगाफुल दुराय,नैना बनाय...

  • ‘दिल्ली की देहरी’ : ‘नई दिल्ली’ की बसने की कहानी 

    किसी भी भारतीय को यह बात जानकर हैरानी होगी कि आज की नई दिल्ली, किसी परंपरा के अनुसार अथवा स्वतंत्र भारत के राजनीतिक नेताओं की वजह से नहीं बल्कि एक सौ साल (वर्ष १९११) पहले आयोजित तीसरे दिल्ली दरबार में अंग्रेज़ सम्राट जार्ज पंचम की घोषणा के कारण देश की राजधानी बनी। इस दिल्ली दरबार की सर्वाधिक...

  • दिल्ली के गली-मोहल्ले के बदलते नामों का इतिहास

    दुनिया में बहुत कम शहर ऐसे हैं जो दिल्ली की तरह अपने दीर्घकालीन, अविच्छिन्न अस्तित्व के साथ प्रतिष्ठा का दावा कर सकें। दिल्ली के इतिहास का एक सिरा भारतीय महाकाव्य महाभारत के समय तक जाता है, जब पांडवों ने इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया था। तब से लेकर अब तक दिल्ली ने अनेक राजाओं और सुल्तानों सहित...

  • इतिहास का साहित्य, जायसी का पद्मावत

    हाल में ही हिंदी सिनेमा की रिलीज़ होने वाली फिल्म 'पद्मावती' को लेकर हुए विवाद के कारण अकारण ही मलिक मुहम्मद जायसी और उनकी कृति "पद्मावत" भी हिंदी साहित्य से इतर पुरे देश के लिए एक चर्चा-उत्सुकता का केंद्र बन गयी है। जायस के रहने वाले कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने 947 हिजरी में पद्मावत लिखा था। जायसी के...

  • सुभाष चंद्र बोस  पर विशेष : आज़ाद हिन्द फौज का दिल्ली मुक़दमा 

    सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन पर विशेष: अंग्रेज वायसराय वावेल हमेशा आज़ाद हिंद फौज को “एक डरपोक और कमजोर व्यक्तियों के समूह” बताता था।दूसरे विश्व युद्व के दौरान अंग्रेज थलसेना की 14 वीं टुकड़ी ने वर्ष 1943 में बर्मा को जापानी सेना से दोबारा जीत लिया। इस जीत के साथ सेना के साथ गए युद्ध संवाददाताओं के...

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