असहनीय पीड़ा थी, कहने से शरमाती थी...

असहनीय पीड़ा थी,  कहने से शरमाती थी...

आज विश्व कैंसर दिवस है। महिलाएँ कैंसर की गिरफ्त में तेजी से आती जा रही है। आँकड़े गंभीर चिंतनीय है। स्त्री के ज्यादातर वही अंग इस बीमारी के चपेट में आ रहे हैं जिन्हें वो हया या लाज के कारण छुपाती है। जिनका ज़िक्र आसानी से सार्वजनिकतौर पर कर नहीं सकती। इस शर्म के कारण वें काफी देर कर जाती है अपने साथ होने वाली कुछ विचित्र घटित घटनाओं के जिक्र में।

एक माँ के रूप में उसकी जरूरत बच्चों को बहुत ज्यादा होती है इसलिए झिझक छोङकर अपनी सेहत का ख्याल रखें...

पढ़िए भोपाल की वन्दना दवे की लिखी कैंसर महिलायों को सपर्पित एक कविता

असहनीय पीड़ा थी

कहने से शरमाती थी

बढ़ता रक्तस्राव

अश्रुओं में बह जाता था

कर घर के उपचार

काम में लग जाती थी

बगल की गाँठ

देखकर

अनदेखा कर देती थी

सीने पर लाल दानों को

अलइयाँ कहती थी

निप्पल से निकलते

पदार्थ को बच्चे का

दूध समझती थी

इस अनहोनी से वह

बिलकुल अंजानी सी थी

एक दिन आखिर

डरते डरते उसने

बतलाया

लेकिन

देर बहुत हो चुकी थी

मेहमान वो बस

कुछ ही दिनों की थी

(2)

वस्त्रों से अपने को

ढँकना है

छूपाना नहीं

दर्द कहीं भी हो

तोङ दो सहने

का सलीका

सबकुछ बतलाना है

दिल की गाँठ

बगल में आते

लगती नहीं है देर

अपने को हरदम

टटोलना है

खूबसूरती सिर्फ

चेहरे की नहीं

स्वच्छता हर अंगों की

जरूरी है

ये चुप्पी, ये शरम, ये हया

पल्लू के पीछे बढती

गाँठों के लिए नहीं है

झिझक तुम्हें तोङनी है

अपने को बचाना है!!!


Share it
Top