कांच वाले दफ्तरों में ही नहीं गांवों में महिलाएं कार्यस्थल पर यौन हिंसा का शिकार होती हैं...

Shrinkhala PandeyShrinkhala Pandey   6 Aug 2017 5:12 PM GMT

कांच वाले दफ्तरों में ही नहीं गांवों में महिलाएं कार्यस्थल पर यौन हिंसा का शिकार होती हैं...पुलिस तक इन महिलाओं की शिकायतें काफी कम पहुंचती है। ये फोटो प्रतीकात्मक है।

लखनऊ। अक्सर महिलाओं के साथ कार्यक्षेत्र पर हिंसा के मामले सामने आते हैं। जहां एक तरफ शहर के बड़े-बड़े ऑफिसों में महिलाएं इसे झेलती हैं वहीं दूसरी तरफ गाँवों में रहने वाली मजदूर महिलाएं और दूसरों के खेतों पर काम करने वाली औरतें भी इस यौन हिंसा का शिकार होती हैं।

मिर्जापुर के एक छोटे से गाँव में रहने वाली सुषमा (32वर्ष) को ये नहीं पता था कि दूसरों के घरों और खेतों में आधे हाथ के घूघंट के अंदर काम करना भी उनके लिए खतरनाक साबित होगा। सुषमा दो बच्चों की मां थीं और पति पत्नी दोनों मजदूर। तीन महीने पहले गाँव के ही सांमत परिवार में गेहूं, चावल बीनने और धोने का काम करने गई सुषमा को चार लोगों ने घर में कैदकर उनके साथ बलात्कार किया।

सुषमा के पति इस बारे में बताते हैं, ‘’ये केस होने के बाद एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई। लगातार धमकी मिलती रही कि अब बच्चों को भी नहीं छोडग़ें। पुलिस तक सुनने को तैयार नहीं थीं। एक संस्था की मदद से रिपोर्ट दर्ज हुई। अभी तक केस चल रहा है।”

कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ हुए यौन उत्पीडऩ के मामलों को अक्सर दबा दिया जाता है। लोकसभा सत्र के दौरान महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष भर में सिर्फ 526 यौन उत्पीडऩ के मामले सामने आए जिसमें 57 केस ऑफिस के और 469 अन्य कार्यसंबंधी क्षेत्रों से थे।

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महिला हिंसा से जुड़ी गैर सरकारी संस्था एपवा की ताहिरा हसन बताती हैं, “ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली महिला मजदूरों के साथ जब भी ऐसी घटना होती है तो वो जल्दी दर्ज नहीं होती। ऐसी कई केस हम देखते हें जिनमें महिलाएं जो दूसरों के खेतों में काम करती हैं या फिर घर पर काम करने आती हैं उनके साथ उनके मालिक या घर का कोई सदस्य ऐसा करता है और उसके बाद परिवार को मारने की धमकी देकर केस को दबाने की कोशिश करता है।”

वो आगे बताती हैं, ‘’ये महिलाएं कोई भड़कीले कपड़े नहीं पहनती बकायदा घूंघट में होती हैं फिर भी उनके साथ ऐसी घटनाएं होती हैं, इसमें किसका दोष माना जाएगा।”

ऐसे मामले पुलिस तक कम पहुंचते हैं उन्हें बीच में ही दबा दिया जाता है। हमारे पास अक्सर ऑफिस में किसी सहकर्मी या बॉस की बदसलूकी के मामले आते हैं।
रूमा यादव, महिला पुलिस, महिला थाना (हज़रतगंज)

ग्रामीण महिलाएं भी हो रही हैं इसकी शिकार।

वर्ष 2013 तक कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ को कोई विशेष अपराध नहीं माना जाता था। इसे भारतीय दंड संहिता 1860 कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न के मामले को एक अलग अपराध के रुप में सुलझाने के लिये कोई अलग धारा नहीं थी। केवल यौन उत्पीड़न को परिभाषित किया गया था और आईपीसी की धारा 354 के अन्तर्गत इसे दंडनीय अपराध बनाया गया था। इस तरह कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों में आज तक इसी धारा के तहत फैसला लिया जाता है।

ऐसे मामले पुलिस तक कम पहुंचते हैं

हजरतगंज महिला थाने की महिला पुलिस रूमा यादव बताती हैं, ‘’ऐसे मामले पुलिस तक कम पहुंचते हैं उन्हें बीच में ही दबा दिया जाता है। हमारे पास अक्सर ऑफिस में किसी सहकर्मी या बॉस की बदसलूकी के मामले आते हैं।” वो आगे बताती हैं कि हाल ही में अलीगंज से दो मामले ऑफिस से जुड़े बलात्कार की कोशिश के आए हैं। लेकिन अक्सर इन्हें ऑफिस के स्तर पर ही निपटा दिया जाता है जो बाद में कई बार बड़ी घटना का रूप भी लेते हैं।

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