टमाटर की खेती से लगातार नुकसान उठा रहीं भरतम्मा पोरेड्डी अब लोबिया की खेती से कर रही हैं कमाई

देश के सबसे बड़े टमाटर उत्पादक राज्य आंध्र प्रदेश में किसान अब सिर्फ टमाटर की खेती पर निर्भर रहने के बजाए कई तरह की सब्जियों की खेती करने लगे हैं, क्योंकि टमाटर की कीमतों में हमेशा उतार-चढ़ाव होता रहता है। 43 वर्षीय भारतम्मा पोरेड्डी भी पहले सिर्फ टमाटर की खेती किया करती थीं, लेकिन अब दूसरी फसलों की खेती करके लोगों के लिए प्रेरणा बन रही हैं।

Shivani GuptaShivani Gupta   25 Oct 2021 6:53 AM GMT

टमाटर की खेती से लगातार नुकसान उठा रहीं भरतम्मा पोरेड्डी अब लोबिया की खेती से कर रही हैं कमाई

आंध्र प्रदेश भारत का सबसे बड़ा टमाटर उत्पादक राज्य है, यहां पर देश में कुल पैदा होने टमाटर का 13 प्रतिशत योगदान है। हालांकि, यह एक ऐसी फसल भी है जो किसानों को बना या बिगाड़ सकती है। साल में कई बार ऐसा होता है जब किसानों को 2 रुपए किलो में टमाटर बेचना पड़ता है और और कभी-कभी, जैसे अब है, टमाटर की कीमतें कई शहरों में 50-90 रुपये प्रति किलो को पार कर गई हैं।

"टमाटर एक ऐसी फसल है, जिसकी कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव होता है। इससे लाभ कमाना लॉटरी के समान है। या तो आपको सब कुछ मिलता है या कुछ भी नहीं, "कादिरी स्थित संदीप चियेदु, क्षेत्रीय परियोजना समन्वयक, वासन, आंध्र प्रदेश ने गांव कनेक्शन को बताया। WASSAN (वाटरशेड सपोर्ट सर्विसेज एंड एक्टिविटीज नेटवर्क), एक राष्ट्रीय स्तर का संसाधन समर्थन संगठन, राज्य के चित्तूर और अनंतपुर जिलों में कृषि आय को बढ़ावा देने के लिए इन क्षेत्रों में मोनोक्रॉपिंग सिस्टम में विविधता लाने के लिए काम कर रहा है।

"चूंकि टमाटर की फसल से जुड़े उच्च जोखिम हैं, हम किसानों को टमाटर की मोनोक्रॉपिंग से अन्य फसलों जैसे लोबिया, लेट्यूस और बैगन में बदलने में मदद कर रहे हैं। और परिणाम उत्साहजनक हैं, "चियेदु ने कहा।

आंध्र प्रदेश के चित्तूर और अनंतपुर जिलों के कुछ किसानों ने एक बहुफसल मॉडल अपनाया है, जिसमें अपनी आय बढ़ाने के लिए मिश्रित फसलों की खेती करना शामिल है।

उदाहरण के लिए, एक पारंपरिक टमाटर किसान भरतम्मा पोरेड्डी ने टमाटर की जगह लोबिया की बुवाई शुरू की, जब उन्हें पिछले साल काफी नुकसान हुआ था।

अनंतपुर जिले के नल्लाचेरुवु मंडल के बांद्रेपल्ली गांव के निवासी 43 वर्षीय किसान ने तेलगू में गांव कनेक्शन को बताया, "पिछले साल हमारे यहां अच्छी बारिश हुई, यहां तक ​​कि बारिश पर निर्भर छोटे किसानों ने भी टमाटर उगाना शुरू कर दिया।"

"उत्पादन बहुत अधिक था और इसका मतलब था कि हमें अपनी फसल की कीमत नहीं मिलेंगी। मुझे पिछले साल अपने खेतों से टमाटर की पूरी फसल निकालनी पड़ी थी, "उन्होंने आगे कहा।

भारतम्मा के लिए यह एक कठोर सबक था कि वो एक ही फसल पर निर्भर न रहें। "मुझे भारी नुकसान हुआ। मैंने अपने खेत से टमाटर हटाने का फैसला किया और लोबिया उगाना शुरू कर दिया, "उन्होंने कहा।

भारतम्मा पोरेड्डी अपने लोबिया के खेत में काम करती हुई।

टमाटर से लेकर लोबिया तक

WASSAN के सहयोग से, इस साल जनवरी में, भरतम्मा ने अपने तीन एकड़ (1.21 हेक्टेयर) खेत में एक एकड़ (0.40 हेक्टेयर) में टमाटर के बजाय लोबिया उगाने का फैसला किया। जैसा कि उन्हें उम्मीद थी, फसल से उन्हें अच्छी आमदनी हुई।

उन्होंने पिछले महीने सितंबर में फसल काटी। इससे उन्हें 50,000 रुपये प्रति एकड़ के निवेश के मुकाबले लगभग 200,000 रुपये की आय हुई।

लोबिया को दो किस्मों में बेचा जाता था, एक ताजी सब्जी के रूप में और दूसरा इसे सुखाकर।

वह लगभग 3,500 किलोग्राम सब्जी लोबिया और इसके 500 किलोग्राम सूखे बीज बेचने में सफल रही। "मैंने लगभग पच्चीस रुपये प्रति किलो के हिसाब से हरी सब्जियां बेचीं। हालांकि, सूखे बीज लगभग साठ रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचे गए, "43वर्षीय किसान ने कहा।

भरतम्मा ने ही टमाटर की फसल को हटाने और लोबिया बोने के लिए पॉलीक्रॉप मॉडल अपनाने का फैसला किया था। हालांकि उनके पति चंद्रमोहन रेड्डी ने उनके इस फैसले से खुश नहीं थे।

लेकिन, वह उनकी इच्छा के विरुद्ध गई और उनके न रहने पर लोबिया की फसल की बुवाई की। "मेरे पति ने टमाटर निकालने के बाद करेला और तुरई उगाने पर जोर दिया। यदि यह करते तो इनपुट लागत अधिक होती। हम और कर्ज लेने की स्थिति में नहीं थे। इसलिए जब वह बाजार से बाहर थे तो मैंने लोबिया बोया, "भरतम्मा ने हंसते हुए कहा। "जब वह वापस आया तो उसने कुछ नहीं कहा," उसने कहा।

उनके अनुसार, बैगन और दूसरी सब्जियों के लिए प्रति एकड़ 1,00,000 रुपये से अधिक का निवेश होता। हालांकि, लोबिया के साथ उसे इस राशि का आधा निवेश करना पड़ा और एक अच्छा मुनाफा भी हुआ।

आंध्र के कुछ किसानों ने टमाटर की जगह लोबिया की बुवाई शुरू कर दी है।

टमाटर के आंसू

इस समय देश में टमाटर के दाम आसमान छू रहे हैं। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय द्वारा 18 अक्टूबर को साझा किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि देश के 175 शहरों में से 50 से अधिक शहरों में टमाटर की खुदरा कीमत 50 रुपये प्रति किलोग्राम से अधिक थी।

मेट्रो शहरों में कोलकाता में टमाटर 93 रुपये किलो, चेन्नई में 60 रुपये किलो, दिल्ली में 59 रुपये किलो और मुंबई में 53 रुपये किलो बिका।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में टमाटर 80 रुपये किलो बिक रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1 अक्टूबर से शहर में टमाटर की कीमतों में 50 फीसदी का उछाल आया है।

आंध्र प्रदेश जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में बेमौसम बारिश के कारण फसल के नुकसान के बीच आपूर्ति में गिरावट को जिम्मेदार ठहराया गया है। आने वाले दिनों में अभी और महंगे होने की उम्मीद की जा रही है।

देश के 50 से अधिक शहरों में टमाटर की खुदरा कीमत 50 रुपये प्रति किलोग्राम से अधिक थी। फोटो: पिक्साबे

हालांकि, टमाटर की फसलों की इतनी ऊंची कीमतों से किसानों को शायद ही कोई फायदा हो।

"बाजार में मौजूदा कीमत तीस किलो के कैरेट के लिए पंद्रह सौ है। लेकिन पिछले साल जब मैंने फसल बोई थी, तो तीस किलो का एक कैरेट सत्तर रुपये में बेचा जा रहा था, "भारतम्मा ने कहा। यह मौजूदा बाजार भाव से 21 गुना कम है।

इसके अलावा, उसे अपने गांव से लगभग 70 किलोमीटर दूर मदनपल्ली बाजार में कम से कम 4,000 रुपये का भाड़ा भी खर्च करना पड़ता था। फसल के लिए जो कि औने-पौने दामों पर बेची जाएगी।


पॉलीक्रॉप मॉडल को क्या बेहतर बनाता है?

राज्य में कम आय और किसानों के भारी नुकसान के बीच, WASSAN टमाटर की फसल में विविधता लाने के लिए एक पॉलीक्रॉप मॉडल लेकर आया। इस विधि में टमाटर के साथ पत्तेदार सब्जियां जैसे लेट्यूस, मेथी, धनिया, या लता जैसे लौकी, मूली और बैगन लगाए जाते हैं।

"मोनोक्रॉप के अपने नुकसान हैं, उदाहरण के लिए कीट और बीमारियों का खतरा अधिक है। इसके अलावा, बाजार दर जोखिम है, "हैदराबाद स्थित भाग्य लक्ष्मी, एसोसिएट डायरेक्टर, WASSAN, ने गांव कनेक्शन को बताया। "जबकि पॉलीक्रॉप मॉडल किसानों के लिए एक तरह से मददगार होता है, जब एक फसल से जोखिम की संभावना होती है तो दूसरी फसल से होने वाला लाभ मदद कर सकता है। यह बीमा होने जैसा है, "उसने कहा।

एसोसिएट डायरेक्टर ने आगे कहा, "टमाटर की एक ही फसल लेने के बजाय, [सिंचाई के लिए] समान या थोड़ी अधिक मात्रा में पानी के साथ, ये किसान अधिक शुद्ध आय प्राप्त करने के लिए पॉलीक्रॉप ले सकते हैं।"

बहुफसली खेती में किसानों को प्रशिक्षित करने के लिए वासन द्वारा चित्तूर जिले के पगडालावरी पल्ले गांव में एक ग्राम स्तरीय बैठक आयोजित की गई।

वासन की यह पहल पिछले साल शुरू हुई थी। भरतम्मा सहित 14 गांवों के 52 टमाटर किसान छोटे क्षेत्रों में टमाटर में विविधता लाने के लिए पॉलीक्रॉप मॉडल को आजमाने के लिए सहमत हुए। आशाजनक परिणामों के बाद, इस वर्ष 35 गांवों के 123 और किसानों ने पॉलीक्रॉप मॉडल को अपनाया है।

मासिक रिपोर्ट 2020 के अनुसार, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़े, 2019-20 में कुल 2,667.43 हजार मीट्रिक टन (दूसरे अग्रिम अनुमान) के साथ, आंध्र प्रदेश अखिल भारतीय उत्पादन का लगभग 13 प्रतिशत हिस्सा है।

लोबिया बेच कर चुकाया गया टमाटर का कर्ज

पिछले साल अगस्त में भरतम्मा ने अपने तीन एकड़ (1.2 हेक्टेयर) खेत में टमाटर की खेती के लिए 300,000 रुपये का कर्ज लिया था। टमाटर की कीमतों में गिरावट के कारण पूरी फसल बर्बाद हो गई।

हालांकि, पिछले महीने लोबिया की फसल बेचकर कमाए गए पैसे से 43 वर्षीया ने उस कर्ज का एक हिस्सा चुका दिया है। "मैंने अस्सी हजार रुपये का कर्ज चुकाया और एक और सीजन के लिए एक छोटी राशि का पुनर्निवेश किया। मुझे खुशी है कि मैंने टमाटर के बजाय लोबिया उगाने का फैसला किया, "भारतम्मा ने कहा।

मौसम में बदलाव की घटनाओं, फसल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और महामारी ने किसान परिवारों को कर्ज में धकेल दिया है।

10 सितंबर को जारी 'ग्रामीण भारत में परिवारों की कृषि परिवारों और भूमि जोतों की स्थिति, 2019' शीर्षक से एक रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि देश में आधे कृषि परिवार कर्ज में थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि बकाया कर्ज का 5.7 फीसदी गैर संस्थागत स्रोतों जैसे रिश्तेदारों और दोस्तों से लिया गया और 3.2 फीसदी कर्ज स्वयं सहायता समूहों जैसे संस्थागत स्रोतों से लिया गया।

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अनुवाद: संतोष कुमार


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