मिथक और मान्यताओं से हटकर ऐसे करें नवजात शिशु की देखभाल

मिथक और मान्यताओं से हटकर ऐसे करें नवजात शिशु की देखभालफोटो: गाँव कनेक्शन

लखनऊ। नवजात शिशु की देखभाल मां की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। कई बार छोटी मोटी गलतियों की वजह से बच्चे की जान भी जा सकती है। पिछले दो-तीन वर्षों में उत्तर प्रदेश में मातृ एवं शिशु मृत्यु में अपेक्षाकृत कमी आई है परन्तु देश के अन्य प्रदेशों की तुलना में अभी भी यह दर अधिक है।

वर्ष 2012 में मातृ मृत्यु 292 से घट कर 2013 में 285 प्रति एक लाख जीवित जन्म हो गई है और शिशु मृत्यु दर वर्ष दर 2013 में 50 से घट कर 2014 में 48 प्रति एक हज़ार जीवित जन्म हो गई है। प्रदेश में होने वाली इन मृत्युओं का मुख्य कारण नए व्यवहारों को अपनाने में समस्या, समुदाय में स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति उदासीन मानसिकता इत्यादि हैं, जबकि हम इन्हें घर पर किये जाने वाले छोटे छोटे प्रयासों द्वारा रोक सकते हैं जिनमें से कुछ अहम प्रयास निम्न हैं।

मिथक और मान्यताएं

समाज में व्याप्त कई प्रकार के मिथक व मान्याएं घर पर नवजात की सही प्रकार से देखभाल को सुनिश्चित करने में बाधक सिद्ध होती हैं। आमतौर पर मां को गर्भावस्था में ज्यादा खाना नहीं दिया जाता कि बच्चे का वजन बढ़ जाएगा तो सामान्य प्रसव करवाने में दिक्कत होगी, बच्चों को जन्म के फ़ौरन बाद नहला कर पुराने कपड़े पहनाना, यदि प्रसव घर पर हो तो नाल को हसिया से काटना, नाल को जल्दी ठीक करने के लिए उस पर तेल और हल्दी लगाना इत्यादि प्रमुख हैं जिससे बच्चे को ठंडा बुखार या हाइपोथर्मिया और संक्रमण होने की सम्भावाना बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त नवजात को मां का पहला गाढ़ा पीला दूध न पिलाने के पीछे यह मान्यता है कि वह गन्दा दूध है और उसे निकाल कर फेंक देना ही उचित है इसके अतिरिक्त कई जगहों पर बुआ द्वारा नवजात को पहला दूध पिलाने की प्रथा के कारण भी उसे पहले कुछ घंटों अथवा पहले एक-दो दिन मां के दूध के अतिरिक्त अन्य साधनों जैसे शहद ,घुट्टी इत्यादि पर निर्भर रहना पड़ता है जिससे त्वरित एवं केवल स्तनपान के व्यवहार को सुनिश्चित करने में सफलता नहीं मिलती।

तथ्य और आंकड़े

नवजात शिशुओं में होने वाली मृत्युओं का प्रमुख कारण उनमें होने वाला संक्रमण है। आंकड़े बताते हैं कि 33% नवजात में उनकी मृत्यु का कारण विभिन्न संक्रमण जैसे ठण्ड लगने के कारण होने वाला निमोनिया ,सेप्टिसीमिया तथा नाल में होने वाला संक्रमण है, इसके अतिरिक्त 35% नवजात शिशु समय से पूर्व (37 सप्ताह पूर्व) जन्म लेने के कारण पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाते एवं काल के ग्रास में चले जाते हैं तथा 20% शिशुओं को जन्म के बाद पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती जिससे उनका दम घुट जाता है इस स्तिथि को "एसफिक्सिया" कहते हैं। वर्ष 2014 के SRS के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में पांच वर्ष तक के बच्चों के मृत्यु दर को निम्न रूप से देखा जा सकता है। चूंकि नवजात शिशुओं की मृत्यु में एक बहुत बड़ा प्रतिशत उन शिशुओं का है जो कम वजन के होते एही अतः विशेषज्ञों के अनुसार 2.5 किलो से कम वाले शिशुओं को अन्य नवजातों की तुलना में अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है, जिससे उनमें होने वाले संक्रमण के प्रतिशत को भी रोका जा सके।

फोटो साभार: इंटरनेट

शिशु को कपड़े में लपेट कर रखना

मौसम के अनुसार नवजात को मोज़े, टोपी और दस्ताने पहनाएं। एक साफ़ एवं सूती कपड़े में नवजात को इस प्रकार लपेटें कि उसका पैर और सिर ढंका रहे।

नहलाने का सही समय

एक नवजात शिशु के लिए पेट के बाहर आने पर हर मौसम एक जैसा अर्थात ठंडा ही होता है इसलिए उसके शरीर की गर्माहट को बनाए रखना अत्यंत जरूरी है। इसके लिए जरूरी है कि जन्म के बाद नवजात को सात दिनों तक ना नहलाएं। ऐसा न होने की परिस्थिति में शिशु में ठंडा बुखार अथवा हैपोठेर्मिया होने के संभावना बढ़ जाती है।

क्या है केएमसी (त्वचा से त्वचा का संपर्क अर्थात कंगारू मदर केयर)

एक कंगारू अपने शरीर से अपने बच्चे को चिपका कर रखते हैं जिसे उसके बच्चे को गर्मी मिलती है, उसी प्रकार नवजात शिशु की मां भी शिशु को अपने सीने से लगा कर उसे गर्मी दे सकती है और बीमारी से बचा सकती है। इस विधि को कंगारू मदर केयर अथवा कंगारू देखभाल विधि (केएमसी) कहते हैं।

ध्यान देने वाली बातें

  • केएमसी स्वस्थ्य/सामान्य नवजात शिशु को हर पांच घंटे में कम से कम एक घंटा लगातार देना चाहिए।
  • सतमासा (2.5 किलो से कम वजन का समय से पहले जन्मा नवजात शिशु) नवजात शिशु को पूरे दिन लगातार केएमसी देना चाहिए।
  • नवजात शिशु को केएमसी मां अथवा परिवार का कोई भी व्यस्क सदस्य भी दे सकता है परन्तु जिसे किसी प्रकार का संक्रमण ना हो।

केएमसी से मां को क्या फायदा होगा

  • के.एम.सी देने से मां की कन्हर(प्लेसेंटा)जल्दी बाहर आ जाता है।
  • बच्चे को सीने से लगाने से मां का दूध जल्दी उतरता है।
  • के.एम.सी. से नवजात शिशु को क्या फायदा होगा।
  • नवजात शिशु स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है।
  • शिशु का वजन बढ़ता है और शारीरिक विकास बेहतर हो जाता है।
  • बच्चा चौंकता नहीं है क्योंकि वह अकेले नहीं रहता और कम रोता है।
  • मां एवं बच्चे के बीच मानसिक एवं भावनात्मक जुड़ाव बढ़ता है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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