"इतने जुर्म, धमकियों और मुश्किलों के बाद हमने अपने अंदर से मौत का डर निकाल दिया है"

"मुझे बिना किसी गलती के गिरफ्तार करने के बाद दंतेवाड़ा पुलिस स्टेशन में मेरा रेप किया गया और मेरे गुप्तांग में पत्थर डाल दिए गए। इतना ही नहीं, मेरे कपड़े उतार कर मुझे बिजली के झटके तक दिए जाते थे ताकी मैं ये कबूल लूं कि मेरे नक्सलवादियों से सम्बन्ध हैं," सोनी सोरी बताती हैं।

Jigyasa MishraJigyasa Mishra   19 Nov 2018 3:51 PM GMT

इतने जुर्म, धमकियों और मुश्किलों के बाद हमने अपने अंदर से मौत का डर निकाल दिया है

लखनऊ। मेला घूमने गयी महज़ 15 साल की आदिवासी बच्ची, हिडमे को पुलिस ने मार-पीट कर उठा लिया और आठ साल तक बिना किसी ज़ुर्म या शिकायत के उसे छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जेलों में ले जाकर मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करती रही। इन आठ सालों में छत्तीसगढ़ पुलिस के हैवानियत की हद यहाँ तक बढ़ चुकी थी कि बच्ची के साथ अप्राकृतिक तरीकों से शारीरिक सम्बन्ध बनाने के बाद, मार-मार कर उसका गर्भाशय भी गिरा दिया गया। "मेरा शरीर मार खा-खा कर दोगुने वज़न का हो गया था, रीड़ की हड्डी तोड़ दी गयी थी और बस मौत ही मेरी एक ख्वाहिश बची थी," वो बताती है।

बचपन, जवानी और परिवार खोने के बाद तीन साल पहले बा-इज़्ज़त रिहा हुई छत्तीसगढ़ की आदिवासी हिडमे कवासी जब अपनी यह आपबीती बताती हैं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

(अब) हिडमे की साथी, छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाके में रहने वाली सोनी सोरी एक आदिवासी शिक्षक का काम कर रही थी जब उनकी ज़िंदगी बिना आगाह किये पलट गयी थी। सोनी को छत्तीसगढ़ पुलिस ने माओवादियों से सम्बन्ध बनाने का इल्ज़ाम लगाकर, 2011 में गिरफ़्तार किया था जिसके बाद उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। "मुझे बिना किसी गलती के गिरफ्तार करने के बाद दंतेवाड़ा पुलिस स्टेशन में मेरा रेप किया गया और मेरे गुप्तांग में पत्थर डाल दिए गए। इतना ही नहीं, मेरे कपड़े उतार कर मुझे बिजली के झटके तक दिए जाते थे ताकी मैं ये कबूल लूं कि मेरे नक्सलवादियों से सम्बन्ध हैं," सोनी सोरी बताती हैं।


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महिला मानवाधिकार के लिए कार्य कर रही संस्था आली के 20 वर्ष पूरे होने पर आयोजित चर्चा सत्र में सोनी और हिडमे के मामलों के अलावा कई और ऐसे किस्से और उनको सुलझाने में आने वाली दिक्कतों पर चर्चा में ऐसे कई तथ्य सामने आये जो कानून पर बड़ा सवाल खड़ा करते हैं।

हिडमे और सोनी दंतेवाड़ा जेल में मिले थे जहाँ हिडमे पहले से मौजूद थीं। "मुझे लातों से जेल में डाला गया था, मैं चलने के लायक नहीं थी। हिडमे ने मुझसे पुछा दीदी आप कौन हो, इसने मेरी बहुत सेवा की," वो आगे बताती हैं।

हाल ही में आये रिपोर्ट 'ट्राइबल हेल्थ इन इंडिया' के अनुसार भारत में 10 करोड़ 40 लाख आदिवासी रहते हैं जो राष्ट्र के समूचे जनसँख्या का 8.6 प्रतिशत हिस्सा हैं और इन सब की अलग समस्याएं व चुनौतियाँ हैं।

त्रिपुरा के ग्रामीण इलाकों में रिसर्च कर रही एक वकील रोमिता रियान बताती हैं कि जब वह एक बलात्कार पीड़िता का केस दर्ज़ करवाने अपने गाँव हपैआ पारा पुलिस स्टेशन गयीं और एफआईआर लिखने को कहा तो पुलिस वाले ने बिना इनके और पीड़िता की ओर देखे "अंग्रेजी नहीं, बांग्ला में बात करो" कहा। जवाब में रोमिता ने बोला, "अंग्रेज़ी ऑफिसियल लैंग्वेज है इसके बावजूद भी आपको यदि आपको समझने में समस्या हो रही हो तो अपने लिए ट्रांसलेटर बुलवा लें," जिसके बाद एफआईआर तो लिख ली गयी लेकिन आदिवासियों के प्रति रवैये का अंदाज़ लगा सकते हैं।

रोमिता रियांग त्रिपुरा के रिआंग आदिवासी जनजाति से हैं।

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पैनल चर्चा में उपस्थित आली की ट्रस्टी सीमा मिश्रा इन आदिवासी महिलाओं की मदद के लिए सामने आने वाले वकीलों की दिक्कतों के बारे में बताते हुए कहती हैं, "सरकारी रणनीति के तहत मजदूरों और ग्रामीण लोगों के लिए काम करने वाली वकील रेखा भरद्वाज को झूठे केस में फंसा कर बेबुनियादी इलज़ाम लगाया गया है जो वकीलों के लिए भी आम समस्या है।"

चर्चा में मजूद चेन्नई की वरिष्ठ वकील गीता कहती हैं, "यौनिक हिंसा के मामलों में अक्सर यह भी एक बड़ी दिक्कत होती है कि केस रिकॉर्ड करने के वक़्त मामले को फॉर ग्रांटेड लेते हुए निपटाते हुए, बिना बारीकी जानकारी के लिख दिया जाता है और महीनों, सालों बाद जब हियरिंग होती है तो पीड़िता को तो आधी बातें, जो स्टेटमेंट में लिखी गयी थी, या तो याद नहीं रहती या फिर एकदम से मेल नहीं खाती जो एक नकारात्मक प्रभाव डालता है।"

सोनी आगे कहती हैं, "इतने जुर्म, धमकियों और मुश्किलों के बाद अब हमने अपने अंदर से मौत का डर निकाल दिया है और बहुत ताकतवर हो गए हैं। न जाने इतनी ताकत कहाँ से आयी!"

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