अपनी मर्जी का विषय चुनना लड़कियों के लिए अभी भी बना है चुनौती

अपनी मर्जी का विषय चुनना लड़कियों के लिए अभी भी बना है चुनौतीग्रामीण लड़कियों के लिए मनपसंद विषय पढ़ना चुनौती।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। आजादी के भले ही 70 वर्ष पूरे हो गए हों पर ग्रामीण क्षेत्र में लड़कियों की स्थिति अभी भी नहीं सुधरी है, आज भी उन्हें अपने मनपसंद विषय पढ़ने की आजादी नहीं है। इन्हें कौन से विषय से आगे की पढ़ाई करनी है ये इनके परिवार वाले तय करते हैं।

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“इस बार मैंने इंटर के पेपर दिए हैं, मैं मैथ से बीएससी करना चाहती हूं, कालेज दूर होने की वजह से घर वाले बीए करवाना चाहते हैं, जबकि मेरे भाई को बीएससी करवाया जा रहा है, मन न होते हुए भी मुझे बीए की पढ़ाई करनी होगी।”ये कहना है कानपुर देहात जिले की रहने वाली शिवानी गौर (17 वर्ष) का। ये सिर्फ शिवानी के साथ ही नहीं बल्कि प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में यह स्थिति अभी भी बनी हुई है। जहां पर लड़कियां अपनी मर्जी के विषय भी नहीं चुन पाती हैं ।

गाँव कनेक्शन संवाददाता ने जब प्रदेश के औरैया, कानपुर देहात, कन्नौज, सीतापुर, रायबरेली, मेरठ सहित कई जिलों की छात्राओं और अभिभावकों से बात की तो उन्होंने अपने अलग-अलग पक्ष रखे। एक तरफ जहां लड़कियों की शिकायत रही कि उनके घर वाले उन्हें उनकी मर्जी के विषय नहीं चुनने देते जिससे उनका पढ़ने में मन नहीं लगता वहीं अभिभावकों का कहना था कि नौकरी तो लगनी नहीं है तो कामभर का पढ़ा दें वही बहुत है। उनकी मर्जी का पढ़ाएंगे तो फीस भी ज्यादा, ट्यूशन सुविधा नहीं, स्कूल रोज जाना पड़ेगा जैसी कई समस्याएं हैं।

उत्तर प्रदेश में 2011 की जनगणना के अनुसार 65 प्रतिशत पुरुष और 48 प्रतिशत महिलाएं शिक्षित हैं, शहरी क्षेत्रों में (10-19 वर्ष) आयु वर्ग में 83 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्रों में 87 फीसदी युवा शिक्षित हैं, जिसमें से 84 फीसदी लड़कियां और 89 फीसदी लड़के शिक्षित हैं। शहरी क्षेत्रों में (15-24 वर्ष) आयु वर्ग में शहरी 82 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 81 फीसदी युवा शिक्षित हैं, जिसमें लड़कियों की संख्या 76 फीसदी है और लड़कों की 87 फीसदी है।

औरैया जिले की मानसी पाल (16 वर्ष) का कहना है, “जब अपनी मां से बहुत जिद की तब कहीं इंटर में मैथ ले पाई, अब बीएससी हमें नहीं कराई जायेगी क्योंकि एडमिशन और ट्यूशन की फीस देने के लिए माँ के पास पैसे नहीं हैं।” वो आगे बताती हैं, “मेरा बीए करने का बिल्कुल मन नहीं हैं, अगर बीए करने को मना करती हूं तो मेरी आगे की पढ़ाई रुकवा दी जायेगी, इसलिए बिना मन से ही बीए करना पड़ेगा।

कानपुर देहात के रिटायर्ड शिक्षक नैनपुर गाँव के सुदामा प्रसाद अकेला (74 वर्ष) अपने कई वर्षों के शिक्षण कार्य का अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, “लड़के-लड़की का भेदभाव भी लड़कियों को उनके पसंद का विषय न पढ़ने में एक रोड़ा आता है, लड़कियों को अभी भी शारीरिक और मानसिक रूप से कम सक्षम कहा जाता है, पिछले कुछ वर्षों में स्तिथि में सुधार हुआ है लेकिन अभी और सुधार की आवश्यकता है जिससे वो अपने मन की पढ़ाई कर पाए।”

सीतापुर जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर पश्चिम-दक्षिण में पिसावां ब्लॉक के रूरा गाँव की रहने वाली शीलमती देवी (55 वर्ष) बताती हैं, “लड़कियों को कौन सा नौकरी करनी है, करना चूल्हा-चौका ही है, कठिन पढ़ाई कराके क्यों पैसा खर्च करें।”वो आगे बताती हैं, “बिटिया तो पराये घर की है, ज्यादा पढ़ा देंगे तो शादी में ज्यादा पैसा देना पड़ेगा, काम भर का पढ़ लें इतना बहुत हैं।”

“गाँव से दूर स्कूल होने की वजह से मेरी पढ़ाई रोक दी गयी है, पढ़ लिखकर कौन सा कलेक्टर बन जाओगी ये हमारे पापा कहते हैं, इतना पढ़ लो जितने में शादी करने में मुश्किल न हो।” ये कहना है कन्नौज की इंटर की परीक्षा दे चुकी आरती सिंह (18 वर्ष) का।

मेरठ जिले की मखदुमपुर गाँव के रामकिशन मौर्या (40 वर्ष) का कहना हैं, “आजकल नौकरी तो बहुत मुश्किल से मिलती है, इसलिए वो पढ़ाई कराते हैं जिसमे पैसा भी कम लगे और पढ़ाई भी हो जाए, जितना ज्यादा अच्छी पढ़ाई कराएंगे उतना शादी में दहेज देना पड़ेगा।”

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