नारी डायरी

वो पहलवान नहीं थी, पर उसने मर्दवादी समाज को पटखनी दी थी

आमिर ख़ान की फिल्म ‘दंगल’ के दृश्य में जब गीता फोगाट मैदान में भारी-भरकम पहलवानों को उठाकर चित कर देती है तो सिनेमाहॉल में बैठे दर्शक खुशी से ताली पीटने लगते हैं। एक पल के लिए लगता है जैसे हिंदुस्तानी मर्दवादी समाज में सदियों से चला आ रहा महिला उत्पीड़न उसी धूल में मिल गया जो गीता के चलने से स्लो मोशन में उड़ती हुई दिखाई देती है। पर्दे पर हुई गीता की जीत पर्दे से बाहर छलक कर लोगों के चेहरों पर आ जाती है। हर दर्शक विजेता बन जाता है। गीता की कहानी तो बहुत पुरानी नहीं है लेकिन हिंदुस्तानी पुरुषवादी समाज में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों का इतिहास बहुत पुराना है।

गुज़रे हुए ज़मानों में ऐसी तमाम महिलाएं हुई हैं जिन्होंने ना सिर्फ पुरुषवाद को चुनौती दी बल्कि सामाजिक लकीरों से आगे कदम बढ़ाने का साहस किया। जो समाज लड़कियों के कुश्ती खेलने पर ऐसी प्रतिक्रिया देता है वो आज से 160 साल पहले कैसा रहा होगा इसका अंदाज़ा लगाना इतना मुश्किल नहीं है। लेकिन उस दौर में भी एक शख्सियत ऐसी थी जिसने पुरुषवादी समाज से ‘कुश्ती’ लड़ने का फैसला किया, मुकाबला मुश्किल था.. लेकिन एक वक्त आया जब उसने उन सभ्यता और संस्कृति के नाम पर फैले आडंबरों को ठोकर मारी और भारत का पहला कन्या विघालय शुरु कर दिया। हम बात कर रहे हैं सावित्रीबाई फुले की.. और आज उनकी जन्मतिथि है।

पुणे के सावित्री बाई फुले चौराह पर लगी उनकी मूर्ति

कौन थी सावित्रीबाई फुले?

सावित्री बाई एक समाज सुधारक और मराठी कवयित्रि थीं। उनका जन्म 3 जनवरी 1931 को एक दलित परिवार में हुआ था। पिता का नाम खन्दोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था। साल 1840 में उनका विवाह ज्योतिबा फुले से हुआ था। शादी के बाद उन्होंने अपने पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले के साथ मिलकर स्त्रियों के अधिकारों और शिक्षा के लिए बहुत काम किए। ये वो दौर था जब महिलाओं को शिक्षा से दूर रखा जाता था। दलित समाज में हालात और ज़्यादा खराब थे। लेकिन जिस दौर में दलित समाज की किसी लड़की के स्कूल जाने की कल्पना करना भी मुश्किल होता था उसी 1852 में उन्होंने अछूत बालिकाओं के लिए एक स्कूल खोला।

ये वो हिम्मत थी जिसका नतीजा उन्हें पता था लेकिन वो समाज को ‘पटकनी’ देने का इरादा कर चुकी थी। सवित्रीबाई फुले को महाराष्ट्र और भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन में एक सबसे महत्त्वपूर्ण शख्सियत माना जाता है। उनको महिलाओं और दलित जातियों को शिक्षित करने की कोशिशों के लिए याद किया जाता है। सावित्रीबाई ने अपनी ज़िंदगी को एक मिशन की तरह से जीया जिसका मकसद विधवा विवाह, छुआछात, औरतों की आज़ादी और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना था। ज़ाहिर है ये रास्ता आसान नहीं था, वो सड़क से गुज़रती थी तो उनपर कीचड़ फेंक दिया जाता था। लोग कहते थे कि ये पाप करवा रही है, पत्थर मारते थे। उस ज़माने में लड़कियों का स्कूल जाना बहुत नगवार बात थी, उनके लिए स्कूल खोलना तो बहुत बड़ी बात थी।

जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फेंका करते थे। सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर साड़ी बदल लेती थीं।

लेकिन सावित्रीबाई ने वो कर दिखाया जो वो करना चाहती थी। तमाम पाबंदियों के बीच साल 1848 में उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर लड़कियों के लिए स्कूल खोला और इस तरह वो भारत के पहले बालिका स्कूल की पहली प्रिंसिपल बनीं। ये कितना मुश्किल था आज इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है। वो एक कवियत्री भी थीं उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के तौर पर भी जाना जाता है।

सावित्रीबाई ने ज़िंदगीभर दूसरों के लिए काम किया। साल 1897 में जब भारक के कई हिस्सों में प्लेग फैला हुआ था। उन्होंने अलग-अलग इलाकों में जाकर लोगों की सेवा करने का फैसला किया। इस दौरान उन्होंने तमाम मरीज़ों की दिन-रात सेवा की। वो मरीज़ जिनके करीब इंफेक्शन के डर से कोई नहीं जाता था सावित्री बाई ने उन मरीज़ों की भी देखभाल की। लेकिन अफसोस की इस दौरान उन्हें भी प्लेग हो गया और उसी साल 10 मार्च को उनकी भी मृत्यु हो गई।