नारी अदालत में महिलाएं सहजता से रख पाती हैं अपनी बात  

Neetu SinghNeetu Singh   27 April 2017 2:16 PM GMT

नारी अदालत में महिलाएं सहजता से रख पाती हैं अपनी बात  नारी अदालत पर अब ग्रामीण महिलाओं का भरोसा लगातार बढ़ता जा रहा है।

नीतू सिंह, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

इलाहाबाद। महिला समाख्या की तरफ से प्रदेश के चल रही नारी अदालत पर अब ग्रामीण महिलाओं का भरोसा लगातार बढ़ता जा रहा है। महिलाओं के जो केस कोर्ट में चल रहे होते हैं, सालों साल जो केस नहीं सुलझते या फिर जिनका समाधान नहीं होता है। वो केस भी अब महिलाएं नारी अदालत में लेकर आती हैं और उनका समाधान होता है।

इलाहाबाद जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर शिवगढ़ ब्लॉक की रहने वाली खुशबू अग्रहरी (28 वर्ष) कोर्ट के फैसले के बाद ससुराल में रह तो रही थीं, लेकिन उसे पत्नी का दर्जा नहीं मिल रहा था और न ही उनके पति तलाक देने को तैयार थे।

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खुशबू बताती हैं, “ससुराल में सिर्फ नाम भर का हम रहते थे, हम अब अकेले रहना चाहते थे और तलाक चाहते थे, जब मुझे नारी अदालत के बारे में पता चला तो यहां मैंने अपना केस दर्ज करवाया, मेरे पति को बुलाया गया।” वो आगे बताती हैं केस महिलाएं देख रही थी और वो मेरी परेशानी को समझ रहीं थीं इसलिए लिखा-पढ़ी कर उन्होंने हमारा तलाक करवा दिया।”

महिला समाख्या की सोरांव ब्लॉक की ब्लॉक समन्यवक वर्षा का नारी अदालत के बारे में कहना है, “नारी अदालत महिलाओं के द्वारा बनाया गया एक ऐसा मंच हैं, जिसमे 6-14 महिलाएं निर्णायक की भूमिका में रहती हैं, हमे कानून और जेंडर संबंधी सभी विषयों पर प्रशिक्षित किया जाता है।”वो आगे बताती हैं, “नारी अदालत की सभी महिलाएं गाँव की होती हैं जो एक दूसरे की समस्या के बारे में अच्छे से समझती हैं, लड़कियों और महिलाओं सम्बन्धी मसलों में हम उनकी इमेज का बहुत ध्यान रखते हैं।”

“मेरे सांवले रंग की वजह से मेरे पति मुझसे शादी के बाद से ही ज्यादा बात नहीं करते थे, शादी उन्होंने सिर्फ दबाव में की थी, शादी के आठ साल हो गये हैं, एक तो मेरा सांवला रंग दूसरा बच्चा न होना, मेरे पति को मुझे छोड़ने का अच्छा मौका मिल गया।” ये कहना है खुशबू अग्रहरी का।वो आगे बताती हैं, “दो वर्ष पहले मेरे पति मुझे मायके छोड़ गये, तबसे कोई लेने नहीं आया, मेरे मां-बाप ने कोर्ट में केस किया, उसमे समझौता हुआ और वो रखने को तैयार हो गए, दबाव में रखा जरुर लेकिन वो रखना न के बराबर था।”

जब नारी अदालत नहीं थी तो महिलाएं थाने-कचहरी के चक्कर लगा-लगाकर परेशान रहती थी, अब जिन महिलाओं को कोई भी परेशानी होती है वो कहीं न कहीं से नारी अदालत का पता लगाकर यहां आ ही जाती हैं, जिले के साथ दूसरे जिले की भी महिलाएं आती हैं।
संयोगिता सिंह, क्लस्टर इंचार्ज

भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध के वर्ष 2015 में जो मामले दर्ज हुए हैं, उनमें उत्तर प्रदेश का पहला स्थान है। उत्तर प्रदेश में 35,527, महाराष्ट्र में 31,126, पश्चिम बंगाल में 33,218 मामले दर्ज हुए हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार पिछले चार वर्षों से 2015 तक महिलाओं के खिलाफ अपराध में 34 फीसदी की वृद्धि हुई है, जिसमें पीड़ित महिलाओं द्वारा पति और रिश्तेदारों के खिलाफ सबसे अधिक मामले दर्ज हुए। इन मामलों को कम करने में महिला समाख्या की प्रदेश के 14 जिलों में 36 नारी अदालत चलती हैं, जिसमें वर्ष 1997-2016 तक इन नारी अदालत में अब तक 53,400 मामले आए हैं और बड़ी संख्या में मामले निपटाए गए हैं। वर्ष 1997 में नारी अदालत की शुरुआत की गयी थी।

नारी अदालत के फैसले से खुश परिवार

खुशबू के परिवार वाले नारी अदालत के द्वारा किये गये फैसले से बहुत खुश थे।” खुशबू की माँ शकुंतला देवी (45 वर्ष) ने कहा, “यहां हमारा सारा काम बहुत कम पैसे में और बहुत ही जल्दी निपट गया, कोर्ट में तो पैसा भी लगा और समय भी बहुत लगा, यहां महिलाओं के सामने अपनी समस्या रखने में ज्यादा असुविधा नहीं हुई।” उनका कहना है, “नारी आदालत के फैसले के बाद हमने अपनी बेटी की दूसरी जगह अच्छी शादी कर दी, आज वो अपनी ससुराल में बहुत खुश है, बहुत दूर से आखिरी उम्मीद लेकर नारी अदालत में आयी थी।”

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