ग्रामीण महिलाओं को सबल बना रही आशाओं की लाइब्रेरी 

ग्रामीण महिलाओं को सबल बना रही आशाओं की लाइब्रेरी आशा बहुओं के लिए पुस्तकालय का निर्माण कराया गया।

देवांशु मणि तिवारी, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

रायबरेली। जिले में एनआरएचएम और पाथ फाउंडेशन संस्था के तहत बछरावां ब्लॉक के कन्नावा गाँव में आशाओं के लिए ऐसा पुस्तकालय बनाया गया है, जहां पर 27 गाँवों की आशाबहुवों को अपने काम से जुड़ी जानकारी व सरकारी योजनाओं में आवेदन करने में मार्गदर्शन दिया जाता है।

इस पुस्तकालय के बारे में संचालिका विनीता कुमारी बताती हैं, “यह पुस्तकालय सिर्फ आशाओं के लिए ही नहीं बनाया गया है। इसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को साक्षरता से जोड़ने और उन्हें घरों की चहारदीवारी से बाहर निकालना है। “

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प्रदेश के सात जिलों में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत वर्ष 2007 में नवजात शिशुओं की मृत्युदर रोकने के लिए आशाओं में जा गरूकता लाने के लिए ‘श्योर स्टार्ट’ कार्यक्रम शुरू किया गया। यह कार्यक्रम 2011 तक चला। कार्यक्रम खत्म हो जाने के बाद स्वास्थ्य विभाग से जुड़ने वाली नई आशाओं में जागरूकता बनी रहे इसके लिए जिले में आशाओं की लाइब्रेरी बनाई गई, इस लाइब्रेरी की मदद से आज जिले के 27 गाँवों की 55 आशाओं को महिलाओं की कुशल डिलीवरी, मात्र-शिशु पोषण, शिशु मृत्यु दर कैसे रोका जाए। इन विषयों पर जानकारी मिलती है।

“श्योर स्टार्ट कार्यक्रम के तहत बनाई गई इस लाइब्रेरी का मुख्य उद्देश्य गाँवों की आशा व आंगनबाड़ियों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके और उन्हें उनके कार्य संबंधी आधुनिक जानकारियों के साथ साथ सरकारी योजनाओं का लाभ दिलवाया जा सके।” विनीता कुमारी आगे बताती हैं। कन्नावा गाँव में बनी इस लाइब्रेरी में ग्रामीण महिलाओं व आशा बहुओं के लिए मां एवं शिशु देखभाल, स्वास्थ्य संवाद, नवजात शिशु मृत्यु दर कैसे रोके और गाँव में महिला संगठन का कैसे करे निर्माण जैसी उपयोगी पुस्तकों के साथ साथ डॉक्यूमेंट्री फिल्मों को भी दिखाया जाता है।

लाइब्रेरी के अध्यक्ष अताउल्ला खान ने बताया, ‘’वर्ष 2011 में शुरू हुए श्योर स्टार्ट कार्यक्रम के तहत सात जिलो में आशा बहुओं के लिए ऐसे ही पुस्तकालय बनाए जाने थे। इसमें रायबरेली जिले के लिए ग्रमीण विकास संस्थान को इस लाइब्रेरी के निर्माण के लिए चुना गया।’’ उन्होंने आगे बताया कि आज इस पुस्तकालय की मदद से हम जिले की 50 से अधिक आशा बहुओं और 100 से ज़्यादा किशोरियों को जागरूक कर चुके हैं।

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