'मैंने अपना बाल विवाह रोका, अब दूसरों का नहीं होने दूंगी'

मैंने अपना बाल विवाह रोका, अब दूसरों का नहीं होने दूंगी

लखनऊ। ये हैं हमारे आसपास के असली हीरो... इनमें से किसी ने बाल-विवाह रोका तो किसी ने ग्राम प्रधान बन अपनी पंचायत में शराबबंदी कराई। किसी ने बच्चों का स्कूल में दाखिला कराया तो किसी ने अपनी ग्राम पंचायत खुले से शौच मुक्त करवाई।

लखनऊ के बौद्ध शोध संस्थान प्रेक्षागृह में बुलंदशहर से आयी दुबली-पतली नीरज (31 वर्ष) जब माइक पकड़कर बेबाकी से बोल रही थीं तो सभागार में हर कोई इनका मुरीद हो गया। ये अपने हरियाणावीं लहजे में आत्मविश्वास से कह रही थीं, "पहली बार लखनऊ आयी हूं और माइक पर भी इतनी भीड़ में पहली बार बोल रही हूँ। गरीबी की वजह से हमारी शादी 15 साल की उम्र में हो गयी थी। मैं नहीं चाहती कम उम्र की शादी में जो तकलीफें मैंने झेली हैं कोई और बेटी झेले। पिछले पांच-छह महीने में पांच बाल विवाह रोक चुकी हूं।"


ये बदलाव करने वाले हीरो कोई सरकारी कर्मचारी नहीं हैं और न ही इन्हें इसके लिए कोई पैसा मिलता है। बल्कि ये वो हैं जिन्होंने कभी खुद मुश्किलें का सामना किया है और आज यही आगे आकर बदलाव की नई कहानियाँ लिख रहे हैं। पिछले एक साल में इनके प्रयासों से 307 बाल-विवाह रोके गये हैं।

बहराइच जिले से आयी किशोरी अंकिता (17 वर्ष) ने न केवल अपना बाल-विवाह रोका बल्कि पांच और बच्चियों का बाल विवाह रोककर दूसरों के लिए भी उदाहरण बनी। वो बताती हैं, "पहले हमें नहीं पता था कि कम उम्र में शादी होना कानूनी अपराध है। जब दो साल पहले महिला समाख्या से जुड़े तब हमें पता चला। हमने आठ बच्चों की मजदूरी छुडवाकर उनका स्कूल में नामांकन करवाया।" अंकिता की तरह जौनपुर से आये 12 वर्षीय प्रकाश दुबे ने भी तीन बच्चों का नामांकन कराया और एक दिव्यांग बच्चे की स्कूल आने जाने में मदद भी करते हैं।

महिला हिंसा और बाल विवाह रोकने के लिए पिछले साल यूनीसेफ के सहयोग से महिला समाख्या, महिला एवं बाल विकास विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा राज्य स्तर पर महिला एवं बाल अधिकार मंच 'हक़ से' का गठन 19 जिले के 220 ब्लॉक के 16633 पंचायतों में 7864 मंच का गठन किया गया। जिसमें 2418 मंच सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।

महिला समाख्या की राज्य परियोजना निदेशक स्मृति सिंह ने कहा, "पिछले एक साल में 19 जिले में 389 बाल विवाह पंजीकरण किये गये जिसमें 307 बाल विवाह रोके गये। महिला एवं बाल अधिकार मंच 'हक़ से' में पंचायत स्तर पर ग्राम प्रधान से लेकर छात्र-छात्राओं को शामिल किया गया। जिससे पंचायत स्तर पर बाल विवाह रोकने, बच्चों का नामांकन कराने जैसी जिम्मेदारी का निर्वाह हर कोई करे।"



महिला एवं बाल अधिकार मंच के गठन से लगभग 3000 प्रधानों को संवेदनशील किया गया जिससे ये पंचायत स्तर पर लिंग आधारित भेदभाव के मुद्दे, बाल-विवाह के मुद्दे, महिला हिंसा, बाल संरक्षण व बाल अधिकार के मुद्दे, दहेज़, पानी, मजदूरी, जल जंगल जमीन, उद्यमिता, खेती जैसे मुद्दों पर चर्चा कर सकें। अभी 500 ग्राम पंचायतों को आदर्श पंचायत के रूप में काम किया जा रहा है।

लखनऊ के गोमतीनगर में 26 दिसंबर को बौद्ध शोध संस्थान प्रेक्षागृह में महिला एवं बाल अधिकार मंच 'हक़ से' का वार्षिक सम्मेलन किया गया। जिसमें ग्रामीण क्षेत्र से आयी महिलाओं और बेटियों ने लोकगीत और नाटक की प्रस्तुति कर बाल विवाह और घरेलू हिंसा को रोकने का सन्देश दिया। इसके साथ ही पिछले एक साल में अच्छा काम करने वाले छह प्रतिभागियों को सम्मानित किया गया और दो ने अपने अनुभव साझा किये।

इस कार्यक्रम के दौरान दो सक्रिय महिला प्रधान जिसमें गोरखपुर की नूरजहाँ को अपनी ग्राम पंचायत खुले से शौच मुक्त करने के लिए सम्मानित किया गया वहीं सीतापुर की कुसुम को अपनी ग्राम पंचायत में शराबबंदी करने के लिए किया गया। बाल विवाह रोकने, बच्चों का नामांकन कराने महिला और बाल मुद्दों पर सक्रिय रूप से काम करने के लिए श्रावस्ती की गोमती, कौशाम्बी की सविता, जौनपुर के प्रकाश, बहराइच की अंकिता को सम्मानित किया गया।

इस कार्यक्रम में बाल विवाह पर सामूहिक चर्चा भी हुई, जिसमें महिलाओं के सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाली नीति सक्सेना और ताहिरा हसन भी शामिल थीं।

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