कामकाजी महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों पर क्यों लापरवाह हैं ऑफिस?

कामकाजी महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों पर क्यों लापरवाह हैं ऑफिस?महिलाअों के खिलाफ छेड़खानी के मामले बढ़े।

एक निजी संस्था में काम करने वाली प्रीती (बदला हुआ नाम) ने अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी क्योंकि उनके एक सहकर्मी उन्हें परेशान करते थे। बेइज्जती के डर से प्रीती ने काम पर आना ही छोड़ दिया।

कार्यस्थलों में अक्सर महिलाओं के साथ छेड़खानी की घटनाएं सामने आती हैं। हाल ही में दिल्ली में पीएलडी संस्था ने इस विषय पर दो दिन की कार्यशाला का आयोजन किया जिसमें इससे जुड़ी कानूनी बारिकियों को समझाने की कोशिश भी की गई।

लगातार बढ़ रही याैन हिंसाओं के चलते वर्ष 2013 में यौन उत्पीड़न अधिनियम भी बनाया गया। इसके तहत जिन संस्थाओं में दस से अधिक लोग काम करते हैं, वहां पर एक समिति का गठन किया जाना था जिसमें महिलाएं अपने साथ हुई किसी भी तरह की हिंसा की शिकायत कर सकती हैं। लेकिन ज्यादातर संस्थाओं ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।

वर्ष 2013 तक कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़ऩ को कोई विशेष अपराध नहीं माना जाता था। इसे भारतीय दंड संहिता 1860 कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न के मामले को एक अलग अपराध के रुप में सुलझाने के लिये कोई अलग धारा भी नहीं थी। लेकिन 2013 में तरुण तेजपाल केस के बाद आईपीसी की धारा 354 के अन्तर्गत इसे दंडनीय अपराध बनाया गया।

कार्यस्थलों पर महिलाओं का यौन-उत्पीड़न रोकने के लिए 2013 में बने कानून को सही तरीके से लागू करने की मांग करते हुए दायर की गई एक याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने चार जनवरी को केंद्र व राज्य सरकारों और संघ शासित प्रदेशों के प्रशासनों को नोटिस भेजी है।

इसके बारे में महिलाओं पर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था वात्स्ल्य की संस्थापक डॉ नीलम सिंह बताती हैं, "इस कमिटी का गठन हर सरकारी व गैर सरकारी संस्था में होना आवश्यक है। इसमें 50 फीसदी महिलाएं व अन्य स्टाफ के लोग हो होगें। एक थर्ड पार्टी सदस्य होगा जो किसी एनजीओ का सदस्य भी हो सकता है। इसकी चेयर पर्सन महिला सदस्य होगी।"

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वो आगे बताती हैं, "इस कमिटी से महिलाएं अपने साथ होने वाली हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने में सहज महसूस करतीं लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी संस्थाओं ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।"

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट बताती है कि 2014-2015 के बीच कार्य स्थल में होने वाली यौन हिंसा से जुड़े मामलों में दोगुनी वृद्धि दर्ज की गई है। यौन हिंसा की शिकायतों की संख्या में वृद्धि के बावजूद यह भी देखने में आया है कि ज्यादातर मामलों में जांच ठीक से नहीं होती। आरटीआई में दी गयी सूचना के अनुसार पूरे उत्तर प्रदेश में केवल 305 कार्यालयों में लैंगिक उत्पीड़न समिति का गठन किया गया है।

ज्यादातर संस्थाओं ने इसे लागू नहीं किया और कोई भी ऐसी कमिटी नहीं बनाई जहां पर शिकायत की जा सके। दिल्ली की एक संस्था में काम करने वाली रचना मौर्या (26वर्ष) बताती हैं, "उनके आफिस में लगभग 50 लोगों का स्टाफ है लेकिन ऐसी कोई समिति नहीं बनाई गई हैं जहां पर महिलाएं इस तरह की शिकायतें दर्ज करा सकें।" वो आगे बताती हैं, "हालांकि अभी इस तरह का कोई केस हुआ नहीं है लेकिन क्या हम इसके होने का इंतजार कर रहे हैं कि जब होगा तभी कमिटी भी बनेगी।"

बंग्लौर की एक पीआर कंपनी में काम करने वाली प्राची को अपनी नौकरी इसलिए छोड़ी क्योंकि उनके आफिस में ज्यादातर पुरुष कर्मचारी थे और वो प्राची के कपड़े पहनने से लेकर चलने तक पर टिप्पणियां करते थे। प्राची बताती हैं, "तीन महीने के गैप के बाद मैंने दूसरी जगह नौकरी की लेकिन मेरे आत्मविश्वास में कमी आ गई है अब मैं बहुत सोच समझकर लोगों से बात करती हूं और बहुत देखकर कपड़े पहनती हूं क्योंकि जब आप किसी के बगल से निकलें और लोग भद्दी टिप्पणी करें, कमेंट करें तो ये ज्यादा समय तक बर्दाश्त नहीं होता।"

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फिक्की-ईवाई रिपोर्ट फोस्टरिंग सेफ वर्कप्लेसेस महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम के संबंध में एक अध्ययन है। इसके अनुसार 36 फीसद भारतीय कंपनियों व 25 फीसद बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इसका पालन नहीं किया।

संस्थाओं में होने वाली इस लापरवाही के बारे में लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता ताहिरा हसन बताती हैं, "ये सुप्रीम कोर्ट का आदेश था लेकिन बहुत कम संस्थाओं ने इसे माना। यही कारण है कि इस तरह के केस दबा दिए जाते हैं अगर महिला के साथ ऐसी घटना होती है तो नौकरी छोड़कर घर बैठ जाती है क्योंकि अगर वो शिकायत करेगी तो मामला लंबा खिंच जाएगा।"

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ये भी हैं यौन उत्पीड़न

  • यदि एक तैराकी कोच छात्रा को तैराकी सिखाने के लिए स्पर्श करता है तो वह यौन उत्पीड़न नहीं कहलाएगा पर यदि वह पूल के बाहर, क्लास ख़त्म होने के बाद छात्रा को छूता है और वह असहज महसूस करती है, तो यह यौन उत्पीड़न है l
  • यदि विभाग का प्रमुख, किसी जूनियर को प्रमोशन का लालच देकर शारीरिक रिश्ता बनाने को कहता है,तो यह यौन उत्पीड़न है l
  • यदि एक वरिष्ठ संपादक एक युवा प्रशिक्षु /जूनियर पत्रकार को यह कहता है कि वह एक सफल पत्रकार बन सकती है क्योंकि वह शारीरिक रूप से आकर्षक है, तो यह भी यौन उत्पीड़न हैl
  • यदि आपका सहकर्मी आपकी इच्छा के खिलाफ आपको अश्लील वीडियो भेजता है, तो यह यौन उत्पीड़न है।

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