असल वजह : माहवारी के दिनों में क्यों स्कूल नहीं जातीं लड़कियां

Neetu SinghNeetu Singh   27 May 2017 6:29 PM GMT

असल वजह : माहवारी के दिनों में क्यों स्कूल नहीं जातीं लड़कियांस्कूल में संसाधन न होने के कारण वर्ष में एक महीने से ज्यादा छात्राओं की पढ़ाई प्रभावित होती है।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ । प्रदेश की लाखों छात्राएं माहवारी के दिनों में तीन से पांच दिन सिर्फ इस वजह से स्कूल नहीं जा पाती हैं क्योंकि उनके लिये सेपरेट शौचालय और पैड निस्तारण की समुचित व्यवस्था नहीं है। इसकी वजह से एक वर्ष में एक महीने से ज्यादा उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है । एक आंकड़े के अनुसार करीब 33 प्रतिशत छात्राएं माहवारी के दिनों में स्कूल नहीं जाती हैं। यदि इस दिशा में सरकार गम्भीरता से ध्यान दें तो प्रदेश की लाखों छात्राएं माहवारी के दिनों में स्कूल जाने से नहीं घबराएंगी।

“महीने के तीन दिन मैं कभी स्कूल नहीं जाती, क्योंकि हमारे स्कूल में लड़कियों के लिए अलग से न तो शौचालय बना है और न ही पैड फेकने की कोई जगह है। शौचालय में पानी भी नहीं होता है। इसलिए मजबूरी में स्कूल नहीं जा पाते हैं ।” ये कहना है देवरइ कला गाँव की रहने वाली 17 वर्षीय छात्रा का।

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ये लखनऊ जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर बख्शी का तालाब ब्लॉक गाँव से हैं । ये उत्तर प्रदेश की पहली किशोरी नहीं है जो माहवारी के उन तीन से पांच दिनों स्कूल न जा पाती हो बल्कि लाखों किशोरियों की साल में एक महीने से ज्यादा पढ़ाई नहीं हो पाती है ।

वो आगे बताती हैं, “अगर स्कूल में सेपरेट शौचालय, पैड निस्तारण की सुविधा, हाथ धुलने के लिए साबुन हो तो अच्छी बात है। जरूरत पड़ने पर पैड और पेट दर्द की दवाएं मिल सके तो शायद उन दिनों में हमारी पढ़ाई नहीं छूटेगी ।” एक दिन माहवारी दिवस मनाना ही पर्याप्त नहीं है सरकार अगर हमारी परेशानियों को गम्भीरता से लेगी तो हमारी परेशानी का समाधान जरूर निकलेगा ।

आज हमारे देश की 70 फीसदी लड़कियों को पहली माहवारी के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है, जिससे उनकी शिक्षा और सेहत दोनों पर असर पड़ रहा है । भारत सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल 35 करोड़ महिलाओं में से केवल 12 फीसदी ही सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल कर रही हैं । एक सर्वे के अनुसार भारत में 70 फीसदी महिलाओं को माहवारी के दौरान साफ कपड़े या नैपकिन उपलब्ध ही नहीं हैं ।

महिलाओं और किशोरियों के स्वास्थ्य के लिए काम कर रहीं एक गैर सरकारी संस्था ‘वात्सल्य’ लखनऊ के आठ ब्लॉक के सैकड़ों गाँव में काम करती हैं । इस संस्था ने वर्ष 2016 में लखनऊ के आठ ब्लॉक के 80 स्कूल की 450 छात्राओं (11 से 18 वर्ष) के बीच बैंक आफ़ अमेरिका के तहत वेश लाइन सर्वे किया था ।

जिसमें 93 प्रतिशत छात्राओं ने कहा, माहवारी में वो मन्दिर, चर्च गुरुद्वारा नहीं जाती। 84.7 प्रतिशत ने कहा कि वो माहवारी को गंदा मानती हैं। हर तीन में से एक किशोरी यानी 33 प्रतिशत किशोरियां ही इन दिनों स्कूल जा पाती हैं। यूनीसेफ की 2011 की रिपोर्ट के अनुसार 66 प्रतिशत किशोरियों को पहली माहवारी के बारे में जानकारी ही नहीं है ।

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पंचायती राज विभाग के सलाहकार संजय सिंह चौहान का कहना है, “पंचायती राज विभाग द्वारा स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण उत्तर प्रदेश के अंतर्गत प्रदेश के कुछ जिले मिर्जापुर, हरदोई, सोनभद्र, बिजनौर, अमेठी, भदोही, वाराणसी में स्कूलों में इन्सीरेटर बनाये जा रहे हैं, जिससे छात्राओं को पैड निस्तारण में असुविधा नहीं होगी ।

जल्द ही इसे बड़े पैमाने पर शुरू किया जाएगा ।” वो आगे बताते हैं, “एक महीने पहले चीफ सिक्रेटरी के साथ हुई बैठक में ये सुनिश्चित किया गया है कि हर जिले में 50-50 इन्सीरेटर लगाये जाएँ, स्वच्छ भारत मिशन के तहत सस्ती दरों पर सेनेटरी पैड का निर्माण प्रदेश के 75 जिलों में से 55 जिलों में शुरू हो गया है जिससे हर वर्ग के लोगों के लिए खरीदना आसान होगा । एक पैकिट की कीमत 15 रुपए है जिसमे छह पीस मिलते हैं, इस प्रक्रिया के बाद छात्राओं की मुश्किलें जरुर आसान होंगी ।”

वात्सल्य संस्था के असिस्टेंट प्रोजेक्ट को-आर्डिनेटर जुबैर अंसारी का कहना है, “सर्वें में जो बातें निकल कर आयीं हैं हम लगातार इनके साथ काम कर रहे हैं, जिन मूलभूत सुविधाओं की जरूरत छात्राओं को लगे उस पर एक साल काम किया है, इस साल इनके साथ पुन: सर्वें करेंगे, क्या सुधार हुआ है ये पता चलेगा ।”

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