अब नजरें नहीं झुकातीं, फुटबॉल पर मारती हैं किक

Meenal TingalMeenal Tingal   6 Feb 2017 10:18 AM GMT

अब नजरें नहीं झुकातीं, फुटबॉल पर मारती हैं किकफुटबॉल गाँव की बच्चियों में आत्मविश्वास बढ़ाने का वह जरिया बन गया है।

लखनऊ। फुटबॉल गाँव की बच्चियों में आत्मविश्वास बढ़ाने का वह जरिया बन गया है जिसको खेलने के बाद बच्चियों में बचपन से बैठा समाज का डर कम होता जा रहा है। वह अपनी तरह से जिंदगी जीने की कोशिश कर रही हैं।

बरेली ज़िला मुख्यालय के उत्तर-पूर्व में 12 किमी दूर मुख्यधारा से कटे पीतमपुरा गाँव में नजरें झुकाकर, दुपट्टे में स्कूल व घर से बाहर जाने वाली बच्चियां अब टीशर्ट-लोअर पहनकर फुटबॉल खेलती हैं। वह गाँव वालों के तानों का जवाब दे लेती हैं और उनकी नजरों से घबराती और शर्माती भी नहीं हैं।

पन्द्रह वर्ष की काजल बताती है, “मेरी चाहत फुटबॉल खेलने की थी, लेकिन गाँव वाले मजाक उड़ाते थे। जब किसी तरह अपनी इस इच्छा को अंजाम देना चाहा तो टीशर्ट-लोअर पहननी पड़ी, वह भी बिना दुपट्टे के। पहले बहुत शर्म आती थी, गाँव वाले छींटाकशी करते थे लेकिन अब मैं उनकी परवाह नहीं करती और फुटबॉल सीखने जाती हूं और काफी कुछ सीख गयी हूं।”

इन बच्चियों को फुटबॉल सीखने के लिए साथ मिला है एक गैर सरकारी संस्था ‘साकार’ का। संस्था की फाउण्डर नितिका बताती हैं, “मैं और मेरी संस्था के साथी जब काम से थक जाते हैं तो अक्सर मन बहलाने के लिए फुटबॉल खेलते हैं। चूंकि बच्चियों के साथ कई तरह के कार्यक्रम करते रहते हैं तो बच्चियों को भी इस बारे में मालूम हुआ। उनके अंदर भी खेलने की इच्छा तो थी लेकिन वह घबरा रही थीं। उनकी इस घबराहट को हमने काउंसलिंग करके निकाला।” नितिका ने बच्चियों के सामने बिहार के सीवान की 15 वर्षीय अमृता कुमारी गुप्ता का उदाहरण भी रखा।

अमृता ने पिछले वर्ष मार्च में अंडर-16 एशियन फुटबॉल कॉन्फेडरेशन चैंपियनशिप के क्वालीफाइंग राउंड में भारतीय फुटबॉल टीम की कप्तानी की थी। अमृता गाँव के एक साधारण परिवार से संबंध रखने वाली थीं और अमृता के पिता शम्भू प्रसाद गुप्ता गुड़गांव में सब्जी की रेहड़ी लगाते थे। नितिका बताती हैं, “हमारे बुलावे पर फुटबॉल सिखाने के लिए हर महीने साकर फाउण्डेशन दिल्ली से कोच आते हैं जो तीन दिनों तक फुटबॉल की बारीकियों और नियमों की जानकारी बच्चियों को देते हैं। इसके बाद बच्चियां खुद एक दूसरे को सिखाती हैं जिसकी प्रैक्टिस वह गाँव के किसी खाली मैदान या छुट्टी के बाद किसी स्कूल के मैदान में करती हैं।”

मैं और मेरी संस्था के साथी जब काम से थक जाते हैं तो अक्सर मन बहलाने के लिए फुटबॉल खेलते हैं। चूंकि बच्चियों के साथ कई तरह के कार्यक्रम करते रहते हैं तो बच्चियों को भी इस बारे में मालूम हुआ। उनके अंदर भी खेलने की इच्छा तो थी लेकिन वह घबरा रही थीं। उनकी इस घबराहट को हमने काउंसलिंग करके निकाला।
नितिका, फाउण्डर, साकार, गैर सरकारी संस्था।

फुटबॉल खेलने के लिए केवल बच्चियों को ही ताने नहीं सुनने पड़े, उनके घर वालों को भी गाँव वाले ताने देते हैं। काजल के पिता माली भूप सिंह बताते हैं, “जब काजल ने पहली बार फुटबॉल खेला तो मुझे गाँव वालों ने कहा कि बहुत छूट दे रखी है।, बेटे खेलते तो ठीक भी था, बेटी को खेलने भेजते हो, एक दिन पछताओगे। मैं जहां काम करने जाता हूं वह अच्छे लोग हैं उन्होंने मुझे समझाया कि बेटी अगर खेलना चाहती है तो खेलने दो। इसलिए मैंने सोचा कि बिना किसी की परवाह किये बच्ची को खेलने देना चाहिये। अब तो उसमें इतना आत्मविश्वास आ गया है कि वह गाँवों में बाल विवाह रुकवाती है और बच्चों के दाखिले स्कूल में करवाती है।”

फिज़ा (9 वर्ष) बताती हैं “जब पहले खेलने जाते थे तो शर्म आती थी इसलिए साइकिल से चले जाते थे जिससे रास्ता जल्दी कट सके और कोई कुछ बोले तो सुनाई न दे। लेकिन अब शर्म नहीं आती। पिता टेलर हैं तो उन्होंने ही खेल के लिए ड्रेस सिलकर दी है। कोई कुछ भी कहे लेकिन जब घरवाले साथ देते हैं तो हिम्मत आ ही जाती है।”

बहन ने कई वर्ष पहले लव मैरिज कर ली थी इसलिए रूबी पर स्कूल जाने पर भी काफी पाबंदी थी। ऐसे में रूबी फुटबॉल खेलने के सपने देखे यह घरवालों को मंजूर नहीं था। रूबी बताती हैं, “अम्मा और बाबू तो कहते थे कि कुछ खेल-वेल नहीं खेलना है। भाई कहता था कि टीशर्ट-लोअर पहन कर नहीं खेलना है। पहले मैंने चुपके से खेलने जाना शुरू किया, वहां जाकर बहुत अच्छा महसूस हुआ तो मैंने घर पर जिद कर ली, अब जाने देते हैं।”

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