बाइकरनी ग्रुप : ये जब बाइक पर फर्राटा भरती हैं, लोग बस देखते रह जाते हैं

Basant KumarBasant Kumar   9 Sep 2017 2:32 PM GMT

बाइकरनी ग्रुप : ये जब बाइक पर फर्राटा भरती हैं, लोग बस देखते रह जाते हैंलखनऊ बाइकरनी ग्रुप में अलग-अलग क्षेत्र की 13 लड़कियां शामिल हैं।

लखनऊ। बुर्का पहन आयशा अमीन (20 वर्षीय) जब एफ जेड बाइक लेकर निकलती हैं तो कुछ निगाहें सवाल करती हैं तो कुछ निगाहें ख़ुशी ज़ाहिर करती हैं। इन निगाहों की परवाह किए बिना आयशा अपनी रफ्तार में आगे बढ़ जाती हैं।

आयशा अमीन लखनऊ बाइकरनी ग्रुप की सदस्य हैं। यह ग्रुप बाइक चलाकर लड़कियों को अपने मन का करने के लिए प्रोत्साहित करता हैं। इस ग्रुप में अलग-अलग क्षेत्र की 13 लड़कियां शामिल हैं, जिसमें से कुछ लड़कियों की शादी हो चुकी हैं तो कुछ नौकरी करती हैं। सभी लड़कियां रविवार के दिन राइड पर निकलती हैं।

बाइकरनी, आल इण्डिया एसोसिएशन ऑफ़ फिमेल राइडर की उत्तर प्रदेश की प्रमुख वर्तिका जैन बताती हैं कि मुंबई में रहने वाली ऑल इण्डिया फिमेल राइडर एसोसिएशन की प्रमुख उर्वशी पटेल का सपना था कि देश भर की महिला बाइक राइडर एक साथ एक छत के नीचे आए। इसलिए उन्होंने अलग-अलग शहरों में बाइकरनी ग्रुप बनाया है। उत्तर प्रदेश में अभी लखनऊ में बाइकरनी का ग्रुप बन गया हैं। बनारस में ग्रुप बनाने का काम चल रहा हैं।

वर्तिका नेपाल, बद्रीनाथ, कठमांडू और सिक्किम बाइक चलाकर जा चुकी हैं। वो बताती हैं, जब हमारा ग्रुप राइड पर निकलता है, लड़के ओवरटेक कर देखते हैं फिर खुद पीछे हो जाते हैं।

वर्तिका नेपाल, बद्रीनाथ, कठमांडू और सिक्किम बाइक चलाकर जा चुकी हैं। वर्तिका बताती हैं कि मैं 2007 से बाइक चला रही हूं। पहले मैं अपने दोस्तों और परिवार वालों के साथ राइड पर जाती थी, लेकिन पिछले साल लखनऊ बाइकरनी का चेप्टर शुरू हुआ तो अब हम ग्रुप के साथ राइड पर जाते हैं।

बाइकरनी लखनऊ की सदस्य सिमरन एक बेटी की माँ हैं।

वर्तिका बताती हैं कि हमारा मकसद लड़कियों को मजबूत करना और अपने मन का करने के लिए उत्साहित करना है। सभी लड़कियां बाइक नहीं चला सकती हैं, जो जिस काम में बेहतर हो उसे वो काम करना चाहिए। हमारा मकसद समाज उस सोच को खत्म करना है जो यह कहता है कि लड़कियां ये काम कर सकती हैं, ये काम नहीं कर सकती हैं। हमे इसी सोच को तोड़ना है। लड़कियां सब कुछ कर सकती हैं। लड़कियों को अपने सपनों को जीने का हक होना चाहिए।

कैसे लड़कियां शामिल हो सकती हैं?

बाइकरनी लखनऊ की प्रमुख प्राची जैन बताती हैं कि मैं बहुत पहले से बाइक चलाती हूँ। आजकल लखनऊ बाइकरनी की प्रमुख के रूप में काम कर रही हूँ। हम राइड पर निकलने के पहले सबसे ज्यादा सुरक्षा का ख्याल रखते हैं। बिना हेलमेट, सेफ्टी कीट, लाइसेंस और गाड़ी की सभी कागजों के वगैर हम किसी को राइड पर नहीं ले जाते हैं। अभी तो लखनऊ बाइकरनी ग्रुप के साथ लम्बे राइड पर नहीं गए। अभी हम आसपास में ही प्रक्टिस कर रहे हैं और जल्द ही हम कहीं राइड पर जाएंगे।

पिता एयरफ़ोर्स में अधिकारी थे। उन्होंने ही मुझे बाइक और कार चलाना सिखाया। शादी के पति भी बाइक प्रेमी निकले। मैं रविवार को जब राइड पर जाती हूँ तो बेटी का ख्याल पति ही रखते हैं।
सिमरन, ग्रुप की सदस्य

जो लड़कियां ग्रुप से जुड़ना चाहती हैं उनसे हम बाइक के कागज़, उनका लाइसेंस और पहचान पत्र मांगते है। सब कुछ देखने के बाद हम उन्हें ग्रुप में जोड़ देते हैं। बाइकरनी लखनऊ की सदस्य सिमरन एक बेटी की माँ हैं। सिमरन बताती हैं कि मेरे पिता एयरफ़ोर्स में अधिकारी थे। उन्होंने ही मुझे बाइक और कार चलाना सिखाया। शादी के पति भी बाइक प्रेमी निकले और वो मेरी बहुत मदद करते हैं। मैं रविवार को जब राइड पर जाती हूँ तो बेटी का ख्याल पति ही रखते हैं। मुझे कभी किसी ने बाइक चलाने से मना ही नहीं किया।

ये भी पढ़ें- सोशल मीडिया में बार-बार फ्रेंड रिक्वेस्ट और मैसेज भेजना साइबर क्राइम, ये हो सकती है सज़ा

मास कम्युनिकेशन की छात्रा आयशा अमीन बुरखा पहनकर बाइक चलाती हैं।

बुर्का पहनकर चलाती हैं बाइक

मास कम्युनिकेशन की छात्रा आयशा अमीन बुर्का पहनकर बाइक चलाती हैं। आयशा बताती हैं कि मेरे माता-पिता मेरा साथ देते हैं। और जब आपके माता-पिता साथ दें तो किसी के शिकायत करने से कोई फर्क नहीं पड़ता हैं। मेरे बाइक चलाने में मेरी माँ का काफी सहयोग रहा हैं। आसपास के लोगों ने भी कभी गलत नहीं कहा। सब खुश ही होते हैं। मैं समाज में फैली उस मानसिकता को तोड़ना चाहती हूँ जिसमें यह कहा जाता हैं कि मुस्लिम लड़कियां सिर्फ खाना बनाने और पति की सेवा करने के लिए हैं।

कुछ लोग खुश होते हैं तो कुछ सवाल करते हैं

वर्तिका जैन बताती हैं कि जब हम राइड पर होते हैं तो कुछ लोग खुश होकर तारीफ करते हैं तो कुछ लोग फब्तियां भी कसते हैं। मैं सिक्किम गयी थी तो पहाड़ के ऊपर एक महिला बोली मैं चाहती हूँ कि मेरी बेटी आप जैसी हो। वहीं एक दिन हम फैजाबाद रोड पर ग्रुप के साथ जा रहे थे तो कुछ लड़के हमें ओवर टेक करके देखते और फिर पीछे हो जाते थे। हमें इनसब से कोई फर्क नहीं पड़ता है। जब हम कुछ अच्छा करने निकलते है तो कुछ रुकावटें भी आती हैं, हमें रुकावटों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।

संबंधित ख़बरें-

‘आंखों में शर्म नहीं बची जो लड़की होकर खिलाड़ी बनोगी’

जब डकैतों के डर से महिलाएं घरों से नहीं निकलती थीं, तब ये महिला किसान 30 एकड़ की खेती खुद संभालती थी

माहवारी : पुरुषों के लिए भी समझना जरुरी है महिलाएं किस दर्द से गुजरती हैं...

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top