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बाल विवाह रोकना जीवन का मक़सद : मंजू देवी

Neetu SinghNeetu Singh   27 April 2017 3:41 PM GMT

बाल विवाह रोकना जीवन का मक़सद : मंजू देवीविधवा होने के बावजूद वो जिले की कई लड़कियों का बाल विवाह रुकवा चुकी हैं।

स्वयं प्रोजेक्ट

बहराइच। बाल विवाह के एक साल बाद ही विधवा होने के बावजूद वो जिले की कई लड़कियों का बाल विवाह रुकवा चुकी हैं। ताकि उनके जैसे और लड़कियों की जिंदगी न बर्बाद हो।

बहराइच जिले की मंजू देवी का बाल-विवाह हुआ और फिर शादी के एक साल बाद पति का देहांत हो गया। हार न मानने वाली मंजू देवी (25 वर्ष) महिला समाख्या से जुड़कर पिछले नौ वर्षों से कई बाल-विवाह रोक चुकी हैं, अपने आस-पास के 25 गाँव की महिलाओं और किशोरियों को साक्षर और सशक्त बनाने का काम कर रही हैं।

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“जब मैं 8 साल की थी तब मेरी माँ नहीं रही, 14 साल की उम्र में शादी कर दी गयी, शादी के एक साल बाद एक सड़क दुर्घटना में पति नहीं रहे।” ये बताते हुए बहराइच जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर शिवपुर ब्लॉक के सिमरिया गाँव की मंजू देवी भावुक हो जाती हैं।

वो आगे बताती हैं, “जब मेरे पति का देहांत हुआ उस समय तीन महीने की मैं गर्भवती थी, आज नौ साल की मेरी बेटी हो चुकी है, बाल विवाह होने का जो दुःख मैं झेल रही हूं कोई और लड़की सहन न करे इसके लिए बाल विवाह रोकना, महिलाओं और लड़कियों को साक्षर बनाना ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया है।”

बहराइच जिले की मंजू देवी पहली लड़की नहीं हैं, जिनका बाल-विवाह हुआ हो। बल्कि बाल विवाह होना यहां और आसपास के जिलों में अभी भी आम बात है। मंजू देवी का कहना है, “मैं श्रावस्ती जिले की रहने वाली हूं, हमारे यहां 10-14 वर्ष की उम्र में शादी कर दी जाती है, अगर शादी के पति न रहे इसका दोष लड़की के सर ही गढ़ा जाता है, मेरे साथ भी यही हुआ, सास ससुर साथ में रखने को तैयार नहीं हुए।

मायके में पूरी जिंदगी रह नहीं सकती थी इसलिए ससुराल में ही अलग रहने लगी।” पति के देहांत के बाद मंजू की जिंदगी इतनी आसान नहीं थी। एक तो 15 साल की उम्र जहां लड़की कुछ सोच-समझ न सके दूसरा घर से मजदूरी करने के लिए अकेले निकलना समाज को गंवारा न था। मंजू को अपनी बेटी का पालन पोषण करना था इसलिए मजदूरी करना मजबूरी था। मजदूरी करने के साथ ही मंजू ने अपनी पढ़ाई जारी रखी।मंजू बताती हैं, “गाँव में एक मीटिंग में गए थे वहीं पर महिला समाख्या की दीदी से मिले, पढ़े-लिखे थे दीदी का काम देखकर अच्छा लगा, उनके साथ काम करने की इच्छा जाहिर की मैं।”

वो आगे बताती हैं, “मुझे महिला समाख्या के साथ काम करने का मौका मिला, शुरुवात में 10 गाँव की जिम्मेदारी संभालने को मिली। बाल-विवाह रोकना, महिला-किशोरी साक्षर केंद्र में पढ़ाना, इन समूह के साथ मीटिंग करना, इनकी समस्याओं को सुनना, इन्हे अपनी बात कहने के लिए जागरूक करना जैसे तमाम काम शुरू किया।मंजू के लिए घर से अकेले निकलना और मीटिंग करना समाज को मंजूर नहीं था, लोगों ने बहुत तानें दिए। इन तानों की परवाह न करते हुए मंजू ने वो किया जो उसे खुद पसंद था।

गाँव में एक मीटिंग में गए थे वहीं पर महिला समाख्या की दीदी से मिले, पढ़े-लिखे थे दीदी का काम देखकर अच्छा लगा, उनके साथ काम करने की इच्छा जाहिर की मैं।
मंजू देवी, बहराइच

वर्ष 2013 में मंजू के अच्छे काम को देखते हुए 25 गाँव की जिम्मेदारी दे दी गयी। क्लस्टर इंचार्ज के पद पर कार्यरत मंजू का कहना है, “एक समय था जब मैं अकेली थी आज हजारों महिलाएं हमारे साथ जुड़ी है, नारी अदालत में अब तक सैकड़ो केस निपटा चुके हैं, हमारी बेटी 9वीं कक्षा में पढ़ रही है, हमारा मुसीबत का दौर गुजर गया, आज हम महिलाओं के बीच काम करके बहुत खुश हैं।”

वो आगे बताती हैं, “हमारे 25 गाँव की महिलाएं सामूहिक खेती, नारी अदालत में घरेलू हिंसा, बाल विवाह के केस अब खुद सुलझाने लगी हैं, किसी को अगर कोई परेशानी होती है और उसकी समस्या का हम समाधान कर पाते हैं तो हमें बहुत सकून मिलता है।”

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