दो बार दी कैंसर को मात, अब अपने जैसों पर लिख रहीं प्रेरणादायी कॉमिक बुक, अमिताभ बच्चन और रतन टाटा बने सहयोगी

दो बार दी कैंसर को मात, अब अपने जैसों पर लिख रहीं प्रेरणादायी कॉमिक बुक, अमिताभ बच्चन और रतन टाटा बने सहयोगीअपनी किताब के साथ नीलम कुमार।

लखनऊ। नीलम कुमार, सुनने में ये नाम भले ही आम लग रहा हो, लेकिन जब आप इनकी जीवटता की कहानी पढ़ेंगे तो इन्हें आप इन्हें आम से खास समझने लगेंगे। नीलम कुमार दो बार कैंसर को मात दे चुकी हैं और अब उन कैंसर पीड़ितों पर कॉमिक बुक लिख रही हैं जिन्होंने कैंसर जैसी घातक बीमारी को मात दी। नीलम इन प्रेरणादायी संघर्षों की कहानी को जन-जन तक पहुंचाना चाहती हैं। वे इससे पहले सात किताबें लिख चुकी हैं।

अब नीलम के इस प्रयास में बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता अमिताभ बच्चन एवं कारोबारी रतन टाटा भी सहयोगी बनेंगे। ये दोनों कैंसर से लड़ाई जीतने वाली लेखिका नीलम कुमार की आगामी कॉमिक बुक के लिए वित्तीय मदद देंगे ताकि वह कॉमिक पुस्तक प्रकाशित कर सकें। इन कॉमिक पुस्तकों में घातक बीमारी कैंसर को मात देने वालों की प्रेरणादायक कहानियां साझा की जाएंगी।

नीलम ने ‘सेल्फ वी' में कहा, ‘‘मैंने सात किताबें लिखी हैं। हर किताब कैंसर से उबरने वाले और उनकी देखभाल करने वालों की मदद कर रही है। मेरी किताबों की सफलता को देखकर अमिताभ बच्चन और रतन टाटा ने भी कहा है कि वे मेरी अगली दो किताबों को वित्तीय मदद देंगे।'' ‘सेल्फ वी' एक अनूठा अभियान है जिसमें कैंसर से उबर चुके लोग इस बीमारी को मात देने में मिली सफलता की अपनी कहानियां बताते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘यह कैंसर विषय पर प्रकाशित होने वाली पहली कॉमिक पुस्तक होगी।'' ‘सेल्फ वी' का आयोजन पिंक होप कैंसर पेशेंट सपोर्ट ग्रुप और एचसीजी (हेल्थकेयर ग्लोबल एंटरप्राइज लिमिटेड) ने किया था।

सात किताबें लिखने वाली नीलम ने जीवन के प्रति उनका नजरिया बदलने और उनकी लेखनी को और मजबूत करने के लिए कैंसर के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, ‘‘मुझे मेरे जीवन में आने के लिए कैंसर को धन्यवाद देना होगा क्योंकि इसने मेरा नजरिया पूरी तरह बदल दिया और मैं अब ज्यादा दयालु हो गई हूं और मेरा नजरिया पहले से व्यापक हो गया है। मैं एक लेखिका हूं, तो मेरी लेखनी और मजबूत हुई है. नीलम ने कहा, ‘‘मैं कैंसर की शुक्रगुजार इसलिए हूं क्योंकि मैं एक विजेता हूं। मैं इससे गुजर रहे कई लोगों के लिए जीत का चेहरा हूं।

नीलम कुमार की एक बुक का कवर पृष्ठ ।

1996 में, फिर 2013 में कैंसर को हराया

नीलम का बचपन मॉस्को में बीता। वहां उनकी प्रारंभिक पढ़ाई पूरी हुई। कुछ साल बाद नीलम अपने माता-पिता के साथ भारत लौट आती हैं और उनकी आगे की पढ़ाई यहीं पूरी हुई। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में अपनी पीजी तक की पढ़ाई पूरी की। शादी के बाद 1996 में उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हो गया। इस दौरान उनके सबसे बड़े प्रेरणास्त्रोत उनके पति की भी मौत हो जाती है। लेकिन नीलम हिम्मत नहीं हारतीं और कैंसर को मात देकर नए जीवन की शुरुआत करती हैं। 2013 में उन्हें फिर कैंसर हो गया। इस बार जीवन उनके लिए कठिन था। लेकिन इस बार भी उन्होंने दवा के साथ-साथ दर्शनशास्त्र की मदद ली और कैंसर को फिर मात दे दी। नीलम बताती हैं दूसरी बार मैं कैंसर को इसलिए मात दे पाई क्योंकि मेरे साथ मेरी सास, दोस्त और रिश्तेदार थे।

भारत में तेजी से पैर पसार रही कैंसर जैसी घातक बीमारी।

तेजी से बढ़ रही कैंसर रोगियों की संख्या

देश में कैंसर से रोगियों की संख्या हर साल तेजी से बढ़ रही है। इलाज के अभाव में आधे से ज्यादा पीड़ितों की हर साल मौत हो जाती है। मुंह और गले के कैंसर से पीड़ित 10 लाख रोगी सामने आ रहे हैं, जिनमें से आधे से अधिक मरीजों की मौत बीमारी की पहचान होने तक हो जाती है। वायस ऑफ टोबैको विक्टिमस (VOTV) ने एशियन पेसिफिक जनरल ऑफ कैंसर प्रिवेंशन द्वारा जारी रिपोर्ट के आधार पर यह खुलासा किया है। वहीं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014 में जहां कैंसर रोगियों की संख्या 13 लाख 28 हजार थी तो वहीं 2015 में यह बढ़कर 13 लाख 88 हजार हो गई। साल 2016 में तो कैंसर रोगियों की कुल संख्या बढ़कर 14 लाख 51 हजार हो गई है।

2020 तक 20 प्रतिशत तक की वृद्धि

अगर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आंकड़ों की मानें, तो वर्ष 2020 तक कैंसर के मामलों में 20 प्रतिशत तक की वृद्धि की आशंका है। अगर ऐसा होता है तो स्थिति और अधिक खराब हो सकती है। इसे कम करना तभी संभव है, जब बड़े स्तर पर इसके लिए कदम उठाए जाएं और मेडिकल कॉलेजों में सीटों को बढ़ाया जाए। क्योंकि कैंसर कोई एक बीमारी नहीं है और ये कई तरह की होती है। कैंसर 200 से भी ज्यादा तरह की बीमारियों का समूह है और इन सारे तरहों के कैंसर के इलाज के लिए हमारे पास सीटें बहुत कम हैं।


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