इन महिला किसानों ने बनायी अपनी अलग पहचान

इन महिला किसानों ने बनायी अपनी अलग पहचानमहिला किसान दिवस 15 अक्टूबर

लखनऊ। जब हम कामकाजी महिलाओं की बात करते हैं, तो सभी के मन में हर दिन दफ्तर जाने वाली महिलाओं की छवि बन जाती है, लेकिन हम खेत में हर दिन काम करने वाली करोड़ों महिलाओं को भूल जाते हैं। इन्हीं करोड़ों महिलाओं को उनका हक और उनकी आवाज बनने के लिए केंद्र सरकार ने उन्हें वर्ष में अपना एक पूरा दिन दिया है। आज उन्हीं महिला किसानों का दिन है। आज कुछ ऐसी ही महिलाओं के बारे में बता रहे हैं, जिन्होंने पुरुष प्रधान कृषि क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनायी।

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भारतीय जनगणना 2011 के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में छह करोड़ से ज़्यादा महिलाएं खेती के व्यवसाय से जुड़ी हैं। महिला किसान दिवस की मदद से खेती- किसानी को व्यवसाय के तौर पर अपनाने के लिए महिलाओं को जागरूक किया जाएगा। अपने क्षेत्र की कृषि में बड़े योगदान के लिए महिला कृषकों को सरकार व्दारा सम्मानित भी किया जाएगा। इसके अलावा कृषि क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण के लिए महिला किसान दिवस के ज़रिए कई जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे।

आज उन्हीं महिला किसानों का दिन है। ऐसी ही कुछ महिला किसानों की बात करते हैं जिन्होंने अपनी अलग पहचान बनायी।

रामरती मिश्रित खेती में एक साथ उगाती हैं तीस से भी ज्यादा फसलें

गोरखपुर। बदलते समय के साथ जहां संयुक्त परिवार, एकल परिवार में बदल रहे हैं जिससे छोटी जोत के किसानों की संख्या बढ़ रहीं है, वहीं पर एक ऐसी भी महिला किसान है, जो कम जमीन में ही तीस से भी अधिक फसलें एक साथ उगा कर दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन रहीं हैं।

रामरती देवी अभी भी खुद ही खेत में सारा काम करती हैं, जिसमें उनके परिवार के सदस्य भी पूरी मदद करते हैं

गोरखपुर से उत्तर दिश में लगभग 40 किमी. दूर कैम्पियरगंज विकासखंड के सरपतहा गाँव की रामरती देवी आज छोटी जोत के किसानों के लिए मिसाल बन रहीं हैं। रामरती पढ़ी लिखी न हाने पर भी एक साथ कई फसलों को उगाने का हुनर जानती हैं। अपने खेती के ज्ञान से कृषि वैज्ञनिकों को भी हैरान कर देती हैं। उनकी लगन और सफलता देखकर जिला कृषि अधिकारी व कृषि वैज्ञानिक उनके खेत में आते रहते हैं।

उम्र के पांच बसंत पार कर चुकी रामरती ने कभी स्कूल का मुंह भी नहीं देखा है, लेकिन खेती के बारे में उनकी समझ ऐसी है कि बड़े-बड़े कृषि वैज्ञानिक और जानकार दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं।

रामरती बहुफसली और मिश्रित खेती करती हैं। जमीन के नीचे आलू बोती हैं तो हैं तो उसी जमीन पर ऊपर मिर्चे के पेड़ लगा देती हैं। उसके साथ ही मचान बनाकर कई ऊपर लता वाली सब्जियां जैसे तरोई और लौकी की तीसरी फसल भी उगा लेती हैं। मेड़ के किनारे लगे केला गन्ने और अमरूद के पेड़ खेती में बोनस का काम करते हैं।

सरपतहा समेत आसपास के कई गाँवों में धान, गेहूं और गन्ने की फसलें ही प्रमुखता से उगाई जाती रही हैं। तो रामरती ने वहां खेती की परिभाषा बदल दी। उन्होंने सब्जियों की खेती बड़े पैमाने पर शुरू की। रामरती के परिवार में कुल 12 सदस्य हैं, जिनका खर्च खेती से होने वाले फायदे से चलता है, रामरती अपने खेत में रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग बिल्कुल भी नहीं करती हैं। रामरती गोबर, फसल अवशेष, हरी सब्जियों के अपशिष्ट से खाद बनाती हैं और वही खेत में डालती हैं।

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रामरती अपने खेती के बारे में बताती हैं, ''ज्यादातर लोग अपने खेत में दो-तीन फसल लेते हैं लेकिन मैंने अपने खेत में लौकी, हल्दी, प्याज, लहसुन, लोबिया जैसी 35 फसलें बोई थी। अब ये हाल है कि कुछ चीजों को छोड़कर मेरे यहां कुछ भी बाजार से नहीं खरीदना पड़ता।''

बाज़ार ने नहीं खरीदतीं धान के बीज

महिला किसान दिवस 15 अक्टूबर

रामरती केले को पकाने के लिए किसी भी तरह के रसायन का प्रयोग नहीं करती हैं, रामरती केला पकाने की विधि के बारे में बताती हैं, "एक गड्ढा खोदकर उसमें केले पत्ती पत्ती बिछा देते हैं, फिर उस पर केला रखकर पत्ती से ढ़ककर मिट्टी डाल दी जाती है। गड्ढों के बगल में ही एक छोटे से मटके में भूसा भरकर उसमें आग लगा दी जाती है, भूसे के धुंए की गर्मी से केला धीरे-धीरे पक जाता है।'' रामरती खेत में नीचे हल्दी, लहसुन प्याज जैसी फसलों को लगा देती है फिर उसके ऊपर लता वाली सब्जियों को चढ़ा देती हैं। साथ ही खेत के मेड़ों पर केला और गन्ना लगा देती हैं। रामरती धान के बीज बाजार से नहीं खरीदती हैं रामरती धान की फसल के बारे में बताती हैं, ''सरजू 52 धान को मैं पिछले 18 साल से लगा रहीं हूं हर साल धान में से अच्छी फसल देखकर काटकर उसे बीज के लिए अलग कर लेती हूं इससे नया बीज खरीदने की कभी नौबत ही नहीं आती है।''

कृषि क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए मिला है सम्मान

रामरती को कृषि क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए साल 2011 में सीआईआई आदर्श महिला अवार्ड से सम्मानित किया गया। उन्हें कई राज्य और जिला स्तरीय किसान मेलों में भी सम्मानित किया गया है।

गाँव की महिलाओं को दिलाया किसान का दर्जा

सुलतानपुर। यह कहानी है एक महिला मजदूर के किसान बनने की। एक ऐसी महिला की जिसने पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं पर लगाई गई तमाम बंदिशों के खिलाफ लड़ाई छेड़ी। सैकड़ों महिलाओं के नाम पर राशन कार्ड बनवाए, ज़मीन का पट्टा दिलाया, सरकारी आवास दिलाए।

लल्ला देवी

सुलतानपुर जि़ला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर कूरेभार ब्लॉक के रामनाथपुर गाँव में, पिछले एक दशक में महिलाओं की स्थिति में जो भी परिवर्तन आए उनमें इसी गाँव की निवासी लल्ला देवी (55 वर्ष) का बड़ा योगदान है। पति के नौकरी के लिए मुम्बई चले जाने और ससुर के देहांत के बाद एक समय ऐसा आया था जब परिवार में खेती करने वाला कोई नहीं बचा, परिवार के खाने-पीने के लाले पड़ गए थे।

ऐसे में लल्ला ने समाज के तमाम तानों को नज़रअंदाज करते हुए अपने खेतों में बच्चों की मदद से खुद हल चलाया और परिवार का भरण-पोषण किया। इन सब घटनाक्रम से मिले आत्मविश्वास ने लल्लादेवी को प्रेरित किया कि वे अपनी ही तरह गाँव-समाज की अन्य दबी-कुचली महिलाओं को भी संघर्ष का साहस दें। इसके बाद शुरू हुई लल्ला के एक साधारण महिला किसान से सामाजिक कार्यकर्ता बनने की कवायद।

पांच साै से अधिक महिलाओं को दिलवा चुकी हैं उनके अधिकार

लल्ला देवी ने एक गैर सरकारी संस्थान के साथ मिलकर अपने क्षेत्र में अभियान छेड़ा और महिलाओं को ऐसी सरकारी योजनओं में हक दिलाया जिनमें पुरुषों को आधिकार माना जाता था। पिछले एक दशक में लल्ला देवी पांच सौ से ज्यादा महिलाओं को ज़मीन के पट्टे सरकारी आवास, राशन कार्ड पर नाम, खेती की ज़मीन में पति के साथ नाम जैसे अधिकार दिलवा चुकी हैं।

"महिलाओं की मदद करने का सबसे बड़ा उद्देश्य मेरा यही है कि वो अपने हक और अधिकार जाने और उनका इस्तेमाल करें। मेरे गाँव में कई ऐसी महिलाएं है जो किसी के सामने बोलने से भी डरती थीं, आज वो अपने हक के लिए खुद लड़ाई लड़ रही हैं।" लल्ला देवी बताती हैं।

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लल्ला बताती हैं, "महिलाओं की समस्या के अनुसार लोगों से मिलना होता है। अब तो अधिकतर अधिकारी भी जान गए हैं। जिनसे एक बार कहने पर ही काम बन जाता है।" लल्ला आगे बताती हैं, "अधिकारी नहीं सुनता तो (महिलाओं को) उनका हक दिलाने के लिए धरना भी देते हैं।"

डेयरी के माध्यम से महिलाओें को बना रहीं आत्मनिर्भर

सीतापुर। जिले के मिश्रिख ब्लाक के कुंवरापुर गाँव की सुधा पांडेय आज अपने क्षेत्र में एक सफल डेयरी संचालक के नाम से मशहूर हैं, यही नहीं आज सैकड़ों महिलाओं को डेयरी पालन भी सिखा रही हैं।

सुधा पांडेय के पास हैं अब पचास से अधिक दुधारू पशु।

लेकिन सुधा पांडेय की राह इतनी आसान नहीं थी, वर्ष 1988 में जब उनकी शादी राम नरेश से हुई तो उनकी घर की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी न थी। उनके पति के चचेरे भाइयों ने धोखे से उनकी सारी जमीन हड़प ली थी। कई वर्षों तक मुकदमा चलने बाद केस कोर्ट में चला गया। कई वर्षों तक मुकदमा चलने के बाद सुधा केा लगा की ऐसे ही मुकदमे में फंसकर पैसे बर्बाद करते रहे तो अपने तीन बच्चों की भी परवरिश न कर पाएंगे। उन लोगों मुकदमा वापस ले लिया।

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घर चलाने के लिए के लिए जरदोजी, कढ़ाई सिलाई सब काम किया, लेकिन फिर भी सफलता नहीं हासिल हुई। बच्चों को महर्षि आश्रम भेज दिया जहां पर नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है।

ऐसे में सुधा ने ऋण लेकर भैंस खरीदी और दूध बेचकर घर का खर्च चलाने लगी। वर्ष 2010 में सुधा ने सोचा क्यों न स्वयं सहायता समूह बनाकर कुछ काम किया जाए, लेकिन गाँव की महिलाएं मानने को तैयार नहीं थी। बहुत मनाने पर महिलाएं तैयार हुई इन लोगों ने विशाल महिला किसान क्लब नाम से स्वयं सहायता समूह बना लिया। नाबार्ड की सहायता से उन्हें विशेष सहायता से दस भैसों को ऋण पर खरीदा और जिसके दूध को बेचकर दूसरी महिलाओं को रोजगार मिल गया।

मिल चुका है गोकुल पुरस्कार

महिला किसान दिवस 15 अक्टूबर

कुछ ही वर्षों में उनके समूह में सैकड़ों महिलाएं जुड़ गयी हैं। उन्हें गोकुल पुरस्कार भी मिल चुका है। आज वो अपने साथ ही दूसरी महिलाओं की जिंदगी बदल रही हैं। प्रदेश सरकार की कामधेनु योजना का भी लाभ लिया है। हर दिन उनके यहां आस-पास के गाँव की पचास से अधिक महिलाएं हर दिन दूध लेकर आ जाती हैं। सुधा बताती हैं, "मैंने अब तक 13 बीघा जमीन भी खरीद ली है, जिसमें मैं अपने पशुओं के मल मूत्र से निर्मित केंचुए की खाद जिसको मैंने 500 वर्ग फिट क्षेत्र में बनाया है प्रयोग करती हूं। मुझे खुशी है कि गाँव वाले अब मेरी तरह ही अपनी औरतों और बेटियों को बनने की सलाह देते हैं।"

कम ज़मीन में मुनाफे की खेती कोई इनसे सीखे

लखनऊ। हर साल गाँव में आने वाली बाढ़ से किसानों को नुकसान उठाना पड़ता क्योंकि उनके खेत का ज्यादातर भाग में पानी ही भरा रहता है, ऐसे में महिला किसान ने दूसरे किसानों को कम क्षेत्र में ज्यादा फसलें लगाकर मुनाफा कमाने का रास्ता दिखाया।

खेती-बाड़ी के साथ रामरती मछली, मुर्गी और पशुपालन से भी फायदा कमा रहीं हैं।

संतकबीर नगर जिले के मेहदावल विकासखंड के गाँव साड़ेकला में एक तरफ राप्ती नदी बहती है तो दूसरी तरफ पनघटवा नाला, जिससे हर साल बारिश में बाढ़ व जलभराव की स्थिति हो जाती है। गाँव में ज्यादातर छोटे जोत के किसान होने से खेती नहीं हो पाती।

इसी गाँव की रामरती का चयन का चयन पैक्स परियोजना के तहत हो गया, जिसमें रामरती को खेती प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया। इसके बाद रामरती ने अपने घर के पास दस बिस्वा जमीन में खेती करनी शुरू की। उन्होंने उस खेत में पहले नीचे धनियां, गोभी, मूली, पालक जैसी सब्जियां बो दी साथ ही ऊपर मचान बनाकर लता वाली सब्जियां चढ़ी दीं।

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रामरती देवी बताती हैं, ''पहले हमें खेती से इतनी आमदनी नहीं होती थी की घर का खर्च चल पाए। मेरा बेटा भी मुम्बई चला गया था लेकिन अब अच्छी आमदनी होने लगी है। बेटा भी घर वापस आकर मेरी मदद करवाता है उसने खेती की ही कमाई से मोटरसाइकिल खरीद ली है।''

घर के पास ही एक छोटा सा गड्ढा जिसमें उन्होने पानी भरा कर उसमें मछली पाल दी और गड्ढे के एक किनारे ही एक छोटा सा बाड़ा बनाकर मुर्गियां पाली हैं, मुर्गियों का बीट गड्ढों में गिरकर मुर्गियों का बीट मछलियों के आहार के काम आ जाता है। रामरती को देखकर दूसरी महिलाएं भी मिश्रित खेती करने लगी हैं।

रामरती अब दूसरी महिलाओं को भी मिश्रित खेती की नई तकनीक बताती हैं, जिससे वो महिलाएं भी खेती से बेहतर कमाई कर सकें। कई महिलाएं उनसे जुड़ भी गई हैं।

मिर्च और मेंथा की खेती कर कमा रहीं मुनाफा

लखनऊ। अम्बेडकरनगर जिले के चाचीपुर गाँव की रहने वाली महिला किसान इसलावती (42 वर्ष) आज अपने क्षेत्र में सब्जियों की खेती के सफल किसान के रुप में जानी जाती हैं।

अपने सफल किसानी के अनुभव को साझा करते हुए इसलावती बताती हैं, "मेरे मायके मिर्च की खेती होती थी, जब ससुराल आयी तो यहां पर भी मैंने मिर्च की खेती की शुरु कर दी। आज हम अपने सात बीघा खेत में केवल सब्जी और मेंथा की फसल उगाते हैं।

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आज इसलावती घर से ज्यादा समय खेत में बिताती हैं। वो बताती हैं, "खेत में हमारा पूरा परिवार कड़ी मेहनत करता है। खेती कोई घाटे का काम नहीं है, मैंने पिछले साल से अब तक एक लाख का मेंथा ऑयल और 40 हजार का मिर्च बेचा हैं। अभी हर दिन रोज 1000 रुपए का मिर्च, 200 का दूध बेच लेते हैं।

महिलाओं को देती हैं जैविक खाद बनाने का प्रशिक्षण

लखनऊ। मुन्नी देवी (55 वर्ष) जब ब्याहकर ससुराल आयीं तो घूंघट के बिना घर से भी निकलना मुश्किल था, लेकिन आज वहीं मुन्नी देवी सैंकड़ों महिलाओं को जैविक खाद बनाने का प्रशिक्षण दे रही हैं। ऐसी ही कृषि क्षेत्र में अलग करने वाली पांच महिला किसानों को सम्मानित किया गया।

शाहजहांपुर जिले के भावलखेड़ा ब्लॉक के जलालपुर गाँव के रहने वाली मुन्नी देवी अपने बारे में बताती हैं, "जब ससुराल आयी तो बिना घूंघट के घर से निकलना भी मुश्किल था, लेकिन जब घर में बंटवारा हुआ तो घर की हालत ठीक नहीं रही। तब मुझे विनोबा सेवा आश्रम के बारे में पता चला तब पति से हिम्मत करके आश्रम में वर्मी कम्पोस्ट बनाने का प्रशिक्षण लिया और प्रशिक्षण खाद बनाने काम शुरू कर दिया।" मुन्नी देवी फसल चक्र और फसल प्रबन्धन को बेहद जरूरी मानती हैं। तीन बीघा में सब्जी व पांच बीघा जमीन में गेंहू व चार बीघा में गन्ने की फसल उगा रहीं हैं, गन्ने के साथ मूंग उर्द मसूर लहसून प्याज आलू सरसों आदि की सहफसली खेती करती हैं जिससे परिवार का खर्च निकल आता है। अब मुन्नी देवी दूसरी महिलाओं को भी वर्मी कम्पोस्ट बनाने का प्रशिक्षण देती हैं।

वर्मी कम्पोस्ट बनाकर मुनाफा कमा रही महिला किसान

सीतापुर। जहां एक तरफ महिला किसानों को किसान का हक नहीं मिलता वहीं एक महिला किसान ने पट्टे पर जमीन लेकर वर्मी कम्पोस्ट बनाकर बेचना शुरू किया और गाँव की दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा बनीं।

सीतापुर जिले के विसवां ब्लॉक के पुरैनी गाँव की सावित्री देवी (45 वर्ष ) के पास जमीन नहीं थी, दूसरी महिलाओं की तरह ही वो दूसरों के खेत में मजदूरी करती थीं, लेकिन आज सावित्री वर्मी बनाकर न सिर्फ अपने खेत को उपजाऊ बना रही हैं, बल्कि दूसरे किसानों को भी बेच रही हैं। सावित्री की मदद की अटरिया कृषि विज्ञान केन्द्र की वैज्ञानिक डॉ. सौरभ ने।

सावित्री देवी बताती हैं, "हमारे पास खेत तो है नहीं कृषि विज्ञान केन्द्र की मैडम से खाद बनाने के बारे में पता चला, पहले मैं एक बीघा जमीन पट्टे पर लेकर सब्जियों की खेती करती थी, अब केवीके से जानकारी लेकर शुरु में कम्पोस्ट बनाकर अपने ही फसल में डालती थी अब बनाकर दूसरे किसानों को बेचती भी हूं।" सावित्री देवी लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह चलाती हैं, जिसमें उनके साथ 15 महिलाएं और भी जुड़ी हैं। महिलाएं वर्मी कम्पोस्ट के साथ ही हैंड क्राफ्ट का सामान भी बनाती हैं।

सावित्री आगे कहती हैं, "मेरे समूह से 15 और भी महिलाएं जुड़ी हैं, जो वर्मी कम्पोस्ट बनाने में मेरी मदद करती हैं। इससे उन्हें भी घर बैठे ही आमदनी हो जाती है। " अटरिया कृषि विज्ञान केन्द्र की वैज्ञानिक डॉ. सौरभ बताती हैं, "सावित्री केन्द्र से 2014 से ही जुड़ी है, शुरू में तो हैंडी क्राफ्ट का काम ही सिखाया गया था। उसके बाद उसे वर्मी कम्पोस्ट बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। इससे उसकी फसल तो अच्छी हो ही रही है, कम्पोस्ट को दूसरे किसानों को भी बेचती हैं। उनके पास ज्यादा पशु हैं नहीं तो वो और उनकी समूह की महिलाएं गोबर खरीदकर वर्मी कम्पोस्ट बनाकर बेचती हैं। शुरू में तो इन्हें दिक्कत होती थी अब किसान खुद उनके खेत में जाकर खाद खरीदते हैं।

राज्यपाल ने भी किया सम्मानित

सावित्री देवी को सम्मानित करते राज्यपाल

सावित्री देवी को लखनऊ में भारतीय गन्ना अनुसधांन संस्थान में आयोजित उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के कृषि विज्ञान केन्द्रों की 23वी वार्षिक क्षेत्रीय कार्यशाला में वर्मी कम्पोस्टिंग को बढ़ावा देने के लिए राज्यपाल रामनाइक द्वारा प्रमाणपत्र तथा स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

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