समाज के तानों को दर-किनार करते हुए जानिए कैसे शिक्षा की अलख जगा रहीं साजदा

Devanshu Mani TiwariDevanshu Mani Tiwari   8 Sep 2017 2:32 PM GMT

समाज के तानों को दर-किनार करते हुए जानिए कैसे शिक्षा की अलख जगा रहीं साजदाछात्राओं को उर्दू की तालीम देती साजदा।

स्वयं प्रोजेस्ट डेस्क

सहारनपुर। अगर किसी के अन्दर कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो कोई भी मुश्किल उसके हौसले को रोक नहीं सकती फिर चाहे वह समाज ही क्यों न हो। हम बात कर रहे हैं साजदा की। “गूजरों के गाँव में जाकर उर्दू पढ़ाओगी” वो हिंदुओं का गाँव है वहां उर्दू कौन पढ़ेगा, कहीं और ट्रांसफर ले लो”। लोगों के लाख मना करने के बाद भी साजदा (35 वर्ष) देवबंद ब्लॉक के बाबूपुर गाँव के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में उर्दू पढ़ा रही हैं।

बाबूपुर गाँव शब्बीरपुर से महज़ चंद किलोमीटर की दूरी पर है और इलाके में अभी भी भीम आर्मी और गूजरों का वर्चस्व है। बाबूपुर गाँव के कस्तूरबा गांधी विद्यालय में 100 लड़कियां हैं। विद्यालय में कक्षा छह, सात, आठ में उर्दू पढ़ा रही साजदा बताती हैं, “हमसे पहले स्कूल में उर्दू की टीचर थी, लेकिन 2006 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी। 2011 में हमें वहां पर नौकरी मिली। गूजरों के गाँव में आये दिन होने वाले दंगों की वजह से लोगों ने वहां पढ़ाने के लिए बहुत मना किया, लेकिन इतने मुश्किल से मिली नौकरी को मैं कैसे छोड़ सकती थी।”

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साजदा ने उर्दू में बीए, एमए और आदिम कामिल की पढ़ाई अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से की और इसके बाद उन्होंने हिंदी से बीएड की परीक्षा भी पास की। साजदा महिला समाख्या, सहारनपुर में सहयोगिनी के पद पर काम भी करती हैं।

क्षेत्र में उर्दू की एक मात्र शिक्षिका होने के कारण लोगों से मिलने वाले सम्मान से साजदा की हिम्मत और अधिक बढ़ जाती है। साजदा बताती हैं, “बाबपुर और नगली में गूजरों के परिवार ज्यादा हैं पर धीरे-धीरे ही सही यहां के लोग अब उर्दू सीखने पर ज़ोर दे रहे हैं। प्रदेश में अभी भी उर्दू ट्रांस्लेटरों की बहुत कमी है, इसलिए मैं भी स्कूल के बच्चों को इस क्षेत्र में आगे आने के लिए कहती हूं, बच्चें भी उर्दू बड़े चाव से पढ़ते हैं।” साजदा कहती हैं, ‘’आज बड़े-बड़े प्राइवेट स्कूलों में अंग्रेज़ी और फ्रेंच भाषाओं की क्लास अलग से लगती है, लेकिन उर्दू सीखने-सिखाने के लिए लोग कम दिलचस्पी दिखाते हैं। लोगों को उर्दू की ज़रूरत समझनी होगी। सरकार को भी उर्दू शिक्षा को अधिक तवज्जो देनी चाहिए।

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मदरसों तक ही सीमित है उर्दू की शिक्षा

सहारनपुर जिले में देवबंद क्षेत्र वैसे तो उर्दू शिक्षा के लिए ही जाना जाता रहा है, लेकिन यहां पर उर्दू शिक्षा का दायरा सिर्फ मदरसों तक ही सीमित रह गया है। प्राथमिक शिक्षा और कस्तूरबा गांधी विद्यालयों में अभी भी उर्दू शिक्षा का वजूद कम है। विद्यालय में रसूलपुर, रूडोडा, गुनारसा, कुरलकी और देवबंद क्षेत्रों के गाँवों के बच्चे पढ़ते हैं। इन सभी क्षेत्रों के लोग आज साजदा को उर्दू टीचर के नाम से जानते हैं।

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