अपने फ़ैसले खुद ले रहीं हैं इस गाँव की महिलाएं 

Divendra SinghDivendra Singh   16 March 2017 5:59 PM GMT

अपने फ़ैसले खुद ले रहीं हैं इस गाँव की महिलाएं आज वो महिलाएं पुलिस या संबंधित अधिकारी से बात करके अपने मामले खुद ही निपटा लेती हैं।

दिवेन्द्र सिंह ,स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

घोसी (मऊ)। जिन महिलाओं के पति उन्हें शराब पीकर मार-पीट करते थे, जिनको मनरेगा में काम नहीं मिलता था। आज वो महिलाएं पुलिस या संबंधित अधिकारी से बात करके अपने मामले खुद ही निपटा लेती हैं।

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मऊ ज़िला मुख्यालय से लगभग 22 किमी उत्तर दिशा में घोसी ब्लॉक के गौरीडीह की महिलाओं की जिंदगी पांच-छह साल पहले तक इतनी आसान नहीं थी। पढ़ी-लिखी न होने के कारण आए दिन ठगी का शिकार होती। मनरेगा में इन महिलाओं की भागीदारी न के बराबर थी।

ऐसे गैर सरकारी संस्था भगवान मानव कल्याण समिति की निदेशक पूनम सिंह ने गाँवों में जाकर महिलाओं को पढ़ाना-लिखाना शुरू किया। अपने काम के शुरूआत के बारे में पूनम सिंह बताती हैं, “जब मैंने गाँव में जाना शुरू किया तो कई ग्राम प्रधानों ने मुझे जान से मारने की भी धमकी भी दी। कोटेदार उन्हें न के बराबर अनाज देते, उनके पति उन्हें मारते पीटते थे।”

आज घोसी ब्लॉक के 72 ग्राम पंचायतों में महिलाओं ने अपने-अपने समूह बना लिए हैं। वो प्रधान से जाकर काम मांग लेती हैं। जिले और ब्लॉक के अधिकारियों के नंबर उन्हें याद है। यही नहीं महिलाएं ब्लॉक और जिला स्तर के सभी काम खुद जाकर ही करती हैं।

घोसी ब्लॉक के गौरीडीह के गाँव के पास में ही चार ईट भट्ठे हैं, जहां पर झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेशों के मजदूर काम करने आते हैं। चार साल पहले इन भट्ठों पर देसी शराब बनती थी, जहां से शराब पीकर गाँव के पुरुष अपनी पत्नियों के साथ मार-पीट करते थे। कई साल तक ऐसे ही चलता रहा और महिलाएं चुप थीं। एक दिन सैकड़ों की संख्या में महिलाएं ईट भट्ठों पर पहुंच गई और वहां की सारी शराब भट्ठियों को तोड़ दिया।

गौरीडीह गाँव में बने महिला समूह सीतानारी संघ की सदस्य माया देवी (40 वर्ष) बताती हैं, “हम लोग इतने गरीब है, पति मजदूरी करते हैं, जितना कमाते सबकी शराब पी जाते। कई साल तक हम लोग चुप रहे। लेकिन एक दिन हम सभी कई गाँव की महिलाओं ने एक साथ भट्ठे पर पहुंच गए।”

पहले तो महिलाओं के पतियों ने इनका विरोध ही किया, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें समझ आ गया कि उनके हित में ही काम हो रहा है। वो आगे कहती हैं, “हमने पुलिस को पहले ही बता दिया था कि हम भट्ठे पर जा रहे हैं। एक बार तो उन्होंने शराब बनानी बंद कर दी, लेकिन कुछ दिनों में फिर शुरु कर दिए, तब हम दोबारा उसे बंद कराने पहुंच गए।” गाँव की महिलाओं के प्रयास से ईट भट्ठे पर अब शराब बननी बंद हो गयी है।

गाँव की शांति का पति आए दिन शराब पीकर उसे मारता-पीटता एक दिन माया देवी अपने साथ की महिलाओं के साथ उसके घर पहुंचकर उसे पकड़, उसके खिलाफ घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज करा दिया।

गाँव की दुर्गावती (45 वर्ष) कहती हैं, “पहले तो हमें लगता था कि शांति के घर का मामला है, इसलिए हम लोग चुप रहते। जब बात बहुत आगे बढ़ गयी तो हम लोग उसके घर पहुंच गए। अब शांति का पति बाहर मजदूरी करने लगा है और अपने बच्चों के साथ रहती है।”

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