सवाल : महिला पशुपालकों को कब मिलेगी पहचान ?

सवाल : महिला पशुपालकों को कब मिलेगी पहचान ?पशुपालन के क्षेत्र में ग्रामीण महिलाओं का एक अहम योगदान।

पशुपालन का काम और कारोबार सीधे तौर पर महिलाओं से जुड़े हैं। गांवों में तो ज्यादातर महिलाएं ही चारा-पानी से लेकर दूध निकालने का काम करती हैं, लेकिन क्या उन्हें इस काम के एवज में पैसे या फिर सम्मान मिलता.. शायद नहीं..

पशुपालन के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका सिर्फ एक मदद मानी जाती रही है, लेकिन इस क्षेत्र में ग्रामीण महिलाओं का एक अहम योगदान होने के बावजूद उनके काम को तवज्ज़ो नही दी जाती जिससे उनको पशुपालन में कोई भी लाभ नहीं मिलता है।

रोज की तरह सुबह चार बजे उठकर सिर पर पल्ला लिए पुष्पा रावत (28 वर्ष) पशु बाड़े की साफ-सफाई करती है, गोबर उठाती है, पशु को चारा-पानी लगाती है जहां पर दूध निकाला जाता है उस खूंटे पर बांधती है। इतना करने पर भी उनको इसका कोई मेहनताना नहीं मिलता है। पुष्पा बताती हैं, "हमारे यहां 7 सात पशु है। दूध दुहने को छोड़कर उनका सारा काम मैं करती हूं। दूध हमारे ससुर दुहते है। घर की बहू हूं तो घर काम भी करना पड़ता है।" पुष्पा लखनऊ जिले से करीब 25 किमी. दूर बक्शी का तालाब ब्लाँक के रामपुर देवरई गाँव की रहने वाली है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और डीआरडब्लूए की ओर से नौ राज्यों में किये गये एक शोध से पता चलता है कि पशुपालन में महिलाओं की भागीदारी 58 प्रतिशत और मछली उत्पादन में यह आंकड़ा 95 प्रतिशत तक है। सिर्फ इतना ही नहीं, नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (NSSO) के आंकड़ों की मानें तो 23 राज्यों में कृषि, वानिकी और मछली पालन में ग्रामीण महिलाओं का कुल श्रम की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत है। इसी रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और बिहार में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी का प्रतिशत 70 प्रतिशत रहा है। फिर भी महिलाओं को इस क्षेत्र में काम करने पर कोई भी लाभ नहीं है।

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"हमारे पति तांगा चलाते है पर घोड़े की पूरी देखभाल हम करते है।घोड़ों को ठीक चारा-पानी नहीं दिया तो उनके पेट में दर्द हो जाता है जिससे घोड़ा मर भी जाता है ऐसे में घोड़ों का बहुत ध्यान रखना पड़ता है। इसी से हमारे परिवार का खर्चा चलता है।" ऐसा बताती हैं, रामदेवी कुमारी (31 वर्ष)। रामदेवी शाहजहांपुर जि़ला मुख्यालय से लगभग आठ किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में ददरौल ब्लॉक के शहबाजनगर गाँव की रहने वाली है। इनके गाँव में करीब 15 महिलाएं ऐसी है जो घोड़ों की पूरी देखभाल करती है, जिससे उनका जीवनयापन होता है।

महिलाओं को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश में शुरु होने वाली योजना के बारे में पशुधन विभाग के प्रमुख सचिव डॉ सुधीर एम बोबडे बताते हैं, "अभी महिलाओं के लिए कोई नहीं योजना प्रस्तावित नहीं की है लेकिन जल्द ही छह से आठ पशुओं की नई योजना आ रही है जिसमें हम महिलाओं को प्राथमिकता देंगे। इस योजना के तहत जितना भी दुग्ध उत्पार्जन होगा पराग के पास हम प्राथमिकता देंगे कि महिलाओं के नाम से खाते खुले जिससे उनके खाते में ऑनलाइन पैसा दिया जाएगा। इस योजना के तहत महिलाओं को समितियों में जोड़ा जाएगा। इससे हमारे पास भी डाटा होगा कि कितनी महिलाएं हमारे साथ जुड़ी हुई है। इससे महिलाएं आत्मनिर्भर होंगी।"

पशुपालन के क्षेत्र में ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वर्ष 2013 में प्रदेश में दुग्ध विकास विभाग के तत्वावधान में पीसीडीएफ द्वारा महिला डेयरी परियोजना की शुरुआत की गई। इस योजना के तहत महिलाएं साथ आकर परियोजना के अंतर्गत समिति गठित करती थी। समिति में एक अध्यक्ष और एक सचिव होता था। सरकार द्वारा इन समितियों को पशु बीमा, प्राथमिक चिकित्सा, पशु आहार, मुफ्त दवाईयां, और हरे चारे के बीज आदि उपलब्ध करवाए जाते थे। ताकि महिलाओं को भटकना न पड़े। इस योजना का प्रदेश के कई जिलों की महिलाओं ने लाभ उठाया लेकिन बजट न आने के चलते इस योजना को बंद कर दिया गया।

लखनऊ जिले से 25 किमी. दूर बक्शी का तालाब ब्लाँक के भिखापुरवा गाँव में रहने वाली सुमन यादव(35 वर्ष) के पास करीब 10 पशु है जिनका पूरा काम सुमन खुद करती है। सुमन बताती हैं, "दूध को कहां बेचना यह सब हमारे पति देखते है बाकी का पूरा काम मैं करती हूं। कभी-कभी मेरी बेटी हाथ बटा लेती है। पशुओं को किस समय क्या देना है और कितना देना चारा पानी देना इसका पूरा ध्यान हमी को रखना पड़ता है। इन पशुओं के दूध से ही हमारी कमाई होती है इसलिए ज्यादा ध्यान भी देना होता है।"

डेयरी में अपने पशुओं का दूध की सप्लाई करती महिला। फोटो: गाँव कनेक्शन

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हाल ही में प्रदेश के दुग्ध विकास मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी ने एक कार्यक्रम में कहा, "अब नई दुग्ध समितियों में महिलाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। महिलाओं को इन समितियों में प्राथमिकता देने का उद्देश्य किसानों की आर्थिक हालत को मजूबत करना है।महिलाएं बचत की प्रवृत्ति रखती हैं, इसलिए जब उनको भुगतान किया जाएगा तो वह कुछ पैसे जरूर बचाएंगी जो उनकी माली हालत को मजबूत करेगा। अब सीधे महिला के खाते में बेचे गए दूध का पैसा भेजने की व्यवस्था की जा रही है।"

जहां पशुपालन क्षेत्र में अहम भूमिका निभाने के बावजूद भी महिलाओं को गिना नहीं जाता है। वहीं कानुपर देहात जिले के औरंगाबाद डालचंद गांव की छिदाना देवी (77 वर्ष) ने दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में मिसाल कायम की है। छिदाना देवी ने भैंस पालन में प्रति पशु 14 लीटर रोजाना दूध का उत्पादन करके इन्होंने प्रदेशभर में पहला स्थान प्राप्त किया है। छिदाना देवी बताती है '' मैंने अपनी पशुओं की देखभाल अपने बच्चों की तरह की। वहीं उनकी सबसे बड़ी पूंजी हैं। इसमें उनके घरवालों का भी पूरा सहयोग मिला। जिसका नतीता आप लोगों के सामने हैं।''

बाराबंकी ज़िला मुख्यालय से पूर्व में लगभग 45 किलोमीटर दूर अलादपुर गाँव की रीता सिंह (45 वर्ष)पिछले दो वर्षों में डेयरी के ज़रिए न सिर्फ खुद की माली हालत सुधारी बल्कि गाँव की अन्य महिलाओं को भी सशक्त बनाया है। रीता सिंह बताती हैं, "महिला डेयरी योजना मैंने ली थी। इसमें एक समिति बनाई थी इस समिति की मैं अध्यक्ष हूं। पशुओं का सारा काम ज्यादातर महिलाएं ही करती हैं पर उनको कोई लाभ नहीं मिल पाता था। इस योजना से महिलाओं को रोज़ पैसे मिलते हैं, जिससे वह बचत भी कर पाती है। महिलाओं के लिए यह योजना रोज़गार का अच्छा साधन बनी।’’

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समिति में जुड़े सदस्यों के बारे में रीता आगे बताती हैं, इस समय गाँव की लगभग 14-15 महिलाएं समिति की सदस्य हैं, जो रोज 65-70 लीटर दूध समिति को देती हैं’’। रीता ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं पर डेयरी योजना से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा वे अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाने पर खर्च करती हैं। रीता बताती हैं, ‘‘मैं पूरे महीने में 15 से 20 हजार रुपए कमा लेती हूं, जिससे बच्चों को अच्छा पढ़ा-लिखा रहे हैं।’’

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