नई धुनों के साथ भूले-बिसरे गीत

नई धुनों के साथ भूले-बिसरे गीतgaon connection

हाल ही में आई निर्देशक अभिषेक चौबे की फिल्म उड़ता पंजाब काफी विवादों के बाद रिलीज़ हुई और पसंद की गई। फिल्म का संगीत भी काफी पसंद किया गया जिसमें आज के जमाने की धुन और लफ्ज़ हैं लेकिन एक सॉफ्ट-इमोशनल गीत ‘इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत’ ने कई दिलों को छुआ।

दरअसल यह पाकिस्तान के पंजाबी कवि शिव कुमार बटालवी की एक कविता है जिसे फिल्म में अमित त्रिवेदी ने अपने संगीत से सजाया। इससे पहले भी फिल्मों में पुरानी कविता, गज़लों और यहां तक कि दोहे का इस्तेमाल करके एक रूप में सामने लाया जा चुका है। हिंदी संगीत में इस तरह का एक्सपेरिमेंट लोगों ने काफी पंसद भी किया है जब उनकी पसंदीदा गज़ल या कविता को उन्होंने नए रूप में सुना।

फिल्म मसान में इस्तेमाल हुई दुष्यंत की गज़ल

फिल्म हैदर में अरिजीत सिंह द्वारा गाया गया गीत ‘गुलों में रंग भरे बाद में नौबहार चले’ फैज़ अहमद फैज़ की लिखी गज़ल है। फैज़ की कई गज़लों को बॉलीवुड फिल्मों में लिया जा चुका है। 2015 में आई फिल्म मसान का गीत ‘तू किसी रेल सी गुजरती है मैं किसी पुल सा थरथराता हूं’ कवि दुष्यंत कुमार द्वारा लिखा गया है। दुष्यंत कुमार उपन्यास, कविताएं और लघु कहानियां लिखते थे लेकिन उनकी हिंदी गज़लों का कलेक्शन हमेशा यादगार रहा है। उनके गुज़रने के कई वर्षों बाद तक कई लोगों ने उनकी गज़लों को अलग-अलग अंदाज में पेश किया। अरविंद केजरीवाल इंडिया अंगेस्ट करप्शन आंदोलन से लोगों को जोड़ने के लिए दुष्यंत की गज़ल ‘हो गई है पीर पर्वत सी’ अक्सर गाते थे। इसके बाद गीतकार वरुण ग्रोवर ने फिल्म मसान के लिए उनकी गज़ल को नए कलेवर के साथ जोड़ा।

रॉकस्टार में संत फरीद का दोहा 

अमीर खुसरो की कव्वाली ‘मन कुंतो मौला’ को इरशाद कामिल ने फिल्म गुंडे के लिए कुछ बदलाव करके पेश किया था। इसी तरह फिल्म बजरंगी भाईजान की कव्वाली ‘भर दो झोली मेरी’ साबरी ब्रदर्स ने पहले गाया था।

साल 2011 में निर्देशक इम्तियाज़ अली की फिल्म रॉकस्टार का एक बेहद प्रसिद्ध गाना था ‘नादां परिंदे’ जिसके बोल इरशाद कामिल ने लिखे थे। गाने की एक बेहद खूबसूरत पंक्ति थी- ‘कागा रे कागा रे मोरी इतनी अरज तोसे चुन-चुन खाइयो मांस’। यह लाइन सूफी संत फरीद की रचना कागा सब तन खाइयो, मेरा चुन चुन खाइयो मांस, दो नैना मत खाइयो, मोहे पिया मिलन की आस से ली गई थी।  

खूब पसंद की गई ‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी’   

‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी के हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले’ मिर्जा गालिब की यह कविता बेहद पसंद की गई थी। निर्देशक सुधीर मिश्रा ने इस टाइटल पर फिल्म बनाने के साथ इसमें इस गीत को जोड़ा जिसे जगजीत सिंह ने गाया था। बॉलीवुड के गीतकार संदीप नाथ कहते हैं कि फिल्मों में यह प्रयोग नया नहीं है। 60-70 के दशक में भी ऐसे प्रयोग हुए थे। यह अच्छा प्रयास है इस माध्यम से दर्शक व श्रोता साहित्य से जुड़ पाते हैं।

फिल्मों में इस्तेमाल हुए मीराबाई और कबीरदास के दोहे

फिल्मों में भक्तिकाल के कवि जैसे मीराबाई और कबीरदास के दोहे भी प्रयोग में लाए जा चुके हैं। 1952 में आई फिल्म बैजू बावरा में मीराबाई का दोहा ‘जो मैं ऐसा जानती प्रीत किए दुख होए, नगर ढिंढोरा पीटती प्रीत न करियो कोए’ गीत ‘मोहे भूल गए सांवरिया’ में इस्तेमाल किया गया था। 

इसी तरह फिल्म जागते रहो में गीतकार शैलेंद्र ने कबीरदास का दोहा रंगी को नारंगी कहे, बने दूध को खोया, चलती को गाड़ी कहे, देख कबीरा रोया से अपने गीत की शुरुआत की थी।

इसी तरह फिल्मों में कई देशभक्ति गीत भी इस्तेमाल किए गए। इसमें 1965 में आई फिल्म शहीद में रामप्रसाद बिस्मिल का लिखा गीत ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ लिया गया था। इसी तरह फिल्म भाई-बहन में मोहम्मद इकबाल का लिखा गीत ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ इस्तेमाल हुआ था।  

रिपोर्टर : शेफाली श्रीवास्तव 

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