नन्हीं सी जान होती हर रोज परेशान

नन्हीं सी जान होती हर रोज परेशानगाँव कनेक्शन

डुमरियागंज (सिद्वार्थनगर)। यूनीफार्म पहने कंधे पर स्कूल बैग लादे नन्हीं सी जान हर रोज परेशान हो रही है। वो तकलीफ झेलती हैं, उस बस में जो उसे घर से स्कूल और स्कूल से घर तक लाती ले जाती है। यह हालात बनाने वालों को मासूम दर्द का एहसास नहीं होता क्येंकि उन्हें मुनाफा देखना रहता है। अभिभावक मजबूर हैं तो कानून का डर थामे अफसरों के कदम बेदम हैं। 

माता-पिता के कलेजे का टुकड़ा अच्छे स्कूल, अच्छी पढ़ाई के चक्कर में हर रोज मनमानी के झटके झेल रहा है। उसे नहीं पता कि यह सजा मिल क्यों रही हैं? ऐसे हालात बनाने वालें की संवेदनशीलता भी कहीं काफूर है। परिवहन विभाग व जिम्मेदार अधिकारियों को बच्चों से ठसाठस भरी हुई स्कूल बसें, रिक्शा नजर ही नहीं आते। एक स्कूल के प्रबंधक ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया, “यदि मानक के हिसाब से  बच्चों को लाएंगे तो लागत तक नहीं आयेगी।” वहीं एक चर्चित रसूखदार स्कूल के प्रबंधक ने कहा, “अगर अभिभावक को कोई आपत्ति नहीं है तो फिर यह सवाल कहां से खड़ा होता है?”

कभी भी नगर की किसी भी सड़क पर स्कूल टाइम पर खड़े हो जाइए सामने से गुजरने वाली स्कूल बस या स्कूली वाहन आपकी आंखे बच्चों की दुर्दशा को देखकर चौड़ा कर देगी। जितने बच्चे सीट पर बैठे दिखेंगे, उससे ज्यादा खड़ी हुई या लटके मिलेंगे। एक स्कूली वाहन के चालक रामदास ने कहा, “यह सच है कि मानक से अधिक बच्चों को वाहन में बिठाने पर खुद भी कष्ट होता है, लेकिन हम कर ही क्या सकते हैं। स्कूल के प्रबंधक, प्रिंसपल या वाहन मालिक जो निर्देश देंगे उसका पालन करना हर ड्राइवर की मजबूरी है।”

दण्ड का है प्रावधान

स्कूल वैन की सीटिंग क्षमता आठ सवारियों की होती है। जबकि स्कूल बसों की क्षमता 26 से लेकर 54 सवारियों तक होती है। इससे ज्यादा सवारियां ढोना नियम का उल्लंघन है। कार्रवाई का प्रकार ओवर लोडिंग, फिटनेस व बिना परमिट के संचलन के आधार पर तय होता है। नई गाड़ी की फिटनेस अनुमन्यता दो वर्ष की और इसके बाद हर साल करानी पड़ती है। संभागीय परिवहन विभाग के पास चालान व वाहन को बंद कराने के अलावा और कुछ अधिकार नहीं है। जुर्माना 100 से लेकर 10000 रुपये तक होता है।

रिपोर्टर - हैदर हल्लौरी

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