न्यायिक प्रक्रिया में गति न्यायपालिका और सरकार ला सकेंगे

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उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ठाकुर जनप्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए इतना भावुक हो उठे कि आंसू छलक आए। वह इसलिए आहत हैं कि न्यायपालिका पर बराबर दोष लगाया जाता है कि न्याय मिलने में विलम्ब होता हैं। इस बात पर ध्यान नहीं जाता कि देश में जजों के कितने पद खाली पड़े हैं और उनपर काम का बोझा कितना है। जनता तो खामियाजा भुगतती है, कुछ कर नहीं सकती। जजों के पद इसलिए खाली पड़े हैं कि सरकार और न्यायपालिका के बीच जजों की चयन प्रक्रिया पर सहमति नहीं बन पा रही है। 

जजों की नियुक्ति अभी तक कालिजियम के माध्यम से होती थी परन्तु अब सरकार की तरफ से न्यायिक आयोग के गठन का प्रस्ताव आया जो जजों की नियुक्ति करेगा। यह उच्चतम न्यायालय को स्वीकार नहीं। साथ ही अलग-अलग प्रदेशों में आबादी और जजों का अनुपात भिन्न है इसलिए देश भर में स्थानान्तरण की व्यवस्था का प्रस्ताव आता है। कुछ लोगों का अपना तर्क है कि यदि जजों को आईएएस अधिकारियों की तरह नियुक्त और अखिल भारतीय स्तर पर स्थानान्तरित किया गया तो भाषा की समस्या आएगी परन्तु भाषा तो प्रशासनिक अधिकारियों के मार्ग में भी आती होगी। अभी भी अदालतें अंग्रेजी के ही सहारे हैं।

जजों की इतनी कमी है कि वर्तमान में तीन करोड़ से अधिक मुकदमे अदालतों में लम्बित हैं और अनुमान है कि 2040 तक लगभग 40 करोड़ प्रकरण अदालतों में लम्बित होंगे। कहने को भारत का न्याय तंत्र दुनिया के सबसे बड़े तंत्रों में से एक है फिर भी लम्बित मामलों को देखते हुए न्यायाधीशों की संख्या और आबादी का अनुपात बहुत कम है। न्यायिक प्रक्रिया को गति देने का काम तो न्यायाधीशों और सरकार को मिलकर ही करना होगा। यह काम जनता नहीं कर पाएगी।

अब एक नई समस्या सामने आ रही है, जजों पर उंगलियां उठने लगी हैं। यौन शोषण को लेकर, रिश्वत सम्बन्धी और स्वयं राजनेताओं के प्रभाव के कारण। हमारी न्यायपालिका की विश्वसनीयता आज तक सन्देह के घेरे में नहीं रही। यदि न्यायपालिका पर से समाज का विश्वास घटा तो यह हमारे देश और समाज के लिए बहुत ही घातक होगा। न्यायपालिका की विश्वसनीयता अक्षुण रहनी चाहिए। हमारे देश में किसी को तब तक बेगुनाह माना जाता है जब तक न्यायालय उसे अपराधी घोषित ना कर दे। 1951 से एक कानून चला आ रहा था, मौजूदा एमपी (सांसद) अथवा एमएलए यदि दोषी पाया जाता है तो उसे तीन महीने के अन्दर अपील करने का समय मिलता था। दागी नेता तीन महीने के अन्दर अपील दाखिल करके निर्णय पर रोक लगवा देते थे और लम्बे समय तक हुकूमत करते रहते थे। न्यायालय द्वारा कुछ सुधार किया गया है कि जिस समय किसी एमपी अथवा एमएलए को दो साल की सजा सुनाई जाएगी, उसकी सदस्यता उसी समय से समाप्त हो जाएगी। लम्बित मामलों में पुरानी व्यवस्था चलेगी।

भ्रष्ट राजनेताओं का अपराध अदालत में साबित करना आसान नहीं होता, ना तो किसी सरकार के लिए और ना ही किसी संस्था के लिए। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार जहां 1972 में दंडित होने वालों की दर 62 प्रतिशत थी वह 2012 तक केवल 38 प्रतिशत रह गई। नेताओं के मामले में यह दर और भी कम होगी। मुकदमा दायर करने वाली संस्थाएं जैसे पुलिस, सीबीआई या स्वयं सरकार के अधिकारी समय पर सबूत जुटा पाते तो सबूतों के अभाव में राजनेता छूट ना पाते। 

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह इच्छा जाहिर की थी कि राजनेताओं के लम्बित मामले विशेष अदालतों के माध्यम से एक साल में निपटा दिए जाएं। माननीय उच्चतम न्यायालय ने इस पर अपनी सहमति नहीं दी। न्यायाधीशों पर से काम का बोझ घट सकता था यदि न्याय पंचायतें, जन अदालतें और दूसरे फोरम प्रभावी हो पाते। प्रधानमंत्री मोदी ने न्यायाधीशों के साथ अलग से बात करने का संकेत दिया था, शायद कुछ बात बन जाए।

sbmisra@gaonconnection.com

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