पांच साल में दाल उत्पादन 80 लाख टन करने का लक्ष्य

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लखनऊ। दालों को लेकर पिछले लगभग दो वर्षों से मचे हाहाकार को देखते हुए केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने देश की दाल के आयात पर निर्भरता खत्म करने के लिए पांच साल का एक रोडमैप तैयार किया है। इन पांच सालों में मंत्रालय का उद्देश्य देश में दलहन का उत्पादन 70-80 लाख टन बढ़ाने का है।

छह सूत्रों को मिलाकर बने इस प्लान का सबसे अहम हिस्सा देश के दाल उत्पादक राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में प्रति हेक्टेयर उत्पादकता और दालों की खेती का रकबा बढ़ाना होगा।

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के फसल एवं राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अपर निदेशक अशोक ने कहा, "दालों के लिए प्लान तैयार किया गया है, लेकिन मैं अभी ज्यादा जानकारी आपको नहीं दे सकता।''

हालांकि केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा था, "देश में दालों को बढ़ावा देने के लिए एक समूह बनाया गया है, जो पाचं सालों का एक रोडमैप लेकर के आया है, इसमें लक्ष्य है कि 2020-21 तक देश में दाल का उत्पादन दो करोड़ 40 लाख टन तक पहुंचाना है।"

देश में दलहन का उत्पादन वर्ष 2015-16 में एक करोड़ 70 लाख टन रहा था। प्रति हेक्टेयर औसत उपज 750 किलो दर्ज की गई।

अभी तक की जानकारी के हिसाब से केंद्र के इस रोडमैप के ज़रिए देशभर में 150 बीजों के गढ़ बनाए जाएंगे। इन गढ़ों में बीज उत्पादन में भाग लेने वाले किसानों को तमाम लाभ दिए जाएंगे साथ ही बायो-फर्टिलाइजर और बायो लैब को बढ़ावा दिया जाएगा। प्लान में किसानों के खेतों में उन्नत बीजों के उत्पादन से लेकर ब्रीडर बीज उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा।

हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्री ने ट्वीट कर यह जानकारी भी दी थी कि वर्ष 2014 से 2016 के दौरान देश के कृषि अनुसंधान ने सूखे से लड़ने में सक्षम दालों की 20 नई किस्में विकसित की हैं।

इन किस्मों से किसानों का भला तभी हो पाएगा जब इन बीजों की जानकारी, इनकी खेती के उन्नत तरीके और प्रचुर मात्रा में बीज उन तक पहुंचे। चौदह करोड़ किसान और खेती के सबसे बड़े प्रशासनिक ढांचे की मौजूदगी के बाद भी भारत किसानों तक सीधी जानकारी पहुंचाने की गुत्थी हल नहीं कर पाया है।

देश में दलहन की खेती के पिछले कुछ सालों पर नज़र डालें तो वर्ष 2013-14 में दालों का सबसे ज्यादा उत्पादन हुआ था, करीब एक करोड़ 90 लाख टन। लेकिन ये उत्पादन अगले फसल वर्ष 2014-15 में घटकर एक करोड़ 70 लाख टन पर आ गया।

इसी घटे उत्पादन और बड़े स्तर पर जमाखोरी के चलते वर्ष 2015 के जून महीने में अरहर की दाल की प्रति कुंतल कीमत 20 हज़ार रुपए को भी पार कर गई थी।

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