अमेठी: इस गाँव के अस्पताल में डॉक्टर का पता नहीं फार्मासिस्ट कर रहा इलाज

अमेठी: इस गाँव के अस्पताल में डॉक्टर का पता नहीं फार्मासिस्ट कर रहा इलाजअलाइपुर गाँव में बने प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के बाहर उगीं झाड़ियां।

कम्युनिटी जनर्लिस्ट

अमेठी। गाँवों में स्वास्थ्य सुविधा के लिए स्वास्थ्य केंद्र तो हैं, लेकिन मरीजों को देखने वाले डॉक्टर नहीं। ऐसे में मरीजों को मजबूरी में प्राइवेट डॉक्टरों से इलाज कराना पड़ता है। सफाई कर्मी से लेकर डॉक्टर तक की जिम्मेदारी यहां तैनात फार्मासिस्ट निभाते हैं।

जिला अमेठी से 61 किलोमीटर दूर तिलोई ब्लॉक है, जिसके अंतर्गत अलाइपुर गाँव आता है। जोकि तिलोई ब्लॉक से 12 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है, जिसके आस-पास चिरैन्ध, उत्तरपारा, राजा का पुरवा, मतेरवा आदि गाँव आते हैं, जिनकी आबादी करीब 18 से 20 हजार है। अलीपुर गाँव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में कोई भी डॉक्टर तैनात नहीं है।

स्वास्थ्य केंद्र में फार्मासिस्ट के पद पर तैनात हरेंद्र प्रताप सिंह ही वहां की देखरेख करते हैं। इतना ही नहीं वो मरीज दखने के साथ-साथ अस्पताल की सफाई भी वही करते हैं, क्योंकि वहां न कोई सफाई कर्मी है और न ही चौकीदार। स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति यह है कि यहां दिनदहाड़े चोरी हो जाती है। चारों तरफ बाउंड्री नहीं है।

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ईंट तक गाँव वाले उठा ले गए और अगर अस्पताल को दूर से देखा जाए तो अस्पताल कम जंगल ज्यादा लगता है। पूरे अस्पताल परिसर में कंटीले पेड़, बड़ी-बड़ी घास हैं। बरसात के दिनों में पानी भी भरा रहता है। अस्पताल में स्वास्थ्य पर्यवेक्षक के पद पर तैनात शोभा देवी (35 वर्ष) बताती हैं, “पहले तो सुविधाएं बहुत थीं, लेकिन धीरे-धीरे सब चोरी हो गया। अस्पताल के चारों तरफ बाउंड्री थी, लेकिन वह भी धीरे-धीरे टूट गई।

यहां इतना सन्नाटा रहता है कि दिन में भी कोई भी आसानी से चोरी कर सकता है।” “अभी पिछले दिनों एएनएम शांति देवी की नाक की कील नोच कर कोई भाग गया था तब से वह भी बहुत डरी हुई रहती हैं।” शोभा देवी आगे बताती हैं।वहीं अस्पताल में फार्मासिस्ट के पद पर तैनात हरिंद्र प्रताप सिंह बताते हैं, “अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं, मरीजों को हमें ही देखना पड़ता है, साथ ही सफाई कर्मी का भी काम करना पड़ता है। सुबह आता हूं तो पहले पूरे अस्पताल में झाड़ू लगाता हूं।” जिला अमेठी के मुख्य चिकित्सक अधिकारी राजमोहन श्रीवास्तव से डॉक्टरों की कमी के बारे में बात की गई तो उन्होंने बताया, “पूरे अमेठी जिले में 40 डॉक्टरों की कमी है।”

‘कई वर्षों से अस्पताल का यही हाल है’

अलाई गाँव के ही दिनेश हलवाई बताते हैं, “यहां पर डॉक्टर नहीं है, अगर मरीज को बुखार है तब तो कोई भी दे सकता है, लेकिन अगर ज्यादा दिक्कत है तो हमें बाहर ही किसी अस्पताल में दिखाना पड़ता है यहां तो केवल नाम का ही अस्पताल है।” वहीं अस्पताल में अपने पति के साथ टीके की जानकारी लेने आईं मालती देवी बताती हैं, “इस अस्पताल का वर्षों से यही हाल है।”

नाम के लिए बना अस्पताल, समय से नहीं आते डॉक्टर

इश्त्याक खान,स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

औरैया। जिले में ग्रामीण क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बहुत खराब है। जिन डॉक्टरों पर लोगों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी है वह अस्पताल आना ही नहीं चाहते। ऐसे में मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

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जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर हाईवे से दक्षिण दिशा में बसे गाँव बसतंपुर में उप स्वास्थ्य केंद्र बना हुआ है,। चिकित्सक को अस्पताल आने की फुर्सत ही नहीं है और एएनएम हफ्ते में एक से दो दिन अस्पताल आकर उपस्थिति रजिस्टर में हस्ताक्षर कर चली जाती हैं। बसंतनपुर गाँव निवासी टीका राम (50 वर्ष) कहते हैं, “गाँव में अस्पताल तो बन गया, लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं नहीं हैं। चिकित्सक का कोई पता नहीं कब आते हैं और कब चले जाते हैं। गाँव के लोगों को बीमारी होने पर शहर जाना पड़ता है।”

मुख्य चिकित्साधिकारी गिरीश कुमार बताते है चिकित्सक और एएनएम को सुबह आठ बजे अस्पताल पहुंचने के निर्देश हैं, अगर कोई चिकित्सक समय से नहीं पहुंचता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

मरीज का आरोप, इलाज के नाम पर मांगे पैसे

रोहित श्रीवास्तव, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

बहराइच। जिला चिकित्सालय की कारस्तानियां दिन-प्रतिदिन नए रूप में देखने को मिल रही हैं। मरीज का आरोप है, “जिला चिकित्सालय में जब डॉक्टरों को सुविधा शुल्क नहीं दिया गया तो मुझे ट्रामा सेन्टर के लिए रेफर कर दिया गया।” पीड़ित ने मामले की शिकायत राज्यमंत्री अनुपमा जायसवाल से की है। मंत्री ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं। चिलवरिया अन्तर्गत ग्राम मोहरना निवासी परशुराम की 12 मई को छत से गिर जाने के कारण पैर की हड्डी टूट गई थी, जिन्हें परिजनों ने जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया। यहां तैनात डॉ. एसपी सिंह ने परशुराम का इलाज शुरू किया।

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परशुराम ने बताया, “डॉक्टर ने सात हजार रुपए इलाज खर्च के नाम पर मांगे। जब मैंने रुपए देने में असमर्थता जताई तो डॉक्टर ने शुगर होने की बात कही।”

सीएमएस डॉ. डीके सिंह ने बताया मरीज की स्थिति बहुत गंभीर थी, जिसके चलते उसको ट्रामा सेन्टर के लिए रेफर किया गया था।

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