पहचान के लिए जद्दो-जहद करती नौटंकी

पहचान के लिए जद्दो-जहद करती नौटंकीgaonconnection

नया नवादा (कानपुर)। नौटंकी कभी मेलों का अभिन्न अंग हुआ करती थी। नौटंकी को गाँवों और कस्बों में रहने वाली जनता को देश दुनिया की जानकारी प्रदान करना, सामाजिक विसंगतियों व कुरीतियों से परिचित कराने और सस्ता-स्वस्थ मनोरंजन का साधन माना जाता था। लेकिन परिवर्तन के बयार के चलते नौटंकी ने अपनी पहचान खो दी है और नाैटंकी में अब अश्लीलता व फूहड़ता शामिल हो गई है।

नौटंकियों को भारतीय सिनेमा जगत की जननी कहा जाता है पर इसका भविष्य धीरे-धीरे अंधकार की ओर अग्रसर होता जा रहा है। खुद को बचाए रखने की जुगत में किसी ज़माने में लोगों के लिए सामाजिक जागरूकता की पहचान रही नौटंकी, आज मात्र एक फूहड़ मनोरंजन का साधन भर रह गई है। इस पर अभद्र संगीत और नृत्य हावी हो गए हैं।

कानपुर के नया नवादा गाँव में नौटंकी के आयोजन की खबर फैलते ही पूरे गाँव में उत्साह की लहर दौड़ गई। नौटंकी के लिए मंच, साउंड, माइक, टेन्ट, लाइट जैसी तैयारियां सुबह से शुरू हो गईं। जब नौटंकी की मंडली गाँव में आई तो लोगों का हुजूम उनके ईद-गिर्द घूमने लगा। अपना साज-श्रृंगार पूरा करके मंच पर एक साथ आए सभी कलाकारों ने सबसे पहले भक्तिगीत प्रस्तुत किया, जिसे इकट्ठा हुए सभी गाँव वाले शांति से सुन रहे थे। पूरे कार्यक्रम का यही ऐसा हिस्सा है जहां संस्कृति का थोड़ा पुट आज भी नज़र आता है। भक्ति गीत खत्म होते ही शुरू हो गया शायरी और देसी कटाक्षों का सिलसिला जो पूरी रात चला। 

नया नवादा गाँव में नौटंकी दिखाने आई टीम के प्रमुख रम्पत कानपुर के किदवई नगर से आए हैं। रम्पत नौटंकी जगत के जाने माने नामों में से एक हैं। वो कहते हैं, ‘‘हम नौटंकी आज से नहीं बल्कि पिछले 30 वर्षों से कर रहे हैं। हमारी 22 सदस्यों की टीम है, जो सिर्फ  ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि दिल्ली, मुंबई, बिहार और विदेशों में भी नाम कमा चुकी है।’’ रम्पत पहले सिंचाई विभाग में कार्यरत थे लेकिन नौटंकी से गहरा लगाव होने के कारण उन्होंने नौकरी छोड़ इसे अपना व्यवसाय बना लिया और वे नौटंकी के माध्यम से कई फिल्मों में हास्य किरदार के रूप में भी काम कर चुके हैं। 

नया नवादा गाँव में पूरी रात चली नौटंकी की प्रस्तुति में पूरे समय तक जो प्रस्तुति चली वो थी एक महिला कलाकार की भड़काऊ गानों पर दी गई नृत्य की प्रस्तुति, जो कि कार्यक्रम के बीच-बीच में कई हिस्सों में बंटी थी।

रम्पत की पत्नी रानीबाला भी उनके साथ नौटंकी करती हैं। रानीबाला रम्पत की तैयार की गई नौटंकी मंडली की सबसे पुरानी कलाकार हैं। वो कहती हैं, ‘‘हम खुद चाहते हैं कि हम पहले की तरह खेल (नाटक) दिखाएं पर आज लोग डान्स और फिल्मी संगीत ज्यादा पसंद करते हैं। लोग पहले घरेलू तथा सामाजिक विषयों से रूबरू होने के लिए नौटंकियां देखने आते थे पर अब हालत यह है कि अगर नौटंकियों में नाच न हो तो लोग नौटंकी देखने आते ही नहीं हैं।’’रम्पत की मंडली में पहले सात से दस लोग हुआ करते थे, जिसमें महिलाओं की संख्या बहुत कम थी। लेकिन नौटंकी के बाजारीकरण के चलते आज ज्यादा से ज्यादा लड़कियों को शामिल करना मण्डलियों की मजबूरी हो गई है। पहले लोग नौटंकी में    

आईं महिलाओं को कलाकारों की तरह अपनाते थे और उनकी प्रस्तुति को सराहते भी थे। आज रंगारंग लाईट, बड़े मंच, भड़काऊ गीतों और लोगों की एकटक नज़रों के बीच लड़कियों का नाचना नौटंकी प्रस्तुति के मुख्य भागों में से एक हो गया है। महिलाएं नृत्य प्रस्तुत करती हैं लोग उनपर पैसे लुटाते हैं। कई बार तो लोग स्टेज पर भी आ जाते हैं जिससे काफी परेशानी हो जाती है।

नौटंकी की महिला कलाकार सानिया ने हमें बताया, ‘‘हमें बहुत अच्छा लगता है, जब लोग हमें देखने दूर-दूर से आते हैं और हमारी प्रस्तुति पर जोर-जोर से तालियां भी बजातें हैं। हम तब अपने आप को फि ल्मी हीरोइन जैसा समझते हैं। हम नौटंकी में काम करना नहीं चाहते थे पर परिवार की आर्थिक हालत के कारण हमने यहां काम करना शुरु कर दिया। नौटंकी में जो भी मिलता है उसे हम घर और बड़ी बहन के बच्चों की पढ़ाई के लिए रखते हैं।’’

कहा जाता है कि जब एक बार महात्मा गांधी नौटंकी देखने गए तो उन्होंने वहां राजा हरिश्चंद्र का नाटक देखा था। उस नाटक का उन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उससे प्रेरित होकर उन्होंने सत्य और अहिंसा का रास्ता अपनाया और आगे चलकर इन्हीं दो शक्तियों के बल पर भारत को स्वतंत्रता दिलाई। लेकिन वर्तमान में नौटंकी के स्वरूप को देखकर लगता है कि शायद ही वो किसी को प्रेरित कर पाए। 

अब नौटंकियों में महाराणा प्रताप, श्रवण कुमार, रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की कहानियों जैसे सामाजिक विषय नहीं रहे, रह गई है तो बस फूहड़ता और उसका खोखला आनंद। यदि नौटंकी को इसके वास्वविक सामाजिक स्वरूप से न जोड़ा गया तो धीरे-धीरे कहीं नौटंकी कला विलुप्त न हो जाए।

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