पहले जनक के लिए ही भस्मासुर साबित होगा ‘डर्टी बम’

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मुंबई (भाषा)। आज सुरक्षा एजेंसियों को ‘डर्टी बम’ के इस्तेमाल की ज्यादा चिंता है। एक ‘डर्टी बम’ या रेडियोधर्मी पदार्थ से लैस कोई विस्फोटक कितना खतरनाक हो सकता है? पोखरण विस्फोटों की वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर भारत की प्रमुख नाभिकीय प्रयोगशाला भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के आपात तैयारी प्रमुख के.एस. प्रदीप कुमार ने डर्टी बम से जुड़े कुछ आम भ्रमों को दूर किया। उनके साक्षात्कार के कुछ अंश इस प्रकार हैं- 

इन दिनों ‘डर्टी बम’ नामक चीज का बहुत डर है, डर्टी बम क्या है? 

डर्टी का अर्थ है कि यह गंदा है। इसका अर्थ यह हुआ कि यह आपको वास्तव में नुकसान नहीं करेगा लेकिन आपको असहज महसूस करवाएगा। यह आपके कपड़ों पर पड़ी गंदगी जैसा है, इसका यह अर्थ नहीं होता कि आप मर जाएंगे या आपकी सेहत खतरे में पड़ गई है लेकिन निश्चिततौर पर आपको जाकर अपने कपड़े बदलने पड़ते हैं। इसी तरह से एक डर्टी बम का किसी भी अन्य विस्फोटक की तरह कुछ प्रभाव तो होता है लेकिन चूंकि इससे रेडियोधर्मी पदार्थ जुड़ा है और विस्फोट के बाद रेडियोधर्मिता फैल सकती है, इसलिए आपके शरीर के विषाक्त होने और यहां तक कि आपके कपड़ों के विषाक्त हो जाने की संभावना है, ऐसे में, निश्चित तौर पर आसपास के लोगों के शुद्धीकरण की जरुरत होगी। 

डर्टी बम बनाने में इस्तेमाल होने वाले पदार्थ क्या हैं? 

सबसे पहली बात तो यह कि डर्टी बम का इस्तेमाल आज तक दुनिया में कहीं नहीं किया गया। फिर भी ऐसा जिक्र आता है कि लोगों ने रेडियोधर्मी सीजियम-137 और आरडीएक्स जैसे विस्फोटकों का इस्तेमाल कर इसे बनाने की कोशिश की है, भारत में इसका इस्तेमाल कभी नहीं हुआ। डर इस बात का है कि चूंकि रेडियोधर्मी स्रोतों और रेडियोधर्मी समायवों का इस्तेमाल दुनिया में काफी बढ़ रहा है और कुछ स्थानों पर स्रोतों की सुरक्षा भी पूरी तरह सुनिश्चित नहीं है, ऐसे में कई स्रोतों के गायब हो जाने के मामले भी हैं। इस तरह के स्रोत खराब लोगों के हाथों में पड़ सकते हैं। 

क्या रेडियोधर्मी स्रोतों को संभालना मुश्किल नहीं है?

बिल्कुल है, तभी तो यह उन बुरे लोगों के लिए भी एक बड़ी चुनौती है, जो ऐसे उपकरण बनाने की कोशिश कर सकते हैं, यह भी एक वजह है कि इनका इस्तेमाल सफल नहीं हो सका है, पारंपरिक विस्फोटकों की तुलना में सीजियम-137 या कोबाल्ट-60 जैसे रेडियोधर्मी स्रोतों से बहुत ज्यादा ऊर्जा वाली गामा किरणें निकलती हैं। अगर कोई इसे बम में जोड़ने की कोशिश करते हुए कुछ मिनट से ज्यादा समय इसके साथ बिताता है तो वह खुद ही भारी विकिरण की चपेट में आ जाएगा। 

भारत छिपे डर्टी बमों का पता लगा सकता है क्या? 

बार्क ने कई प्रणालियां विकसित की हैं, हमने एरियल गामा स्पेक्ट्रोमीटरी सिस्टम जैसे कई तंत्र विकसित किए हैं, जिनका इस्तेमाल इस तरह के स्रोतों को खोजने के लिए किया जा सकता है। इनका पता बार्क के उपकरणों से आसानी से लगाया जा सकता है।दिल्ली के मध्य में यदि डर्टी बम जैसा विस्फोट होता है तो पूरा कनॉट प्लेस तबाह हो जाएगा और विकिरण संसद भवन की इमारत तक फैल जाएगा क्या?  ‘प्रभावित’ शब्द का इस्तेमाल बहुत सावधानी के साथ करना चाहिए। हमारे पास, विकिरण का पता लगाने वाले बेहद संवेदनशील मॉनिटर हैं, इनकी मदद से रेडियोधर्मिता की बेहद छोटी सी मात्रा का भी पता लगाया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, फुकुशिमा दुर्घटना देखिए। सुदूर यूरोप और अमेरिका में भी रेडियोधर्मिता की बेहद छोटी सी मात्रा को पहचान लिया गया था और लोगों ने यह कयास लगाने शुरू कर दिए थे कि हर कोई प्रभावित होगा और कैंसर फैल जाएगा। यह गलत था। मैं यह बताना चाहता हूं कि यदि पर्यावरण में बेहद कम रेडियोधर्मिता भी है, तो भी वैज्ञानिक उसका पता लगा सकते हैं। इसी तरह, यदि डर्टी बम विस्फोट होता है तो रेडियोधर्मिता का प्रसार तीन-चार किलोमीटर तक होगा क्योंकि हवा के साथ यह इधर-उधर जा सकता है।

फिर भी यदि आप सवाल पूछ रहे हैं, तो इस विकिरण का स्तर उस विकिरण के स्तर का हजारवां हिस्सा भी नहीं होगा, जो केरल के उस क्षेत्र में है, जहां लोग कई पीढ़ियों से रह रहे हैं।तो मैं इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहूंगा कि लोग ‘प्रभावित’ होंगे। लेकिन निश्चिततौर पर जहां डर्टी बम फटेगा, उससे 30-50 मीटर के दायरे में विषाक्तता का स्तर ऊंचा हो सकता है. इसके अलावा सिगार के आकार का एक क्षेत्र हो सकता है, जहां विषक्तता का प्रसार होगा। वह भी 80 मीटर या उससे थोड़ा ज्यादा होगा लेकिन यह आपके द्वारा इस्तेमाल किए गए स्रोत पर निर्भर करेगा। लेकिन मैं बता सकता हूं कि डेढ़ किलोमीटर से आगे आपको चिंता करने की जरुरत नहीं है। 

डर्टी बम विस्फोट में लोगों के मरने की संभावना इसके उष्मीय हिस्से की वजह से है न विकिरण से?

हां, मुझे इसे बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहिए। जब आप ‘डर्टी बम’ कहते हैं तो मतलब हम रेडियोधर्मी पदार्थ से मिश्रित विस्फोटक की बात कर रहे हैं. जब हम रेडियोधर्मी विकिरण फैलाव उपकरण की बात करते हैं तो इसकी दो किस्में हैं। एक डर्टी बम है, जिसमें विस्फोटक शामिल है और दूसरा रेडियोधर्मी पाउडर का खुले में फैलाव है. हालांकि जब हम डर्टी बम की बात करते हैं तो इसका किसी भी अन्य विस्फोटक जैसा ही प्रभाव होगा- विस्फोट का प्रभाव, उष्मा का प्रभाव आदि और इससे इतर इससे रेडियोधर्मी विकिरण भी निकलेगा। मैं यह बताना चाहता हूं कि किसी की मौत या कोई गंभीर चोट की वजह विस्फोटक पाउडर के कारण हुआ विस्फोट और उष्मीय प्रभाव रहेगा। रेडियोधर्मी विकिरण से या इसकी चपेट में आने से स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव नहीं पड़ने वाले।

क्या विकिरण की चपेट में आने से मौत की संभावना नहीं है? 

इसकी संभावना नहीं है, आज डर्टी बम से जुड़े कई भ्रम हैं, सिर्फ डर्टी बम से ही नहीं, विकिरण को लेकर भी कई भ्रम हैं। 30-40 साल पहले लोग एक्स-रे करवाने से भी डरते थे लेकिन आज इतनी जागरुकता आ गई है कि लोग एक्स-रे करवाने के लिए राजी हैं। संयोगवश, भारत में परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा संचालित किसी भी प्रतिष्ठान में कोई भी व्यक्ति उच्च मात्रा में विकिरण की चपेट में आने पर नहीं मरा है।

क्या आपको संदेह है कि भारत में कभी डर्टी बम का इस्तेमाल किया जाएगा? 

रेडियोधर्मी पदार्थ खो जाते हैं इसलिए खतरा तो है लेकिन भारी रेडियोधर्मी विकिरण वाली इस बड़ी मात्रा को एकसाथ समाहित करना बेहद मुश्किल है। इसके अलावा मैं यह भी बताना चाहता हूं कि डर्टी बम बनाना और इसका इस्तेमाल करना एक बड़ी चुनौती है, यह सबसे पहले उन्हें नुकसान पहुंचाएगा, जो ऐसा कोई उपकरण तैयार करने की कोशिश करेंगे।

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