World Photography Day: ये तस्वीरें घुमाएंगी छत्तीसगढ़

Divendra SinghDivendra Singh   19 Aug 2019 9:34 AM GMT

World Photography Day: ये तस्वीरें घुमाएंगी छत्तीसगढ़

रायपुर (छत्तीसगढ़)। अपने खूबसूरत जंगल, पहाड़ नदियों के लिए मशहूर छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिले की कुछ न कुछ खासियतें हैं, हर जिले के आदिवासियों की अपनी लोक संस्कृतियां, आइए विश्व फोटोग्राफी दिवस पर तस्वीरों में देखते हैं छत्तीसगढ़।

रायपुर के गुरूनानक चौक पर मिट्टी के बर्तनों की दुकाने दिख जाएंगी, ये कारीगर महादेवा घाट से मिट्टी लाकर फिर मिट्टी के बर्तन बनाते हैं, मिट्टी के बर्तनों के दुकान पर बैठी महिला।रायपुर के गुरूनानक चौक पर मिट्टी के बर्तनों की दुकाने दिख जाएंगी, ये कारीगर महादेवा घाट से मिट्टी लाकर फिर मिट्टी के बर्तन बनाते हैं, मिट्टी के बर्तनों के दुकान पर बैठी महिला।

रायपुर के गुरूनानक चौक पर मिट्टी के बर्तनों की दुकाने दिख जाएंगी, ये कारीगर महादेवा घाट से मिट्टी लाकर फिर मिट्टी के बर्तन बनाते हैं, मिट्टी के बर्तनों के दुकान पर बैठी महिला।

ये बस्तर संभाग के कोंडागाँव का चिकलकुट्टी जंगल, जहां पर काली मिर्च की खेती होती है। टीक के पेड़ पर काली मिर्च की बेलये बस्तर संभाग के कोंडागाँव का चिकलकुट्टी जंगल, जहां पर काली मिर्च की खेती होती है। टीक के पेड़ पर काली मिर्च की बेल

ये है बस्तर संभाग के कोंडागाँव का चिकलकुट्टी जंगल, जहां पर काली मिर्च की खेती होती है। टीक के पेड़ पर काली मिर्च की बेल। पहले सिर्फ दक्षिण भारत में काली मिर्च की खेती होती थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में काली मिर्च की अच्छी पैदावार हो जाती है।

ये है नारायणपुर जिले की साप्ताहिक बाजार जहां पर, पूरे जिले से आदिवासी अपनी जरूरत का सामान खरीदने आते हैं।ये है नारायणपुर जिले की साप्ताहिक बाजार जहां पर, पूरे जिले से आदिवासी अपनी जरूरत का सामान खरीदने आते हैं।

आज भी छत्तीसगढ़ के आदिवासी बांस के बनी टोकरियों में सब्जी और अनाज रखते हैं। साप्ताहिक बाजार में इसकी अच्छी ब्रिक्री हो जाती है। ये है नारायणपुर जिले की साप्ताहिक बाजार जहां पर, पूरे जिले से आदिवासी अपनी जरूरत का सामान खरीदने आते हैं।

नारायणपुर के साप्तहिक बाजार में महुआ बेचती आदिवासी महिला।नारायणपुर के साप्तहिक बाजार में महुआ बेचती आदिवासी महिला।

आदिवासी का कमाई का मुख्य जरिया जंगल ही हैं, यहां से तेंदू पत्ता, महुआ से उनकी अच्छी कमाई हो जाती है। साप्ताहिक बाजार में ये महुआ बेचते हैं, जिनसे इन्हें पैसे मिल जाते हैं। नारायणपुर के साप्तहिक बाजार में महुआ बेचती आदिवासी महिला।

गोंड शादी में मंडप बनाती महिलाएं।गोंड शादी में मंडप बनाती महिलाएं।

अभी तक आपने शादियों में बैंड और डीजे की धुनों पर नाचते-गाते लोगों को देखा होगा, लेकिन ये शादी बिल्कुल अलग है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में आज भी आदिवासी परिवारों में शादियां परंपरागत तरीके से ही होती हैं। शादी के कई दिन पहले ही तैयारी शुरू हो जाती है। नारायणपुर के प्रमोद पोटाई गोंड शादी के बारे में बताते हैं, "बस्तर में शादी-विवाह की परंपरा बहुत ही अनोखी है, क्योंकि बस्तर के गोंड आदिवासी प्रकृति से जुड़े हुए हैं वो शादी-विवाह का रस्मों-रिवाज करते आ रहे हैं।" गोंड जाति के लोगों ने नाचना-गाना प्रकृति से सीखा है, यहां पर जन्म, विवाह, मरण कोई भी पर्व या अनुष्ठान होता है बिना संगीत अधूरा होता है। इनके विवाह संस्कार में तो गोंडीयन संगीत की धूम रहती है।

अगर आप खाने के शौकीन है तो ये जगह आपको बहुत पसंद आएगी। यहां छत्तीसगढ़ के सारे परंपरागत व्यंजन मिल जाएंगे। अगर आप खाने के शौकीन है तो ये जगह आपको बहुत पसंद आएगी। यहां छत्तीसगढ़ के सारे परंपरागत व्यंजन मिल जाएंगे।

अगर आप खाने के शौकीन है तो ये जगह आपको बहुत पसंद आएगी। यहां छत्तीसगढ़ के सारे परंपरागत व्यंजन मिल जाएंगे। साल 2016 में स्थापित गढ़ कलेवा की अपनी खासियत है। गढ़कलेवा रोज सुबह 11:00 बजे से खुल जाता है, और रात को 8:00-9:00 बजे तक यहां लोग आते रहते हैं।

कोंडागाँव में बाजार जाती महिलाएं।कोंडागाँव में बाजार जाती महिलाएं।


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 215 किलोमीटर दूर कोंडागाँव जिले के भेलवापारा मोहल्ले में जैसे-जैसे अंदर जाएंगे हर घर में मूर्तियां ढालते, मोम और मिट्टी चढाते लोग मिल जाएंगे।छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 215 किलोमीटर दूर कोंडागाँव जिले के भेलवापारा मोहल्ले में जैसे-जैसे अंदर जाएंगे हर घर में मूर्तियां ढालते, मोम और मिट्टी चढाते लोग मिल जाएंगे।

अगर आपने इतिहास में मोहनजोदड़ो के बारे में पढ़ा होगा तो आपको शायद वहां पर खुदाई में मिली डांसिंग गर्ल की कांस्य प्रतिमा भी याद होगी। कहा जाता है कि वो प्रतिमा ढोकरा शिल्प की थी। बस्तर में आज भी उस कला को जिंदा रखने की कोशिशें जारी हैं। भारत के अलावा विदेशों में भी इस कला की काफी मांग है। साल 2012 में छत्तीसगढ़ के बस्तर से अलग हुए कोंडागाँव के भेलवापारा मोहल्ले में ऐसे सैकड़ों परिवार हैं जो ढोकरा शिल्पकला से मूर्तियों में जान डाल देते हैं। इन शिल्पकारों की बदौलत ढोकरा शिल्प की पहचान देश-विदेश तक हो गई है।

धमतरी जिले में जंगल से लकड़ियां काटकर ले जाती महिला।धमतरी जिले में जंगल से लकड़ियां काटकर ले जाती महिला।

यहां आज भी महिलाएं जंगल से लकड़ियां काटकर लाती हैं, तब कहीं जाकर उनके घर पर चूल्हा जलता है। धमतरी जिले में चिलचिलाती धूप में आदिवासी महिला बिना चप्पल के कई किमी दूर से लकड़ी काटकर ले जाती हुई।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में महंत घासीराम स्मारक संग्रहालय में आदिवासियों की कई साल पुरानी संस्कृतियों को दिखाया गया है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में महंत घासीराम स्मारक संग्रहालय में आदिवासियों की कई साल पुरानी संस्कृतियों को दिखाया गया है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में महंत घासीराम स्मारक संग्रहालय में आदिवासियों की कई साल पुरानी संस्कृतियों को दिखाया गया है।










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