प्लास्टिक के कारण घटी सनई की खेती

प्लास्टिक के कारण घटी सनई की खेतीgaonconnection

प्रतापगढ़। कुछ साल पहले ज्यादातर किसान सनई की खेती करते थे, सनई के प्रयोग भी कई सारे थे, रस्सी बनाना, साथ ही अच्छी हरी खाद भी, न सिर्फ जिले के लोगों के लिए बल्कि बाहर के लोगों के लिए भी यह जीविका का प्रमुख आधार थी।

प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 40 किमी दूर कुंडा तहसील के बरवन सिंह पूरा गाँव के किसान भगवती सिंह (60 वर्ष) सनई की खेती करते थे। सनई को सड़ाकर उसकी रस्सी बनाकर बेचते थे लेकिन अब उन्होंने ये काम बंद कर दिया है। भगवती सिंह बताते हैं, “पहले सनई बोने में काफी फायदा होता था, लोग इसी की सनई की रस्सी से खाट भी बुनावते थे, बहुत से काम में यही रस्सी काम आती थी। लेकिन अब सब कुछ बाजार में ही मिल जाता है, इसलिए लोग अब इसकी खेती नहीं करते हैं।”

प्रतापगढ़ जिले के अंतू, जगेशरगंज, कोहंडौर, रखहा, पट्टी, लालगंज, रानीगंज, कुंडा क्षेत्र में सनई उगाई जाती थी। बरसात के दिनों में उगाई जाने वाले नकदी फसल को आम किसान जहां हरी खाद के रूप में प्रयोग करते थे, वहीं मध्यम और निम्न वर्गीय परिवार की जीविका का यह प्रमुख आधार होती थी। सनई के रेशे से सुतली और टाटपट्टी भी बनती थी। सनई से बनी रस्सी का प्रयोग खाट बनाने के लिए, जानवरों को बांधने के लिए, प्रयोग होती थी। लेकिन अब बाजार में प्लास्टिक की रस्सियां आने लगी हैं, जिससे लोगों का जीवन तो आसान हो गया, लेकिन खेती कम हो गई।

प्लास्टिक का प्रचार-प्रसार अधिक होने के कारण मांग कम हो गई। इससे धीरे-धीरे सनई के उत्पादन भी कम हो गया। सनई की खेती कम होने का कारण रस्सी बनाने की कठिन प्रक्रिया भी है। सनई को कई दिनों तक पानी में भिगोकर कर सड़ाना पड़ता है। अब गाँव में तालाब भी कम हो गए हैं, जिनमें सनई को भिगो सके।

प्रतापगढ़ के चिलबिला बाजार में रेशे की पैकिंग होती थी। रेशे के आकार को छोटा करने के लिए बाजार में एक मशीन लगी हुई थी, जिसमें पेराई करके विशालकाय गट्ठर तैयार किया जाता था। प्रतापगढ़ ही कानपुर जिले में भी किसानों ने सनई की खेती कम हो गई है। कानपुर जिले के नरसूझा गाँव के किसान राम प्रसाद नरसूझा (55 वर्ष) कहते हैं, “पहले लोग सनई की खेती करते थे, लेकिन अब लोगों को ये बहुत लम्बी प्रक्रिया लगती है क्योंकि सनई पहले तो बोना फिर उसकी देखभाल करना और काटकर तालाब में उसके गट्ठर को दबा के रखना। फिर उसकी रस्सी बनाई जाती तब जाकर उसे बाजार में बेचना हो पाता है।” वो आगे बताते हैं, “अब इस महंगाई के दौर में इतनी मेहनत कोई नहीं करना चाहता है अब शायद ही कोई इस फसल को बिना चाहेगा।”

अधिक उत्पादन होने के कारण प्रतापगढ़ में स्थापित हुआ सनई अनुसंधान केंद्र

जिले में उत्पादन अधिक होने के कारण यहां सनई अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई। सनई अनुसंधान केंद्र भी कोलकाता में था। जिले में अधिक उत्पादन को देखते हुए भारत सरकार ने सनई अनुसंधान केंद्र की स्थापना की। सनई अनुसंधान केंद्र के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. मनोज त्रिपाठी  बताते हैं, “सनई के रेशे का प्रयोग ग्रामीण इलाकों में रस्सी बनाने, सुतली से चारपाई बुनने, जानवरों को बांधने के लिए रस्सी बनाने के लिए किया जाता है जबकि देश में टेक्सटाइल मिलों, करेंसी, हैंडबैग, रस्सा, सूती कपड़े बनाने के प्रयोग में लाया जाता था।” सनई अनुसंधान केन्द्र में पिछले दस वर्षों कई नई किस्मों को भी इजाद किया है। नई किस्मों में कीट-रोग से नियंत्रण की क्षमता के साथ ही, अधिक उत्पादन भी देती हैं। K-12 एलो, शैलेश, स्वास्तिक, अंकुर और प्राकुंर नई किस्में हैं। 

डॉ. मनोज कुमार त्रिपाठी बताते हैं, “प्लास्टिक कल्चर आने से इसकी खेती कम हो गई है, साथ ही आज की पीढ़ी मेहनत भी नहीं करना चाहती, क्योंकि इसमें बहुत मेहनत लगती है। पानी में सड़ाने के लिए गाँवों में तालाब भी अब कम रह गए हैं।” वो आगे कहते हैं, “नीलगाय भी एक कारण है, जिससे इनको नुकसान हुआ है। नीलगायों से इन्हें बहुत अच्छे से खाती हैं, पूरी खेती चट कर जाती हैं।”

स्वयं वालेंटियर: अंकित यादव

स्कूल: राम जानकारी महाविद्यालय

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

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