पनामा लीक से पहले घर का काला धन तो देखो...

पनामा लीक से पहले घर का काला धन तो देखो...गाँव कनेक्शन

पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। दो चरणों का मतदान हो गया है। 16 मई तक वोटिंग होगी। 19 मई को नतीजे आ जाएंगे। चार मार्च को चुनावों की घोषणा हुई थी। तब से अब तक इनकम टैक्स वालों ने इन राज्यों में अलग-अलग जगहों से 51 करोड़ रुपये जब्त किए हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक तमिलनाडु से 21.4 करोड़, असम से 11.63 करोड़, केरल से 9.65 करोड़ और पश्चिम बंगाल से 9.03 करोड़ रुपये पकड़े गए हैं। प्रथम दृष्टया ये काला धन है। वैसा ही कालाधन जिसको लेकर चुनावों से पहले और चुनावों के दौरान हर राजनीतिक पार्टी हंगामा करती है, बड़ी-बड़ी बातें करती है। वही कालाधन जो पिछले लोकसभा चुनावों का एक बड़ा मुद्दा बना। वैसा ही कालाधन जो कभी स्विट्जरलैंड के बैंकों में नज़र आता है तो कभी पनामा द्वीप जैसी खूबसूरत लोकेशंस में रातों रात बनी कंपनियों में।

सबको पता है कि चुनावों में कालाधन चल रहा है। नेताओं को पता है, पुलिस को पता है, इनकम टैक्स वालों को पता है, सीबीआई को पता है, चुनाव आयोग को पता है और अब तो रिजर्व बैंक को भी पता है। आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने तो पिछले हफ्ते यहां तक बता दिया कि चुनाव वाले राज्यों में 50 से 60 हजार करोड़ रुपये नगद घूम रहे हैं। राजन के मुताबिक ये पैसा सिर्फ चुनावी राज्यों में ही नहीं आस-पास के इलाकों में भी सर्कुलेशन में है। हाल ही में एक रिपोर्ट में कहा गया कि तमिलनाडु में 60 प्रतिशत वोटरों को राजनीतिक दल सीधे-सीधे कैश देने की तैयारी में हैं। तमिलनाडु में करीब 6 करोड़ वोटर हैं। एक वोटर को 2000 रुपये भी पहुंचे तो करीब साढ़े सात हजार करोड़ रुपया बहेगा। असम और पश्चिम बंगाल से ताल्लुक रखने वाले कई प्रवासियों को पैसा देकर वोट डालने के लिए ले जाया जाता रहा है औऱ ये काम इस बार भी हो रहा है।

वैसे अभी तक के एक अनुमान के मुताबिक पिछले लोकसभा चुनावों में काले धन का प्रवाह सबसे ज्यादा रहा। इसे दुनिया भर के चुनावों में दूसरा सबसे महंगा चुनाव कहा गया। 2012 का अमेरिका का चुनाव सबसे खर्चीला चुनाव माना जाता है। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के अनुमान के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनावों में 30 हजार करोड़ से ज्यादा रुपये खर्च किए गए। इसमें से सरकार और चुनाव आयोग का खर्चा सिर्फ सात से आठ हजार रुपये आंका गया। यानी 22 हजार करोड़ नेताओं और राजनीतिक दलों ने खर्च किए। 2009 के लोकसभा चुनावों में बड़े राज्यों के उम्मीदवार को कुल 40 लाख रुपये खर्च करने की इजाजत थी। ये सीमा 2014 में 70 लाख कर दी गयी लेकिन एक उम्मीदवार ने औसत खर्च किया आठ से दस करोड़ रुपये। इस हिसाब से हर उम्मीदवार के खाते में करीब सात करोड़ 30 लाख रुपये की ब्लैक मनी आती है। लोकसभा चुनावों में काले धन के इस्तेमाल को लेकर ना तो किसी नेता पर और ना ही किसी पार्टी कोई बड़ी कार्रवाई हुई। जिस पार्टी ने 2009 से काले धन को चुनावी मुद्दा बनाया वो अब सत्ता में है, वो कालेधन पर लगाम लगाने की बात कह रही है लेकिन चुनावों में कालेधन को रोकने के सवाल पर वो भी खामोश ही है।

चुनावों की फंडिंग के लिए 2013 में एक अच्छी बात हुई थी। प्राइवेट कंपनियों को राजनीतिक चंदा देने की खुली छूट दी गयी बशर्ते वो एक-एक पाई का हिसाब दें। देश की कुछ नामी गिरामी कंपनियों ने ट्रस्ट बनाए और उनके जरिये राजनीतिक दलों को चुनावी चंदा दिया। 2014 के चुनावों से पहले ऐसे 14 ट्रस्ट बने। ट्रस्ट बनाने वालों में टाटा, रिलायंस, महिंद्रा औऱ बजाज जैसी कंपनियां थी लेकिन कंपनियों की तरफ से दिया गया चंदा कुल राजनीतिक चंदे का सिर्फ 2.2 प्रतिशत ही निकला। चंदे का बड़ा हिस्सा कैश में आया। 20 हजार रुपये तक के चंदे में राजनीतिक दल को कुछ नही बताना पड़ता-किसने दिया, क्यों दिया, कितनी बार दिया-इसका कोई हिसाब नहीं।

विदेशों में जमा भारतियों का धन, चाहे वो उनके निजी खातों में हो या फिर किसी कंपनी में निवेश के तौर पर हो, फौरन काला धन करार दे दिया जाता है। उसपर मीडिया भी टूट पड़ता है और नेता भी लेकिन राजनीतिक पार्टियां कितने आराम से चुनावों में कालाधन खपा रही हैं इस पर गंभीरता ना तो चुनाव आयोग की तरफ से है और ना ही सरकार की तरफ से। अगर रिजर्व बैंक कह रहा है कि 60 हजार करोड़ रुपये चुनावी राज्यों में घूम रहे हैं तो इस पर कोई हड़कंप क्यों नहीं मचा, जांच एजेंसियों ने छापे क्यों नहीं मारे, सरकार ने कोई एसआईटी क्यों नहीं बनाई, हर एक उम्मीदवार के खर्चे को क्यों नहीं खंगाला गया, और अभी तक सिर्फ 51 करोड़ रुपये की ही बरामदगी क्यों हुई? इनमें एक भी सवाल का जवाब देश की जनता को फिलहाल नहीं मिलने वाला है। हर साल दो चार राज्यों में चुनाव होंगे और कालाधन इसी तरह से चलता रहेगा।

(लेखक न्यूज 24 के मैनेजिंग एडिटर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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