प्राइवेट स्कूलों का सरकार और ग़रीब छात्रों से विश्वासघात

प्राइवेट स्कूलों का सरकार और ग़रीब छात्रों से विश्वासघातgaoconnection, school

लखनऊ। प्राइवेट स्कूल सरकार से ज़मीन में छूट से लेकर अन्य सुविधाएं इस शर्त पर लेते हैं कि वह स्कूलों में 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को दाखिला मुफ्त में देंगे। लेकिन हर साल की तरह इस वर्ष भी गरीब बच्चों का हक देने में प्राइवेट स्कूल आनाकानी कर रहे हैं।

लखनऊ के जिलाधिकारी राजशेखर ने राजधानी के सभी प्राइवेट स्कूलों से 21 मार्च तक अपने यहां की 25 प्रतिशत सीटों-शिक्षा का अधिकार के तहत जो गरीब बच्चों के लिए आरक्षित हैं-का ब्यौरा भेजने के निर्देश दिए थे, लेकिन कई स्कूलों ने डीएम का आदेश न मानते हुए अभी तक ब्यौरा नहीं भेजा। जबकि एक अप्रैल से शहर के सभी स्कूलों में दाखिले शुरू होने हैं।

''यह आदेश सभी प्राइवेट स्कूलों को दिया गया था, लेकिन उन्होनें कोई लिस्ट नहीं भेजी। दोबारा से निर्देश दिया गया है और इसकी पूरी जिम्मेदारी बीएसए और सीडीओ को सौंपी गई है। वो इसके खिलाफ ज़रूरी कार्रवाई करेंगें और जल्द ही सूची मंगवाएंगें।'' लखनऊ के जिलाधिकारी राजशेखर ने कहा।

लखनऊ में करीब 2500 स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए 25,000 सीटें आरक्षित हैं। लेकिन प्राइवेट स्कूल गरीबों को उनका हक कितना देना चाहते हैं यह इससे पता चलता है कि 2014 में कुल पांच दाखिले इस नियम के तहत हुए। जबकि 2015 में काफी प्रयासों के बावजूद लखनऊ जिले में 700 से ही दाखिले हो पाए। 

शिक्षा का अधिकार कानून के बाद सुप्रीम कोर्ट ने निजी स्कूलों की 25 फीसदी सीटों पर गरीब बच्चों को दाखिला देने की अनिवार्यता की है। इन बच्चों को कक्षा एक से दाखिला दिया जाता है, वह कक्षा 8 तक उसी स्कूल में नि:शुल्क पढ़ सकते हैं। इन बच्चों की फीस की भरपाई सरकार 400 रुपए प्रतिमाह करती है।

“ये बच्चे कमजोर बैकग्राउंड से आते हैं, वो स्कूलों में खुद को नहीं ढाल पाते, इससे स्कूल का भी रिजल्ट खराब होता है।” लखनऊ पब्लिक स्कूल के पीआरओ विजय शर्मा कहते हैं।

आईआईएम अहमदाबाद की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2013-14 में देशभर के प्राइवेट स्कूलों में कुल 21 लाख सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित थीं, लेकिन इनमें से केवल 29 फीसदी सीटें ही भर पाईं। इस मामले में यूपी की हालत काफी खराब है, यहां कुल सीटों के मात्र तीन प्रतिशत दाखिले ही हुए।

वहीं, इस बारे में लखनऊ के बीएसए प्रवीण मणि त्रिपाठी कहते हैं, “आदेश के बाद कुछ प्राइवेट स्कूलों ने दो दिन में लिस्ट भेजी है, लेकिन ज्यादातर ने आदेश को नकार दिया है। उन्हें दोबारा निर्देश भेजे गए हैं, अगर फिर भी स्कूल ऐसा नहीं करेगें तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। आदेशानुसार गरीब बच्चों का दाखिला उन्हें लेना ही पड़ेगा।”

इस बारे में सिटी मांटेसरी स्कूल (सीएमएस) के संस्थापक जगदीश गाँधी ने प्रतिक्रिया देने से इनकार करते हुए कहा, “प्राइवेट स्कूलों का एक संगठन है, वही इस पर बात करेगा।” जबकि इस प्राइवेट स्कूल संगठन “एसोसिएशन ऑफ इन्डिपेंडेट स्कूल” के अध्यक्ष मधु गर्ग से लगातार कई कोशिश के बाद भी बात नहीं हो सकी।

आरटीई के लिए लंबे समय से काम कर रहे भारत अभ्युदय फांउडेशन की एक्टिविस्ट शमीना बानो कहती हैं, अभी तक स्कूलों ने सीटों की संख्या नहीं बताई है, जबकि डीएम का आदेश था कि 21 मार्च, 2016 तक इन सीटों की जानकारी बीएसए ऑफिस को भेज दी जाए। नया सत्र एक अप्रैल से शुरू होने वाला है।”

बनारस में स्थिति थोड़ी बेहतर

बनारस जिले की स्थिति राजधानी लखनऊ से अच्छी है। वहां पर शिक्षा के अधिकार पर काम करने वाले वल्लभाचार्य पाण्डेय बताते हैं, ''हमारे यहां डीएम के आदेश के बाद स्कूलों ने लिस्ट भेज दे ही इस बार कुल 8000 से 9000 के बीच सीटें खाली हैं कक्षा एक के लिए। पहले से इस बार तैयारी है फार्म भी बीएसए आफिस में मिल रहे हैं।''

गाजियाबाद में भी लड़ाई 

पिछले तीन वर्षों से राइट टू एजुकेशन के लिए काम कर रहे नीरज भटनागर बताते हैं, ''यहां पर लगातार प्रयास करने के बाद दाखिले तो हो गए लेकिन उसके बाद उन बच्चों को न अगली कक्षा में भेजा जाता है, न उन्हें टीसी दी जा रही है, और न ही रिजल्ट। ऐसे 52 बच्चों का भविष्य इस समय अधर में लटका हुआ है। इसकी शिकायत हमने डीएम से लेकर मेरठ मंडल कमिश्नर तक की लेकिन कोई सरकारी कार्रवाई अभी तक नहीं हो सकी।

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