प्याज व्यंजन संवारता है, आंसू भी देता और नकली बुखार भी

प्याज व्यंजन संवारता है, आंसू भी देता और नकली बुखार भीgaoconnection

प्याज लगता है रुलाने के लिए पैदा हुआ है, कभी उपभोक्ता को तो कभी किसानों को। प्याज काटते समय आंसू देता है और बगल में दबा लो तो नकली बुखार लाएगा। उसके लक्षण ही यही हैं। आजादी के 28 साल बाद पहली बार जनता को और बाद में जनता पार्टी को प्याज ने रुलाया था जिससे इंदिरा गांधी वापस सत्ता में आई थीं। अटल जी की सरकार को प्याज ने 2004 में रुलाया था और सत्ता से बेदखल किया था। अब किसानों को रुला रहा है क्योंकि बम्पर फसल के बावजूद भाव बहुत सस्ते हैं और उसकी लागत भी नहीं वसूल हो पा रही है।

प्याज की कमी से निपटने के लिए यूपीए सरकार ने कुछ साल पहले पाकिस्तान से प्याज खरीदने का एलान किया था। वही पाकिस्तान जो आतंकवादी भेजता है और सरहद पर गोलियां बरसाता है। लानत है ऐसे प्याज पर और ऐसी सरकार पर। भारत के देशभक्तों को प्याज खाना छोड़ने में देर नहीं लगनी चाहिए यदि सच्चे दिल से अपील की जाए। उस समय वही प्याज जो खुले बाजार में 80 रुपया प्रति किलो बिक रहा था कांग्रेसी और भाजपाई 30 से 50 रुपए प्रति किलो प्रचार के लिए बेच रहे थे। यदि राजनैतिक दलों को 30 रुपया प्रति किलो प्याज मिल सकता था तो आम आदमी को क्यों नहीं?

नेहरूवियन अर्थव्यवस्था में जब परमिट-कोटा राज था तो खूब जमाखोरी, जखीरेबाजी होती थी और मनमोहनी अर्थव्यवस्था में जब स्वच्छन्द बाजार हुआ तब भी जमाखोरी होती रही। आर्थिक व्यवस्था का स्वरूप बदलने से आम आदमी को कुछ नहीं मिला। आंकड़े बताते है कि 2003-04 में प्याज की पैदावार में केवल 5 प्रतिशत की कमी आई थी और भण्डारण में मामूली कमी। आज भी अर्थव्यवस्था में खुलापन ही है लेकिन प्याज की बम्पर फसल हो गई अब जखीरेबाजों को मजबूर नहीं कर सकते प्याज खरीदने के लिए। सरकार की नीतियां ऐसी हैं कि हर हाल में बिचौलिये लाभ उठाते हैं और किसान तबाह होता है। जब प्याज की पैदावार बहुत हो जाती है तो निर्यात का निर्णय लेने में सरकार कई महीने लगा देती है और किसान मजबूर होकर औने-पौने भाव में बिचौलियों को बेच देता है। तब जाकर आरम्भ होता है निर्यात का सिलसिला और लाभ उठाते हैं जखीरेबाज। यदि पैदावार कम होती है तो पहले से ही आयात की बातें आरम्भ कर दी जाती हैं और बिचौलिए खरीदना बन्द कर देते हैं, किसान फिर भी मजबूर हो जाता है बिचौलियों के हिसाब से बेचने को।

देखा जाए तो बम्पर फसल सभी प्रान्तों में नहीं हुई है लेकिन एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त तक प्याज लाने ले जाने पर पाबन्दी सरकारों ने लगाई है। चीन के बाद दुनिया में भारत सबसे अधिक प्याज पैदा करने वाला देश है फिर भी प्रायः यहां प्याज का संकट आता रहता है चीन में नहीं। चुनाव के समय कांग्रेस और भाजपा ने प्याज की अपनी दुकानें खोलकर बाजार से कॉम्पिटीशन किया और शायद मुनाफा भी कमाया होगा। भाजपा वालों को याद नहीं होगा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने 60 के दशक में कहा था कि सरकार को व्यापारियों का स्वस्थ कॉम्पिटीटर बनकर बाजार में आना चाहिए। उस समय देश में गेहूं चावल जैसे खाद्यान्नों का संकट था और उनकी जमाखोरी होती थी लेकिन इतनी संगठित नहीं थी, आज तो बड़े व्यापारी समय-समय पर संचार माध्यमों का दुरुपयोग करके चुनिन्दा चीजों की जखीरेबाजी करते हैं। चुन-चुन कर कभी लहसुन तो कभी प्याज कभी कोई दूसरी वस्तुओं को अपने भंडारों में दबा देते हैं और नकली अभाव पैदा करते हैं। सरकार को ऐसे नकली अभाव पर नियंत्रण की जरूरत है।

सरकार यदि चाहे तो अभाव की हालत में जखीरेबाजों पर रहम न करके खाद्य सामग्री लागत मूल्य देकर जब्त करे और बाजार में उतार कर बनावटी कमी को दूर कर सकती है। बम्पर फसल की हालत में आलू की तरह ही कोल्ड स्टोरेज बनाए जा सकते हैं। वैसे प्याज के लिए आयात जैसी बातें ठीक नहीं, ग्रीनहाउस जैसी तकनीकें विधाएं अपनाकर स्थायी आपूर्ति के विषय में सोचना चाहिए, खाद्य पदार्थों के लाने ले जाने पर कतई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए, खराब होने वाले पदार्थों के मामले में आयात और निर्यात सम्बन्धी निर्णय त्वरित होने चाहिए और सरकार को अपने कोल्डस्टोरेज बनाकर ऐसी वस्तुओं का भण्डारण सुनिश्चित करना चाहिए। उत्तम तो यह होगा कि हम अपनी भोजन की आदतें थोड़ा लचीली रखें। 

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