जब वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेई सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया तो वो क्या बोले थे...

संसद में आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के खिलाफ अविस्वास प्रस्ताव पर चर्चा हो रही है। संसद का माहौल काफी गर्म है, ऐसा ही कुछ साल २००३ में भी हुआ था... पढ़िए और देखिए उस दिन का हाल।

देश की तेरहवीं लोकसभा में 2003 का मानसून सत्र चल रहा था। दिन था 19 अगस्त। मानसून की बारिश से भले ही बाहर मौसम सुहावना हो गया हो लेकिन संसद उबल रही थी। संसद में ऐसा कुछ हुआ था जिससे अपने चिर-परिचित शांत स्वाभाव के लिए मशहूर सांसद और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को देश सदन के अंदर गुस्से में खड़ा देख रहा था।

कांग्रेस और विपक्ष की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सत्तारूढ़ अटल बिहारी वाजपेई की सरकार को गिराने के लिए उसके खिलाफ नो-कॉन्फिडेंस मोशन यानि अविश्वास प्रस्ताव दायर कर दिया था, जिस पर पिछले दो दिनों से दलों के बीच घमासान चल रहा था। देश के संसदीय कार्यकाल का ये 26वां अविश्वास प्रस्ताव था। आज तक सबसे ज्यादा 23 अविश्वास प्रस्ताव कांग्रेस के खिलाफ लाए गए थे लेकिन आज विपक्षी कांग्रेस ने इस हथियार को सरकार पर प्रहार करने के लिए चुना था।

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प्रस्ताव को संसद में रखते हुए कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी आक्रामक थीं, वो पूरी चार्जशीट तैयार करके लाईं थीं। एक दिन पहले जब उन्होंने प्रस्ताव को संसद के पटल पर रखा तो उसके कारण गिनाते हुए उन्होंने एक-एक करके भाजपा के नेतृत्व वाली मिली-जुली एनडीए सरकार पर नौ आरोप दाग दिए।

लेकिन इस सब के बीच चर्चा के आखिरी चरण में अपना भाषण शुरू करने से पहले तक अटल सब कुछ शांत हो कर सुनते रहे। 1957 से सांसद रहे अटल बिहारी वाजपेई ने अपने जीवन में तमाम अविश्वास प्रस्ताव देखे थे, लेकिन इस बार वे नाराज़ थे, उससे भी ज्यादा आहत। ये नाराज़गी उन्होंने अपने भाषण में भी ज़ाहिर की।

"मैंने अपने जीवनकाल में अनेक प्रस्ताव देखें हैं। लेकिन इस बार प्रस्ताव पेश करते समय चर्चा के समय जो दृश्य उपस्थित हो रहे हैं वो सचमुच अलग हैं-- कुछ मेल नहीं खाते।"

प्रधानमंत्री अटल बोले कि कभी सरकार के पतन की स्थिति होती है, सत्तारूढ़ दल के टूटने की संभावना होती है तो अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है। कई बार केवल सरकार को जागरूक रखने के लिए किसी अहम मुद्दे पर चर्चा के लिए भी इस हथियार का प्रयोग किया जाता है लेकिन अभी समझ नहीं आ रहा कि अविश्वास प्रस्ताव का कारण क्या है?

भारतीय राजनीति का ये वो दौर था जब देश की जनता ने किसी एक पार्टी को बहुमत देकर सरकार बनवाना बंद कर दिया था। एक दूसरे को समर्थन देकर सत्ता चलाना ही एक मात्र विकल्प बचा था।1996 के बाद से देश में जितनी भी सरकारें बनीं वो गठजोड़ से ही बनीं, और टूटती रहीं। कोई भी सरकार पांच साल पूरे नहीं कर पाई थी।

इस दौर में अब तक अटल बिहारी एक ऐसे सूत्रधार के तौर पर उभरे थे, जो तमाम मतभेदों के बाद भी गठबंधन की सरकार 1999 से सफलता से चलाते आए थे, जिसकी प्रमुख विपक्षी पार्टी ने कल्पना नहीं की थी।

अविश्वास प्रस्ताव में सैनिक व देश की सुरक्षा को खतरे में डालाना और विदेश नीति को गिरवी रख आने जैसे बेहद संजीदा आरोप सोनिया गाँधी ने अटल की सरकार पर लगा दिए। अपने आरोपों में कांग्रेस ने सरकार को एक तरफ तो किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए कुछ न करने के लिए घेरा, दूसरी ओर से देश में सरकारी ताकत को खत्म करने का लांक्षन भी लगा दिया।

इसके बाद प्रस्ताव पर चर्चा का जो दौर शुरू हुआ उसने कई रंग देखे। प्रस्ताव के पक्ष में आए सांसदों ने अटल और आडवानी के खिलाफ सदन में कविताएं पढ़ीं, जिनको बोलने को नहीं मिला वो हर बोलने वाले को टोकते रहे। इस चर्चा ने सुषमा स्वराज का वो भाषण भी सुना जिसमें उन्होंने भरे संसद में बोला था, "विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए मैं अकेले ही काफी हूं"। सुषमा ने सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए उस दौर की सबसे बड़ी उपलब्धि ये कहकर गिनाई थी कि जो टेलीफोन पहले सिर्फ अमीरों तक सीमित था, हमने देश के सामान्य लोगों की जेबों तक वो फोन पहुंचा दिए।

इस पूरे अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा के दौरान अटल के गुस्से का कारण इस प्रस्ताव को लाया जाना कम, बल्कि प्रस्ताव पर चर्चा में विपक्ष द्वारा इस्तेमाल किए गए तर्क थे। वे सोनिया गाँधी द्वारा लगाए गए आरोपों पर खासा नाराज़ थे, और उन्होंने अपना विरोध हमेशा की तरह सभ्य-आक्रमता के साथ ज़ाहिर किया।

"चार्जशीट लगाई गई है, दल एक दूसरे के खिलाफ चार्जशीट लगाएं ये विचित्र परंपरा है। दलों के बीच चर्चा होनी चाहिए कोई अल्टीमेटम की भाषा नहीं बोलता कि हम आपको चार्ज करते हैं कि आप ने सैनिक सुरक्षा व्यवस्था खतरे में डाली है! ये कोई साधारण अभियोग नहीं है ... और दूसरा चार्ज है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को सम्पूर्णता में कमज़ोर किया है ... क्या मतलब है इसका?‍ क्या इन अभियोगों के लिए कोई प्रमाण नहीं चाहिए? क्या संसद में इस तरह से आरोप लगाए जा सकते हैं?"

अटल ने आगे अपने संबोधन में कहा, " हमें तो फतवा दे दिया गया है कि हमने विदेश नीति को गिरवी रख दिया ... कहां गिरवी रख दिया बताइए ... कितने रुपए में ये भी बताइए? क्या आप समझते हैं कि भारत इतना सस्ता है कि उसे गिर्वी रखा जा सकता है?

बोलते-बोलते ऐसा मौका भी आया जब अटल ने सीधे सोनिया गाँधी के आरोपों को उनकी आंखों में आंखें डालकर पढ़ा और उनकी भाषा की कड़ी आलोचना की---

"अभी तो मैं सोनिया गाँधी जी का भाषण पढ़ा और दंग रह गया ... उन्होंने सारे शब्द चुनचुनकर एक ही पैराग्राफ में लिख दिये हैं। उन्होंने लिखा है कि ये सरकार इंसेंसेटिव (बेरहम), इंकाम्पिटेंट (अयोग्य) एंडब्रेजन्ली करप्ट (बेशर्मी की हद तक भ्रष्ट) है"।

अटल ने गुस्से में आगे कहा, "राजनीति के क्षेत्र में जो लोग आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश के लिए चल रहे हैं उनके लिए ये आप का मूल्यांकन है? मतभेदों को प्रकट करने का ये तरीका है?"

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भाषण के दौरान संसद में लगातार बढ़ते पारे के बीच प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को आने वाले चुनावों के लिए भी ललकार दिया-

"यहां तो शक्ति परीक्षण के लिए तैयार नहीं है ... अब जब अगले चुनाव होंगे तो हो जाएंगे दो-दो हाथ। लेकिन ये चार्जशीट क्या है"

प्रधानमंत्री यहीं नहीं रुके उन्होंने एक-एक कर हर मुद्दे को छुआ। इसमें से एक अहम मुद्दा संसद में दलों के आपस में बदलते रिश्तों, व्यवहार के तरीकों और भाषा के गिरते स्तर का भी था। सबसे ज्यादा पार्टियों को संगठित कर मिली-जुली सरकार चलाने वाले अटल, भारत में राजनीति के हृदय सम्राट कहे गए आज सांसदों द्वारा चर्चा में इस्तेमाल की गई भाषा से आहत थे। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि संसद के अंदर मूल्य बदल गए हैं, सारी मान्यताएं छोड़ते जा रहे हैं।

"... अरे सभ्य तरीके से लड़िये। इस देश की मर्यादाओं का सम्मान रखिए ... गाली से समस्याओं का हल नहीं होगा। मैं जब पहली बार विदेश मंत्री बना था तो अपने पहले भाषण में सभी पहले के विदेश मंत्रियों का नाम लिया ... सब कांग्रेस के थे लेकिन मैं उनका सम्मान करता हूं। लेकिन अब लगता है राजनीति की आपाधापी में मान्यताएं बदल रही हैं।"

अपने चालीस मिनट से ज्यादा चले भाषाण में अटल बिहारी वाजपेई ने दलों को यह संदेश भी दिया था कि दौर बदल रहा है। सचेत रहने की आवश्यकता है कि कहीं राजनीतिक होड़ में हम एक दूसरे के देशप्रेम पर दबाव न डालें, उस पर सवाल न उठाएं।

दो दिन तक चली चर्चा के बाद कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग हुई। नतीजा ये सामने आया कि तत्कालीन एनडीए सरकार ने भारी मतों से कांग्रेस के इस प्रस्ताव को हरा दिया।

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