ममता बनर्जी-पूरब की जिद्दी बेटी

ममता बनर्जी-पूरब की जिद्दी बेटीवाम मोरचा को पश्चिम बंगाल से उखाड़ फेंकने की कसम खाई थी और वह पूरी हुई।साभार : गूगल

रंजीव

बात साल 1984 की है। पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद देश में लोकसभा चुनाव हो रहे थे। पश्चिम बंगाल की राजधानी कलकत्ता की जादवपुर सीट पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ कांग्रेस ने ममता बनर्जी नाम की एक युवा नेता को उतारा था। तब राजनीतिक दिग्गज यह अनुमान नहीं लगा रहे थे कि इस सीट पर बाजी कौन मारेगा बल्कि शर्त इस पर लग रही थी कि सोमनाथ दादा कितने बड़े अंतर से ममता बनर्जी को हराएंगे।

जब नतीजे निकले तो सारे अनुमान ध्वस्त हो गए। ममता बनर्जी ने सोमनाथ चटर्जी को हरा दिया और सबसे कम उम्र में सांसद बनीं। देश के पूर्वी हिस्से से राजनीति में लंबी पारी खेलने के लिए एक नए सितारे का उदय हो चुका था। उसके बाद के तीन दशक में ममता बनर्जी ने वाकई राजनीति का नया ककहरा लिखा है। जिसमें सादगी भरा जीवन, जुझारूपन, जो कहा सो किया और बड़ी से बड़ी बाधा से भी टकरा जाने का माद्दा रखने की उन्होंने मिसाल कई बार पेश की है।

कांग्रेस से राजनीति शुरू करने और केन्द्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकारों में मंत्री रहने के बावजूद ममता बनर्जी का अपनी पार्टी से एक मुद्दे पर सिद्धांत रूप से हमेशा मतभेद रहा। उनकी यह राय रही कि बंगाल में कांग्रेस को तब सत्तारूढ़ वाम मोर्चा सरकार की बी टीम बना कर रख दिया गया है। इसे लेकर कांग्रेस आलाकमान से मतभेद के समानांतर ही उन्होंने युवा कांग्रेस की अगुवा के रूप में इस संगठन को बंगाल में कांग्रेस से इतर वाम मोर्चा के खिलाफ एक लड़ाकू इकाई में तब्दील कर दिया।

इन पंक्तियों के लेखक को 1991 में से 1996 तक कलकत्ता में ममता बनर्जी की राजनीति को करीब से देखने व समझने का अवसर मिला। जिद और समझौता न करने की उनकी छवि से तब कांग्रेस का आलाकमान खासा खफा रहता थ़ा लेकिन उनकी बढ़ती लोकप्रियता के कारण वह कुछ करने की स्थिति में भी नहीं था। लंबे शासन के बावजूद वाम मोर्चा सरकार को भी पहली बार किसी तगड़ी चुनौती का अहसास होने लगा था। ममता बनाम वाम मोर्चा की तनातनी के उसी दौर में साल 1993 में सात जनवरी के दिन एक ऐसी घटना हुई जिसने आज की ममता बनर्जी के बनने के पीछे की पटकथा भी लिखी।

एक बार राइटर्स बिल्डिंग से निकाल दिया गया था ममता को।साभार : गूगल

हुआ यूं कि दुष्कर्म की शिकार एक बच्ची और उसके परिजनों को लेकर ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल के सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग पहुंच गईं। उनकी मंशा बच्ची व परिजनों के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु से मुलाकात कर यह शिकायत दर्ज करने की थी कि जिस पर दुष्कर्म का आरोप है वह वाम मोर्चा से जुड़ा है इसलिए पुलिस नरमी बरत रही। चूंकि ममता बनर्जी तब केन्द्र में मंत्री भी थीं लिहाजा मुख्यमंत्री से मिलने की मंशा जताने में कुछ अस्वाभाविक भी नहीं था लेकिन ज्योति बसु ने मिलने से इनकार कर दिया जिसके विरोध में ममता ने मुख्यमंत्री के कक्ष के बाहर धरना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद पुलिस ने उन्हें घसीटते हुए राइटर्स बिल्डिंग से बाहर निकाल दिया और एक पुलिस जीप में डाल कर लालबाजार स्थित पुलिस मुख्यालय में हिरासत में रख दिया। रात को उन्हें पुलिस मुख्यालय से लगभग धक्के देकर बाहर निकाल दिया गया।

न सिर्फ बंगाल बल्कि देश की राजनीति में भी वह एक अभूतपूर्व घटना थी। ममता ने उसी दिन सार्वजनिक घोषणा की थी कि अब वह तब तक राइटर्स बिल्डिंग में कदम नहीं रखेंगी जब तक वाम मोर्चा को बंगाल की सत्ता से उखाड़ नहीं फेंकतीं। 1997 में कांग्रेस से नाता तोड़ कर तृणमूल कांग्रेस बनाने के बाद धीरे-धीरे अपनी मूल पार्टी को हाशिए पर डालते हुए ममता की पार्टी ही बंगाल में वाम मोर्चा के खिलाफ मुख्य प्रतिद्धंदी पार्टी बन कर उभरी।

इन वर्षों में ममता ने बंगाल के बाहर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में कामयाबी पाई और साल 2011 में वह मौका भी आ गया जब उनके नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने वाम मोर्चा को चुनाव में हरा कर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की। 20 मई 2011 का दिन बंगाल की राजनीति का एक और यादगार दिन बन गया जब बंगाल के राजभवन में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद ममता आम लोगों की जबरदस्त भीड़ के साथ जुलूस की शक्ल में पैदल ही राइटर्स बिल्डिंग गईं और मुख्यमंत्री के रूप में अपना काम संभाला। वाम मोर्चा को सत्ता से हटाए बगैर इसमें प्रवेश न करने का उनका वादा पूरा हुआ।

इसके बाद ही पूरब की बेटी ने ठान लिया कि मुख्यमंत्री बनकर ही लौटूंगी।साभार : गूगल

मुख्यमंत्री बनने के बाद भी ममता बनर्जी की जीवन शैली में कोई बदलाव नहीं आया। दक्षिण कलकत्ता के हरीश चटर्जी स्ट्रीट के उसी झोपड़ीनुमा मकान में वह आज भी रहतीं हैं जहां वह शुरू से रहीं। बंगाल के जनसमुदाय की प्रिय दीदी राष्ट्रीय राजनीति में भी दीदी के रूप में अपनी मजबूत पहचान बना चुकी हैं जिन्होंने 2016 में बंगाल में दोबारा सत्ता हासिल की। राजनीति मंच पर उनकी धमक अभी कायम रहेगी इससे उनके विरोधी भी इनकार नहीं करते।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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