ये हैं बुंदेलखंड के दशरथ मांझी, जिसने अकेले दम पर खोद दिया कुआं

ये हैं बुंदेलखंड के दशरथ मांझी,  जिसने अकेले दम पर खोद दिया कुआं

आकाश मिश्र, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

चित्रकूट (उत्तर प्रदेश)। बुंदेलखंड में पानी की समस्या से सभी परेशान हैं, लेकिन यहीं पर एक ऐसे भी शख्स हैं जिन्होंने दिन-रात की मेहनत से अकेले के दम पर कुआं खोदकर मिसाल कायम की है।

बुन्देलखण्ड के चित्रकूट जिले के एक छोटे से गांव बडेहार के पुरवा के रहने वाले हैं 85 वर्ष के कृष्णा कोल। कृष्णा कोल ने महात्मा गांधी से मुलाकात भी की थी ,जिसके बाद से उनके अंदर ऐसी प्रेरणा जागी की उन्होंने ठाना की वो गांव में कुआं खोदकर धरती के सीने से पानी निकालकर रहेंगे और हुआ भी वही पाठा के पठारी भाग में कृष्णा कोल ने रात दिन एक करके 50-60 फीट गहरे कुंए को खोदकर गांव की प्यास मिटाई।

कृष्णा कोल कहते हैं, "मुझे अच्छे से याद है जब मैं 15 साल की उमर का था और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया करता था। उसी के चलते मेरी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई।" कृष्णा कोल की मानें तो यही था बदलाव का समय, महात्मा गांधी से भेंट के बाद उनमें बहुत बदलाव आया। गांव आकर उन्होंने इसी जंगल मे घर परिवार बसाया और धीरे-धीरे परिवारों की संख्या बढ़ती गई।

पेयजल संकट के कारण कई वर्षों तक गांव वालों को इधर-उधर भटकना पड़ता था। कृष्णा कोल ने ठाना की वो इस समस्या का हल निकालेंगे और फिर क्या था उन्होंने उठाया हथौड़ा और फावड़ा लग गए कुएं की खुदाई में। शुरुआत में उन्हें बहुत मुश्किलें हुई लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्हें रिश्तेदारो ने भी मदद की और हाड़तोड़ मेहनत के बाद आखिर कुएं की खुदाई का काम पूरा हुआ, पानी निकला।


फिलहाल अब तो देखते ही देखते गांव में पेयजल की आपूर्ति व्यवस्था काफी बढ़िया हो गई है। लेकिन कृष्णा कोल ने जिस वक्त कुंए की खुदाई शुरू की थी उस वक्त दशकों पहले पेयजल का जबरदस्त संकट था। लेकिन इन्होंने हार नही मानी और अपने जूनून से धरती के अंदर से भी पानी निकाल लिया। फिलहाल इस व्यक्ति ने सूखे बुन्देलखण्ड में एक मिसाल कायम की है उस सिस्टम को भी जोरदार तमाचा मारा है जो यहां तक कभी पहुंचा ही नही। इनका गांव चारो तरफ से जंगल से घिरा हुआ है ऐसे में यहां रहने के निर्णय लेना भी दशकों पहले कृष्णा कोल का ही था। आज देखते ही देखते चौथी पीढ़ी सामने खड़ी है लेकिन स्थिति वैसी है। गांव में शिक्षा एव स्वास्थ्य के लिए तो कभी कुछ हुआ ही नही।

पेयजल समस्या समाप्त करके पेश की मिसाल

बुन्देलखण्ड के दशरथ मांझी कृष्णा कोल ने अपनी मेहनत और जूनून से ये निश्चित कर दिया कि अगर आप किसी भी कार्य को ठान लें तो आप निश्चित रूप से उसे साकार कर सकते हैं। बुन्देलखण्ड का समूचा क्षेत्र पेयजल संकट से हमेशा जूझता रहा है। ऐसे में कृष्णा कोल का भागीरथ प्रयास मिशाल पेश करने वाला है। उन्होंने कुंआ खोदकर न सिर्फ अपने गांव में पेयजल की समस्या दूर की बल्कि आस पास के क्षेत्र में एक नया उदाहरण स्थापित किया जिसने बदलाव की नींव रखी। फिलहाल गांव में प्रधान ने बोर करवाकर पेयजल की समस्या को काफी हद तक कम दिया है लेकिन कृष्णा कोल के भागीरथ प्रयास को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

गांव आज भी बदहाल स्थिति में

मानिकपुर ब्लाक में पड़ने वाला गढ़चपा ग्राम पंचायत के अंतर्गतआता है बड़ाहार गांव। सरकारी सिस्टम और सियासत की अनदेखी का जीता जागता उदाहरण है ये गांव। मौजूदा समय मे इस गांव में 35 आदिवासी परिवार रहते हैं, लेकिन सम्पर्क मार्ग न होने के कारण न तो इनके पास शिक्षा व्यवस्था पहुंच सकी और न ही स्वास्थ्य सुविधाएं और न ही अन्य किसी तरह की सुविधाएं । फिलहाल वर्तमान प्रधान रामेंद्र पांडेय की की कड़ी मेहनत के कारण फिलहाल गांव में प्रधानमंत्री आवास पहुंच गए हैं और बिजली भी।

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