पेड़-पौधे भी बताते हैं वायु प्रदूषण का हाल

जिस इलाके में पेड़-पौधों की पत्तियों में आकस्मिक परिवर्तन देखने मिले तुरंत उसका अध्यन किया जाना चाहिए ताकि प्रदूषण और प्रदूषक तत्वों के स्तर की पहचान हो पाए

पेड़-पौधे भी बताते हैं वायु प्रदूषण का हाल

दिल्ली, मुंबई, बैंगलूरू, अहमदाबाद जैसे कई बड़े शहरों के प्रमुख चौराहों पर स्थानीय हवा की गुणवत्ता दिखाते हुए बड़े- बड़े डिजिटल स्क्रीन्स देखे जा सकते हैं। हवा में घुले कण, प्रदूषकों की मात्रा और शहर के तापमान जैसे आंकड़ों को ऐसे स्क्रीन्स पर प्रदर्शित किया जाता है। अंधाधुंध शहरीकरण और वृक्षों की बेजा कटाई के चलते मौसम का जो हाल हुआ है वो किसी से छिपा नहीं है। सारा उत्तर और मध्य भारत हालिया दौर में लू के थपेड़ों से त्रस्त होकर रेड अलर्ट केटेगरी में तप रहा है।

साल दर साल मौसम के बिगड़ने और रूठने की खबरें आम होती जा रही है। कई बार मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणियां भी गलत साबित होने लगी है। शहरीकरण और इंड्स्ट्रीज़ के ताबड़तोड़ बनने, वाहनों के धुएं, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के बेजा इस्तेमाल आदि से और भी हाल बेहाल हो चुका है। दुनिया के सबसे प्रदुषित शहरों में हिन्दुस्तानी शहरों की भी गिनती होने लगी है। बड़े- बड़े आयोजनों, प्रचार-प्रसार के जरिये जंगलों को बचाने की कवायद जरूर की जाती है लेकिन परिणाम देखने नहीं मिल रहे हैं।

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पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस था। साल दर साल तमाम तरह के मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सरकारी, गैर-सरकारी तंत्रों के द्वारा पौधरोपण और पर्यावरण बेहतरी के जनजागरण, कार्यशालाओं आदि को लेकर खबरें आईं, लेकिन बावजूद इन प्रयासों के, स्थिती हर साल बिगड़ती ही जा रही है। इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस पर 'वायु प्रदूषण' के मुद्दों पर प्रचार- प्रसार किया गया। वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में सबसे अहम भूमिका पेड़-पौधे निभाते हैं। पेड़- पौधों की मदद से किसी भी इलाके की हवा, पानी और मिट्टी की गुणवत्ता आंकी जा सकती है।

किसी भी एक प्रदूषक तत्व की अधिकता से पौधों की वृद्धि और विकास में तेजी से फर्क देखा जा सकता है। पाइनस के पेड़ की सुई जैसी नुकीली हरी कोमल पत्तियों में नेक्रोसिस और क्लोरोसिस (पत्तियों का गलना और रंग का उड़ जाना) वातावरण में सल्फर डायऑक्साइड और नाइट्रोजन डायऑक्साइड ज्यादा होने की वजह से होता है। हर स्थानीय वनस्पति का गहनता से अध्धयन कर हम इनका इस्तेमाल प्रदूषण सूचक (पोल्यूशन मॉनिटरिंग) की तरह कर सकते हैं।



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वायु प्रदूषण और पेड़-पौधों को लेकर दुनियाभर हजारों लाखों शोध किए जा चुके हैं। लाइकेन्स, छोटे पौधे, शाक, झाड़ियों, बड़े वृक्षों, खेती- बाड़ी की फसलों, सड़क किनारे लगे पेड़- पौधों आदि में वायु प्रदूषण की वजह से होने वाली विसंगतियों पर काफी शोधकार्य किये जा चुके हैं। वायु प्रदूषण की वजह से पेड़-पौधों में पाए जाने वाले रसायनों में भी काफी बदलाव देखा गया है। सन 1986 में वैज्ञानिक वोरा और उनके साथियों नें एक अध्धयन के जरिये बताया कि वायु में प्रदूषक तत्वों खास तौर से निलम्बित अभिकणीय पदार्थ (सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर या SPM) की वजह से रेठू (कॉर्डिया मिक्सा) पेड़ की अनेक कोशिकाओं में शर्करा की मात्रा कम हो गयी। यह अध्धयन अनेक पेड़ पौधों में किया गया और बरगद एक ऐसा वृक्ष देखने में आया जिसमें SPM का खासा असर नहीं हुआ। इसी शोध के दौरान वैज्ञानिक वोरा ने पाया कि पीपल, महारुख, अकोना, अशोक, पारिजात जैसे पेड़ों में भी इसका असर काफी होता है।


वातावरण में SPM और धूल की अधिकता होने पर आम जैसे पेड़ों को काफी क्षति होती है और इनकी उत्पादकता में भी काफी गिरावट आती है। आम की पत्तियां धूल के कणों को अपने करीब चिपका लेती हैं, इसी तरह नीम और गूलर की पत्तियाँ इंडस्ट्रीयल इलाकों में उड़ने वाली राख को चिपका लेती हैं। इस वजह से इन पत्तियों द्वारा भोजन बनाने (प्रकाश संश्लेषण) की प्रक्रिया में भी गिरावट आती है जिसका असर पेड़ की समुचित वृद्धि पर देखा जा सकता है। सन 1988 में वैज्ञानिक बेग और फारुख नें एक शोध के जरिये बताया कि हवा में सल्फर डायऑक्साइड ज्यादा हो जाए तो इमली, जंगल जलेबी, पीपल, नीम, और गूलर जैसे पेड़ों की पत्तियां परिपक्व होने से पहले ही गिर जाती हैं।

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वैज्ञानिक कुलश्रेष्ठ और उनके साथियों नें सन 1994 में एक शोध रपट प्रकाशित किया था जिसमें बताया गया कि डीज़ल वाहनों से निकलने वाले धुएं की वजह से नारंगी (लैंटाना) और जामुन की पत्तियों की मोटाई ज्यादा हो गयी और कहीं कहीं पत्तियां कटी-फटी भी दिखायी देने लगी। इससे पहले वैज्ञानिक घोष ने एक शोध रपट (1984) के द्वारा जानकारी दी थी कि पेट्रोल और डीज़ल के धुएं की वजह से सागौन के वृक्षों में लकड़े के उत्पादन में 26% तक की गिरावट आ गयी थी।


अनेक शोध पत्रों के अध्यन से ये जानकारी मिलती है कि हर एक पौधा वायु प्रदूषकों के प्रभावों को अलग अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है। जिस तरह सन 1986 में वैज्ञानिक वोरा और उनके साथियों नें अपने अध्ययन के आधार पर बताया था कि वायु में सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर (SPM) की वजह से रेठू (कॉर्डिया मिक्सा) पेड़ की अनेक कोशिकाओं में शर्करा की मात्रा काफी कम हुयी लेकिन बरगद एक ऐसा वृक्ष देखने में आया जिसमें SPM का खासा असर नहीं हुआ। यानी बरगद को SPM के लिए सहनशील माना गया। इसी तरह अन्य प्रदूषकों के असर पर भी शोधों द्वारा जानकारी दी गयी है। इस संदर्भ में इंस्टीट्यूट ऑफ रुरल मैनेजमेंट आनंद (गुजरात) के प्रमोद कुमार सिंह के सन 2005 के लेख को पढ़ा जाना चाहिए।

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पेड़ पौधे पर्यावरण सूचक होते हैं। इनके रोपण से पहले इन पौधों की सहनशीलता उस इलाके के वातावरण के अनुरूप हो तो बेहतर तरीके से इस कार्य को अंजाम तक पहुंचाया जा सकेगा। डीज़ल, पेट्रोल और इंडस्ट्रियल धूल और धुएं वाले इलाकों में उन पेड़-पौधों को लगाया जाए जो कि इस तरह के माहौल के लिए बेहद संवेदनशील हैं तो समय, पैसा और प्रयासों की बर्बादी ही होगी,

जिस इलाके में पेड़-पौधों की पत्तियों में आकस्मिक परिवर्तन देखने मिले तो तुरंत उसका अध्यन किया जाना चाहिए ताकि प्रदूषण और प्रदूषक तत्वों के स्तर की पहचान हो पाए। उद्यानों, सड़क के किनारे, शहरी सौंदर्यीकरण के दौरान बतौर इंडिकेटर पेड़- पौधे लगाए जाएं तो काफी हद तक सफलता मिलेगी। इन सब के अलावा हम सभी को भागीदार बनकर अपने पर्यावरण को बचाने के पुरजोर प्रयास करने चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को हम एक स्वच्छ और सांस लेने वाला परिवेश दे पाएं।

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