लोकसभा चुनाव 2019: धराशाई हो गए बड़े-बड़े किले

इन दिग्गजों का हारना यह दिखाता है कि आज का वोटर अपने नेता को अपने बीच देखना चाहता है आप सिर्फ अपने विरासत के तौर पर नहीं जीत सकते

Manish MishraManish Mishra   24 May 2019 1:48 PM GMT

लोकसभा चुनाव 2019: धराशाई हो गए बड़े-बड़े किले

लखनऊ। लोकसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी के आगे ताश के पत्तों की तरह धराशायी हुए विपक्ष में कई ऐसे परिवार और घराने हैं जो वर्षों से अपने-अपने क्षेत्रों में झंडा बुलंद किए हुए थे। मोदी सुनामी में इनका हारना एक नए तरह की राजनीति का संकेत देता है।

अपनी राजनीतिक विरासत संभाले ये पुरोधा यह मान के चलते हैं कि ये सीटें उनकी जेब में होती हैं और वोटर से धीरे-धीरे कटते चले जाते हैं। इन दिग्गजों का हारना यह दिखाता है कि आज का वोटर अपने नेता को अपने बीच देखना चाहता है आप सिर्फ अपने विरासत के तौर पर नहीं जीत सकते।

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राहुल गांधी (अमेठी)

वर्ष 1967 में यह जिला अस्तित्व में आया, यहां से पहले सांसद विद्याधर बाजपेई कांग्रेस से चुने गए। साल 1977 में जनता पार्टी से रविन्द्र प्रताप सिंह सांसद बने, 1980 में संजय गांधी ने रविन्द्र प्रताप सिंह को हरा दिया। 1981 में राजीव गांधी ने उप चुनाव में सांसद बने, इसके बाद 1991 तक राजीव गांधी यहां के सांसद रहे, जब उनकी हत्या हो गई, तो उनकी मृत्यु के बाद सतीश शर्मा उपचुनाव में यहां से सांसद बने। 1996 में फिर से सतीश शर्मा एमपी बने। 1998 में संजय सिंह ने सतीश शर्मा को हराया। 1999 से 2004 तक सोनिया गांधी सांसद रहीं, 2004 से 2019 तक राहुल यहां से जीतते रहे। अमेठी की जनता में राहुल को लेकर गुस्सा इसलिए भी था कि वो ज़मीन से कट गए।


ज्योतिरादित्य सिंधिया (गुना)

साल 1957 से सिंधिया परिवार के राजनीतिक गढ़ मानी जाने वाली मध्य प्रदेश की गुना सीट पर राजमाता विजय राजे सिंधिया, माधवराव सिंधिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया का बारी-बारी से कब्जा रहा है। पिछले बीस सालों से माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया बतौर सांसद यहां से प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इस बार के चुनावों में केपी सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को शिकस्त दी। पिछले विधानसभा चुनावों में ज्योतिरादित्य सिंधिया के एमपी में मेहनत और प्रचार करने के तरीके को देखते हुए उन्हें पश्चिमी यूपी को संभालने की जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन ज्योतिरादित्य अपना किला नहीं बचा सके।

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डिंपल यादव (कन्नौज)

साल 1998-99 से यह सीट सपा के पास थी, प्रदीप कुमार यादव, मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव और डिंपल यादव यहां से समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधित्व करते रहे। लेकिन बीस साल की सपा की इस विरासत को 2019 में भाजपा के सुब्रत पाठक छीन लिया।


मल्लिकार्जुन खड़गे (गुलबर्गा)

अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार हार का स्वाद चखना मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए बड़ी बात है। वर्ष 1952 से लेकर 2019 तक में गुलबर्गा से सिर्फ दो बार गैर कांग्रेसी यहां से सांसद बना। साल 1996 में जनता दल से कमरुल इस्लाम और 1998 में बासवराज पाटिल यहां से सांसद बने। इसके अलावा कर्नाटक की गुलबर्गा सीट सिर्फ कांग्रेस के कब्जे में ही रही ।



भूपिंदर सिंह हुड्डा

दो बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे और तीन बार लोकसभा चुनावों में चौधरी देवीलाल का हराने वाले और राजनीति के पुरोधा भूपेंदर सिंह हुड्डा अपना गढ़ बचा नहीं पाए। साल 2019 के लोकसभा के चुनावों में भाजपा के रमेश चंद्र कौशिक से हार मिली।


अजित सिंह

पश्चिमी यूपी राष्ट्रीय लोकदल का गढ़ माना जाता है, और यहां से नेता चरण सिंह भारत के पांचवें प्रधानमंत्री थे। चरण सिंह को किसानों का नेता माना जाता था, और रालोद का पश्चिमी यूपी में अच्छा खासा प्रभाव था। चौ. चरण सिंह की विरासत संभाल रहे उनके बेटे चौ. अजित सिंह और उनके पौत्र जयंत चौधरी अपनी-अपनी सीट नहीं बचा पाए।


महबूबा मुफ्ती

जम्मू-कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री और पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद की राजनैतिक विरासत संभाल रहीं महबूबा मुफ्ती भारत में दूसरी मुस्लिम महिला मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में महबूबा अनंतनाग सीट पर तीसरे नंबर पर रहीं।

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दिग्विजय सिंह

साल 1969 से मध्य प्रदेश की राजनीति में सक्रिय दिग्विजय सिंह राज्य से लेकर केन्द्र तक कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर दिग्विजय सिंह ने दो बार शासन किया। लेकिन इस बार के लोकसभा के चुनावों में साध्वी प्रज्ञा से हार गए।


एचडी देवेगौड़ा

पूर्व प्रधानमंत्री व कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे एचडी देवेगौड़ा इस बार अपनी तुमाकुरु सीट नहीं बचा पाए। इससे पहले देवेगौड़ा हासन सीट से चुनाव लड़ते थे लेकिन इस बार उन्होंने अपने पौत्र के लिए यह सीट छोड़ दी थी।


शीला दीक्षित

साल 1998 से 2013 तक सबसे अधिक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। दिल्ली की सभी सातों सीटें भाजपा ने जीतीं। शीला दीक्षित इंदिरा गांधी की करीबी मानी जाती थीं। दिल्ली में मेट्रो चलाने समेत इसके सुंदरीकरण के लिए काफी काम किया। लेकिन वह साल 2019 में चुनाव जीत न सकीं।


हरीश रावत

मुरली मनोहर जोशी को तीन बार परास्त कर चुके और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत इस बार ऊधमसिंहनगर-नैनीताल की सीट से चुनाव मैदान में उतरे थे। बीजेपी के अजय भट्ट ने उन्‍हें 3 लाख 39 हजार वोटों से शिकस्त दी।


शिबू सोरेन

पिछले 39 साल में सिर्फ सात साल दुमका सीट पर दूसरी पार्टियों का कब्जा रहा, इसके अलावा हमेशा से ही इस सीट पर झारखंड मुक्त मोर्चा के मुखिया शिबू सोरेन का ही कब्जा रहा। शिबू सोरेन दो बार मुख्यमंत्री भी रहे हैं। लेकिन वर्ष 2019 में शिबू सोरेन को बीजेपी प्रत्याशी सुनील सोरेन ने 47 हजार के अंतर से हरा दिया।

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