मोदी को जनता ने सुना, अब जनता की बारी

जब मन्दी का दौर चल रहा था तब पहली पारी में मोदी सरकार ने विश्व की सर्वाधिक विकास दर हासिल करके दिखाई, लेकिन अब क्या हो गया कि देश का जीडीपी ग्रोथ रेट 6.8 प्रतिशत के निचले स्तर पर पहुंच गई, बेरोजगारी 45 साल में सर्वाधिक हो गई, विदेशी मुद्रा भी वांछित गति से नहीं आ रही है

मोदी को जनता ने सुना, अब जनता की बारी

मोदी सरकार ने सामाजिक और भावनात्मक मुद्दों पर तेजी वे काम शुरू किया है लेकिन आर्थिक पक्ष पर जो आंकड़े सांख्यिकी विभाग द्वारा सामने आए हैं उन्हें चेतावनी मानकर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है । मोदी ने सत्ता संचालन का दुनिया में एक पैमाना प्रस्तुत किया है इसलिए जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए मोदी की तुलना किसी और से नहीं स्वयं मोदी से होगी। अच्छी बात है कि उच्च स्तरीय कमेटियां बनाकर सरकार ने इस विषय पर भी गम्भीरता दिखाई है। आवश्यकता है उन कारणों को जानने की जिनसे शिखर पर चल रही अर्थव्यवस्था अधोमुखी हो गई है।

संसार में जब मन्दी का दौर चल रहा था तब पहली पारी में मोदी सरकार ने विश्व की सर्वाधिक विकास दर हासिल करके दिखाई लेकिन अब क्या हो गया कि देश का जीडीपी ग्रोथ रेट 6.8 प्रतिशत के निचले स्तर पर पहुंच गई, बेरोजगारी 45 साल में सर्वाधिक हो गई, विदेशी मुद्रा भी वांछित गति से नहीं आ रही है। उद्योग को बढ़ावा देने के लिए बैंकों ने ब्याज दर घटाई है जिससे बैंकों से ऋण सस्ते मिल सकेंगे लेकिन बैंक ब्याज पर जीविका निभाने वाले और सेवानिवृत्त बुजुर्गों की आय घट जाएगी। पुराने वित्तमंत्री को शायद पता हेागा निदान लेकिन वह छोडकर चले़ गए, बजट पूर्व आर्थिक सर्वे में तस्वीर सामने आएगी।

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प्रतिकात्मक तस्वीर साभार: इंटरनेट

प्रश्न है क्या हम कृषि प्रधान देश रहते हुए, खैरात बांटते हुए, किसानों का वोट बैंक सहेजते हुए दुनिया के विकसित देशों की कतार में ख़ड़े हो पाएंगे अथवा अन्य विकसित देशों की तरह उद्योग प्रधान भी बन सकेंगे। क्या हम किसान की आमदनी दूनी करने की मृगमरीचिका के पीछे दौड़ते रहेंगे?

प्रश्न है कि हमारी आर्थिक डगर क्या होगी नेहरूवादी नियंत्रित अर्थ व्यवस्था अथवा दीनदयाल जी की राह। साठ के दशक में भारतीय जनसंघ जिसका रूपान्तरण है भाजपा उसके अघ्यक्ष और प्रेरणाश्रोत दीनदयाल उपाध्याय का उदघोष था '' हर हाथ को काम, हर खेत को पानी" । जिस दिन हर हाथ को काम मिल जाएगा, बेरोजगारी शून्य हो जाएगी और जिस दिन हर खेत को पानी मिलेगा, किसान की आय अपने आप दो गुनी हो जाएगी।

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दीनदयाल जी का मानना था कि निजी क्षेत्र को पूरी आजादी हो और सरकार चाहे तो स्वस्थ प्रतिस्पर्धी के रूप में कार्य करे। भारत के प्रथम और अन्तिम गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी का भी कहना था कि सबसे अच्छी सरकार वह है जो सबसे कम बंदिशे लगाए। बंदिशे लगाने वाला साम्यवादी सोच दुनिया से लगभग समाप्त हो चुका है और भारत में भी आखिरी सांसें ले रहा है।

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सरकारी नियंत्रण का नमूना है कि जितने भी उद्योग सरकार ने अपने हाथ में लि सब घाटे में चले। सीमेन्ट, कपड़ा, उर्वरक, कोयला और स्टील सब घाटे में रहे हैं और सरकार उनका बोझ ढोती रही। अभी भी उन्हें पुनर्जीवित करने में लगी है। यहां तक रेलवे भी घाटे में चल रहा है जिसके प्राइवेटाइजेशन की बातें भर होती हैं। जीवन बीमा निगम को छोड़ दें कोई सरकारी उपक्रम लाभ में नहीं हैं। अतः विदेशों में पूंजी खोजने के बजाय घाटे वाले उपक्रम नीलाम कर देने चाहिए और निजी क्षेत्र को मौका देना चाहिए।

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पुरानी घिसी पिटी अर्थनीति को तिलांजलि देकर जिस तरह चीन और रूस जैसे साम्यवादी देशों ने आधुनिक अर्थतंत्र की राह पकड़ी है भारत को भी अपनानी चाहिए। कुछ तो कारण होगा कि वही उद्योग सरकारी तंत्र में घाटे में चलते हैं और प्राइवेट हाथों में लाभ कमाते हैं। गांवों में देश की 70 प्रतिशत आबादी रहती है इसलिए जरूरत है गांवों में छोटे और मझोले उद्योग लगाने की जिनमें किसानों की उपज कच्चा माल बने और गांव वालों को काम मिले, उनकी आय स्वतः दूनी हो जाएगी। गांवों को खैरात नहीं स्वावलम्बन चाहिए।

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कल्याणकारी योजनाओं को चलाने के लिए धन जुटाने में जीएसटी के अलावा किन श्रोतों का सहारा लिया जाएगा यह तो बजट प्रस्तावों में ही पता चलेगा। फिर भी जनता की जिज्ञासा रहेगी कि मौजूदा कर प्रणाली में कर-चोरी, बेनामी सम्पत्ति से निपटने की योजना क्या हैं। अभी कृषि आय की करमुक्ति का लाभ किसान को नहीं बाहरी धन्नासेठों को मिल रहा है। आने वाले बजट का बेसब्री से इन्तजार रहेगा कि मौजूदा सरकार में भारत को जगतगुरु और सोने की चिड़िया बनाने का कितना दृढ़ संकल्प है।

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