'मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौतों से लीची का कोई कनेक्शन नहीं'

मुजफ्फरपुर स्थित राष्ट्रीय लीची रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक ने गाँव कनेक्शन से कहा, लीची में ऐसा कोई तत्व नहीं जिससे किसी की मौत हो, लीची को डायबिटीज के मरीज भी खा सकते हैं

Manish MishraManish Mishra   22 Jun 2019 8:16 AM GMT

लखनऊ। "चमकी बुखार से हो रही बच्चों की मौतों का लीची से कोई कनेक्शन नहीं है। यह महज संयोग है कि जहां लीची सबसे ज्यादा पैदा होती है वहां इस बुखार से मौतें हो रही हैं," मुजफ्फरपुर में लीची रिचर्स इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. विशाल नाथ ने गाँव कनेक्शन से फोन पर कहा।

बिहार के मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से हो रही मौतों के बाद यह भी यह भी कहा जाने लगा कि कहीं बच्चों की मौत अधिक लीची खाने से तो नहीं हो रही? क्यूंकि जहां चमकी बुखार बच्चों की मौतें हो रही हैं वो मुजफ्फरपुर जिला भारत में लीची उत्पादन के लिए काफी चर्चित है।

"अगर बच्चों की मौतें लीची खाने से हो रही हैं तो-देहरादून, पठानकोट, रांची, सहारनपुर, पश्चिम बंगाल में ऐसे मामले क्यूं सामने नहीं आते? वहां भी तो लीची का उत्पादन होता है। इसे सिर्फ मुजफ्फरपुर से क्यूं जोड़ा जाए?," डॉ. विशाल नाथ ने गाँव कनेक्शन से कहा, "मुजफ्फरपुर में लीची 200 साल से पैदा हो रही है, तब तो ऐसे मामले नहीं आते थे।"

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मुजफ्फरपुर में अब तक चमकी बुखार से 100 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी, 200 से ज्यादा बच्चे गंभीर हैं।

डॉ. विशाल नाथ, निदेशक, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र मुजफ्फरपुर

"मैंने कई रिसर्च पेपर छापे हैं, और जो लोग इस बीमारी को लीची से जोड़ कर देख रहे हैं वह गलत है। लीची में ऐसा कोई तत्व नहीं पाया जाता जिसे खाने से किसी की मौत हो," निदेशक डॉ. विशाल नाथ ने बताया, "मुजफ्फरपुर के जिन दो ब्लॉक में इन बच्चों की मौतें हो रही हैं, वो कुपोषित हैं और गरीब घरों से हैं। साथ ही, उन ब्लॉक का मौसम ऐसा है कि वहां बहुत गर्मी पड़ती है और उमस की वजह से बच्चे बीमार पड़ते हैं।"

राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र मुजफ्फरपुर (ICAR से संबंधित) के अऩुसार बिहार में लाखों किसान को लीची से रोजगार मिला हुआ है, और सालाना करीब 6 लाख टन उत्पादन होता है। मुजफ्फरपुर इसका केंद्र है, इसके साथ ही समस्तीपुर, वैशाली और मोतिहारी में भी बड़े पैमाने पर लीची के बाग हैं।

इस समय भी बगानों में लीची की तुड़ाई चल रही है।

हालांकि लीची रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक लीची खाने के बारे में कुछ सावधानियां बरते की भी सलाह देते हैं। "लीची गर्मी के मौसम का फल है। इसलिए इसे ठंडा करके ही खाना चाहिए। वो गर्मी का कोई भी फल हो उसे पानी आदि से पहले ठंडा करें फिर खाना चाहिए," डॉ. विशाल नाथ ने बताया।

"ये जो चमकी बुखार है बारिश न होने से हो रही है, एक बार बारिश हो जाएगी तो तापमान गिरेगा और बीमारी पर लगाम लग जाएगी। इसके लिए जरूरी है, कि लोग अपने बच्चों की गर्मियों के मौसम में ख्याल रखें और खाली पेट न बाहर जाने दें, रात में कार्बोहाइड्रेट जरूर खिलाएं," डॉ. विशाल नाथ ने समझाया।

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उन्होंने कहा, "लीची तो ऐसा फल है कि इसे जामुन की तरह ही डायबिटीज के मरीज भी खा सकते हैं।"

इस बारे में मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल (एसकेएमसीएच) के मेडिकल सुपरिटेंंडेंट डॉ. सुनील शाही ने गाँव कनेक्शन को बताया, "इस बीमारी से लीची का दूर-दूर तक लेना-देना नहीं है, एक साल या दो साल के बच्चे आ रहे हैं, कौन माँ अपने एक-दो साल के बच्चे को लीची खिलाएगी? लीची तो पिछले साल भी हुई थी, उससे पहले भी हुई थी, तो इस साल ही मौतें क्यूं जयादा हुईं?"

उन्होंने आगे कहा, " साल 1993 से यही रहा है, अगर बारिश अच्छी तो ये बीमारी अपने आप खत्म हो जाती है। अगर आज अच्छी बारिश हो जाए तो यह बीमारी स्वत: समाप्त हो जाएगी।"

लीची आम के सीजन से कुछ पहले बाजारों में आती है और 20-25 दिनों में गायब हो जाती है। विश्व में सबसे गुणकारी लीची का उत्पादन बिहार के मुजफ्फरपुर में ही होता है। मुजफ्फपुर और मेहसी से रुस, फ्रांस, अमेरिका और कनाडा और साउदी अरब समेत कई देशों में इसका निर्यात भी होता है।

वहीं, मुजफ्फरपुर में लीची के बाग के मालिक पप्पू ने फोन पर बताया, "हम लोग जब लीची के पेड़ में फूल आ रहे होते हैं, तो वो गिरे ना इसलिए एक बाद दवाई डालते हैं। उसके बाद कोई दवाई नहीं डालते। इसलिए ये कहना कि दवाई का असर है ये गलत है।"


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