Union Budget 2019: बजट में किसानों ने क्या कुछ पाया?

बजट का आधार जब तक समतुल्य वितरण और ज्यादा जरूरतमंद तबके तक संसाधन पहुँचाना नहीं बनेगा तब तक कोई भी बजट दस्तावेज यह दावा नहीं कर सकता कि वह पूरे देश का बजट है।

Suvigya JainSuvigya Jain   6 July 2019 6:00 AM GMT

Union Budget 2019: बजट में किसानों ने क्या कुछ पाया?

लखनऊ। आमतौर पर देश के बजट में ज्यादा सनसनीखेज ऐलान नहीं होते। हालांकि चुनावी बजट अपवाद जरूर होते हैं। यह बजट चुनाव के बाद का है इसलिए इसमें सरकार को ज्यादा बड़े एलान करने की जरूरत नहीं थी। फिर भी चुनाव के पहले किए वायदों को याद जरूर रखना था।

लेकिन इस बजट को देख कर लग रहा है कि उन वायदों को भी याद नहीं रखा गया। हां, वित्तमंत्री के भाषण में पांच साल की उपलब्धियों और आगे पांच दस साल के सपनों का नज़ारा जरूर है।

सिर्फ एक साल का होता है बजट

बजट में पिछले एक साल की तुलना में अगले साल की सरकारी आमदनी और खर्च का हिसाब होना चाहिए। इसी से पता चलता है कि आज की तारीख में देश की माली हालत क्या है और हमारी सरकार देश और उसके नागरिकों के लिए अगले साल क्या करने का इरादा जता रही है।

हर तबका उम्मीद लगाए रहता है बजट से

देश के हर तबके के नागरिक हर साल आम बजट से उम्मीदें लगाए रखते हैं। ये तबके वे होते हैं जिन्हें रोजमर्रा की जरूरतें पूरा करने में मुश्किल आ रही होती है। जिन्हें सब्जियों के दाम, ट्रेन के किराए और स्कूल अस्पताल की फीस घटने बढ़ने से फर्क पड़ता है।

ये लोग वित्तीय बजट के जटिल ढांचे को नहीं समझते। लेकिन इसे वे अपनी मुश्किलें कम करने का दस्तावेज जरूर मानते हैं। वे उम्मीद लगाए रखते हैं कि बजट उनकी गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी जैसी समस्याओं का हल ले कर आ सकता है।

यह वह तबका है जिसमें गांव, कस्बे, शहरी गरीब और निम्न मध्य वर्ग शामिल होता है। देश की आबादी में यह तबका सबसे बड़ा है। इसलिए हर सरकार का मुख्य लक्ष्य इसी तबके तक लाभ पहुंचाना होना भी चाहिए।

आखिर लोकतांत्रिक राज्यव्यवस्था का मुख्य ध्येय ही समानता का लक्ष्य साधना होता है। बजट इस काम को करने का सबसे कारगर जरिया है। इसलिए हर साल देश में मौजूद वित्तीय संसाधनों को वितरित करने की रूपरेखा पेश की जाती है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि संसाधनों का वितरण करते समय समानता के लक्ष्य के आधार पर बजट में प्राथमिकताएं तय होनी चाहिए। लेकिन कुछ सालों से बजट में ऐसा होता दिख नहीं रहा है। लगने लगा है कि प्राथमिकताएं अब दूसरे पैमानों पर रख कर तय होने लगी हैं।

सरकारें अब अपना लक्ष्य जीडीपी की दर और ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी के पैमाने पर बनाने लगी हैं। इन लक्ष्यों को पाने की दौड़ में एक सीमित तबका ही सरकार के साथ दौड़ पा रहा है। पहले से संपन्न और समृद्ध उसी तबके के दम पर जीडीपी के आंकड़े आ रहे हैं।

इसलिए जोखिम यह है कि उसी तबके के विकास की योजनाएं ही न बनने लगें। दरअसल इस माहौल में खेती, किसानी और मजदूरी में लगे गरीब और गांव में रह रहे तबके की सेवाएं और उत्पाद इतने सस्ते हैं कि देश की विकास दर में उनका योगदान नगण्य नजर आने लगा है।

बहुत संभव है इसी बात के मद्देनजर उन्हें बजट में हिस्सेदारी भी उसी हिसाब से मिल रही हो। इसलिए हो सकता है कि कभी उनके हिस्से में आय बढाने के नाम पर 500 रूपए महीना आता है और कभी रोजगार सृजन के नाम पर सस्ते लोन की सुविधा का ऐलान किया जाता है।

बहरहाल, जरूरतमंद तबके के लिए ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश न निकलने के कुछ कारणों पर भी गौर होना चाहिए।

बजट का आकार है खास बात

इस बार के बजट का आकार पिछले बजट से सिर्फ साढ़े तीन लाख करोड़ बढ़ा है। पिछले साल यह 24 लाख 42 हजार करोड़ था इस साल थोड़ा सा बढ़कर 27 लाख 87 हजार करोड़ हो पाया है। हालांकि बजट के इस मुख्य बिंदु की चर्चा कम है और मीडिया वित्तमंत्री के आकर्षक भाषण की ही ज्यादा बात करता नज़र आ रहा है।

कॉर्पोरेट टैक्स में छूट का और बढ़ना, राजस्व घाटा न बढ़ने देने, और निजी निवेश की योजनाओं जैसे कई पहलुओं पर मीडिया में बैठे प्रवक्ता सरकार की पीठ थपथपा रहे हैं। लेकिन कुल बजट में किस तबके के हिस्से में कितना प्रतिशत भाग आया? इसका विश्लेषण भी किया जाना चाहिए।

2019 के बजट में मुख्य रूप से गाँव और किसानों के लिए मौजूद मदों में सिर्फ प्रति माह हर परिवार को 500 रूपए देने की श्रमयोगी मानधन योजना में एक बड़ी रकम दिखाई दे रही है। ये अलग बात है कि यह इस बजट की देन नहीं है बल्कि पिछले अंतरिम बजट की जिम्मेदारी है।

बहरहाल इस किसान को जो सुनने को मिला है उसमें जीरो बजट फार्मिंग की बात, गांव-गरीब-किसान का नारा और शौचालय बिजली और एलपीजी सिलिंडर वाली योजनाओं का लाभार्थी बनना ही मुख्य हैं। सोचा जाना चाहिए कि क्या वाकई किसान यही चाह रहा था?

चुनाव से पहले किए गए सरकार के वायदे इस बजट में पहली नजर में तो कहीं नजर नहीं आ पा रहे हैं। अपने घोषणा पत्र में सरकार ने चुनाव से पहले वायदा किया था कि कृषि पर हर साल 5 लाख करोड़ खर्च किए जाएंगे। तब यह नहीं बताया गया था कि 5 लाख करोड़ अलग से खर्च किए जाएंगे या जो पहले से खर्च हो रहा है उसी को बढ़ा कर 5 लाख करोड़ तक ले जाया जाएगा।

बजट पेश होने के बाद लग रहा है कि पहले से जो खर्च हो रहा है उसी में थोड़ी सी बढ़ोतरी करके वायदा पूरा दिखाया जाएगा। वैसे आमतौर पर सरकारें बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और देश में इंफ्रास्ट्रक्चर आदि जैसे क्षेत्रों में किए खर्च को भी गांव के लिए किए खर्च में जोड़ के बता देती है। इस तरह गाँव पर किया खर्च अपने आप किसानों पर किया खर्च बता दिया जाता है। इस बार के बजट में इस हुनर का भी विश्लेषण होना चाहिए।

कई चुनावी वायदे भी पूरे होते नहीं दिखे

इस बजट में सरकार के ज्यादातर चुनावी वायदे भी पूरे होते नहीं दिख रहे हैं। इनमें वेयरहाउसिंग ग्रिड, बेहतर भण्डारण, कोल्ड स्टोरेज, कृषि बाजार, आर्गेनिक खेती को प्रोत्साहन, कृषि निर्यात में सुधार, अधूरी सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने जैसे कई वायदे शामिल हैं।

सूखे से जूझ रहे किसानों से सरकार ने वायदा किया था कि दिसम्बर तक अधूरी पड़ी सिंचाई परियोजनाएं पूरी कर दी जाएंगी। इन्हें पूरा करने के लिए बजट में स्पष्ट प्रावधान नहीं दिखता। आज वित्त मंत्री के भाषण को सुन कर लग रहा था कि किसानों के लिए इस बार के बजट में सरकार ने जो सोचा है वही सब किसान चाह रहे थे। लेकिन सरकार ने किसानों की असल जरुरत समझी हो वह इस बजट में नज़र नहीं आई।

क्या थी जरूरत

किसानों की हमेशा से सिर्फ एक बड़ी मांग रही है कि उसे उसके उत्पाद का वाजिब दाम मिल जाए। हाल ही में आए गाँव कनेक्शन के देशव्यापी सर्वेक्षण में भी यह बात निकल कर आई है कि उत्पाद का सही मूल्य ना मिलने के कारण कई किसानों का अब खेती से मन उचट गया है। खेती किसानी से अब गुजारे लायक आमदनी भी नहीं हो पा रही है। किसान इसका विकल्प ढूंढ रहे हैं। ऐसे में दो साल के अंदर देश के सभी किसानों की आय दोगनी करने का लक्ष्य व्यवहारिक नहीं लग रहा है।

कृषि बाजार नहीं दिख रहे

उत्पाद के वाजिब दाम के बाद अच्छे बाजारों की कमी भी किसान की एक बड़ी समस्या है। दो साल पहले सरकार ने इसे समझा जरूर था। सन् 2017-18 के बजट में 22,000 ग्रामीण हाट बनाने की योजना भी पेश की गई थी। पर उसके बाद उसकी चर्चा ही नहीं होती।

जब सरकार पांच साल की उपलब्धियों का जिक्र सालाना बजट में कर सकती है तो ग्रामीण हाट जैसी योजनाओं की समीक्षा भी होनी चाहिए।

बेरोज़गारों के लिए क्या है?

इसके आलावा पूरे देश की तरह ग्रामीण भारत की एक और बड़ी समस्या बेरोजगारी थी। आज बड़ी संख्या में ग्रामीण युवक युवतियां रोजगार की तलाश में या तो शहरों का रुख कर रहे हैं या थक हार कर पारिवारिक कृषि की और लौट रहे हैं।

ऐसे युवाओं को अपना काम धंधा शुरू करने के लिए कम ब्याज के कर्ज देने की बात इस बजट में है। कर्ज की सुविधा देश में कब नहीं थी। यानी यह इस बजट का नया आकर्षण नहीं कहा जा सकता। क्या यह भी नहीं सोचा जाना चाहिए कि गांव का युवा कौन सा उद्यम कर सकता है? अभी तो स्थिति यह है कि देश में जो लोग पहले से कोई काम धंधा कर रहे हैं वे ही मंदी की मार झेल रहे हैं।

बजट में रोजगार को स्किल डेवलपमेंट के मद में ही रखा गया है और इस मद में कौशल विकास के कार्यक्रम के तहत कई लाख और युवाओं को प्रशिक्षण देने का लक्ष्य तय कर लिया गया है। ऐसे में सरकारी नीतिकारों से पूछा जाना चाहिए कि इस कार्यक्रम के तहत जो युवा पहले प्रशिक्षित होकर निकले उनमें से कितने प्रतिशत को वह रोजगार दिलवा पाए हैं?

जिस देश में अच्छे कॉलेज से पढकर निकले डिग्री धारकों के लिए रोजगार मिलने में दिक्कत आ रही हो वहां कौशल विकास केंद्र का सर्टिफिकेट लिए नौकरी के आंकंक्षी युवा के लिए क्या मौके बनेंगे यह समझना मुश्किल नहीं है।

बजट का विश्लेषण करते समय और कई पहलुओं पर गौर किया जा सकता है। लेकिन अंत में बात प्राथमिकताओं पर आकर ही रुकेगी। आज हम 5 ट्रिलियन डॉलर यानी साढे तीन लाख सौ करोड़ रूपए की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य बना रहे हैं। ये कोई बड़ा लक्ष्य भी नहीं है। लेकिन इस लक्ष्य में एक बहुत बड़ा तबका पीछे छूटा जा रहा है।

हमने अपने लिए पूंजीवाद की जगह कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना इसलिए चुनी थी ताकि विकास की दौड़ में कमजोर वर्ग पीछे न छूट जाएं। रेलवे और कई उद्योग क्षेत्रों को अगर सरकार की निगरानी में रखा गया था तो इसमें नफे नुकसान से ज्यादा सभी तक बुनियादी सेवा का लाभ पहुँचाने का लक्ष्य शामिल था।

आज रेलवे के निजीकरण की ओर एक बड़े फैसले का इशारा कर दिया गया है। इसी तरह देश अर्थव्यवस्था का आकार बढाने के लिए कई बड़े बदलावों की ओर अग्रसर है। लेकिन भारत में एक बहुत बड़ी आबादी की प्राथमिकताएं विकास दर और विश्वगुरु बनने के लक्ष्य से काफी अलग हैं। अभी वह लोग जीवनयापन की लड़ाई लड़ रहे हैं। आजीविका लायक साधन जुटाने के रास्ते तलाश कर रहे हैं। बजट का आधार जब तक समतुल्य वितरण और ज्यादा जरूरतमंद तबके तक संसाधन पहुँचाना नहीं बनेगा तब तक कोई भी बजट दस्तावेज यह दावा नहीं कर सकता कि वह पूरे देश का बजट है।

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