उत्तराखंडः पिथौरागढ़ में किताबों और शिक्षकों के लिए धरना दे रहे छात्र

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ स्थित लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के छात्र कितााबों और शिक्षकों की संख्या बढ़ाने के लिए पिछले 22 दिनों से धरने पर बैठे हुए हैं।

Mo. AmilMo. Amil   8 July 2019 2:10 PM GMT

पिथौरागढ़ (उत्तराखंड)। जिस वक्त वित्त मंत्री निर्मला सीतरमण संसद में बजट पेश करते हुए देश के शिक्षण संस्थानों के सुधार के लिए 400 करोड़ रुपए खर्च करने की घोषणा रही थीं, उसी वक़्त संसद से करीब 500 किलोमीटर दूर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में छात्र और अभिभावक कॉलेज की लाइब्रेरी के लिए नई किताबों और पर्याप्त अध्यापकों की नियुक्ति के लिए प्रदर्शन कर रहे थे उत्तराखंड के पिथौरागढ़ स्थित लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के छात्र पिछले 22 दिनों से छात्रों और पुस्तकों की कमी की शिकायत को लेकर धरने पर बैठे हुए हैं।

पीएचडी की तैयारी में जुटे छात्र शिवम पांडे गांव कनेक्शन को बताते हैं कि "उत्तराखंड के पिथौरागढ़ स्थित लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में पिछले 22 दिनों से कॉलेज के छात्र धरने पर बैठे हुए हैं। 17 जून से धरने पर बैठे प्रदर्शनकारी छात्र गांधीवादी तरीके से पढ़ने के लिए पुस्तकें और पढ़ाने के लिए पर्याप्त टीचरों की मांग कर रहे हैं। कुमायूँ विश्वविद्यालय के इस दूसरे सबसे बड़े कॉलेज की लाइब्रेरी में नई पुस्तकों के साथ पर्याप्त शिक्षको की कमी है। वर्तमान में छात्र 90 के दशक की पुस्तकों से पढ़ रहे हैं तो वहीं शिक्षको की कमी से भी जूँझ रहे हैं।"

धरने पर बैठे राजनीतिक विज्ञान के छात्र मोहित कहते हैं "हमारे पास पर्याप्त पुस्तके नही हैं। हमे एक या दो ही पुस्तके मिल पाती हैं। इस बार हमें जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति की पुस्तक मिली है उसमें शीत अपवाद अपने चरम पर है। सोवियत संघ का विघटन हुआ ही नही है और बर्लिन की दीवार अभी गिरी नही है। मैं पिछले 3-4 साल से इसी स्थिति में पढ़ता आ रहा हूँ। मैं इस आंदोलन में इसलिए बैठा हूँ कि मेरा आने वाला भविष्य खराब न हो।"


बीएससी की छात्रा अंकिता महर कहती हैं कि "यह कॉलेज कुमायूँ यूनिवर्सिटी का दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा कॉलेज है। यहां पुस्तकों के अलावा शिक्षको की भी भारी कमी है। 40 से भी कम शिक्षक हैं जिससे न तो सही ढंग से क्लास लग पा रही हैं और न ही कोर्स कम्प्लीट हो पा रहे हैं। कई-कई विभाग तो ऐसे हैं, जिसमें एक या दो टीचर पूरे डिपार्टमेंट को संभाले हुए हैं। पुस्तकालय की हालत ऐसी है कि यहां पर 3 साल हो गए सेमेस्टर सिस्टम को लगे हुए लेकिन अभी तक सेमेस्टर सिस्टम की किताबें नहीं आई हैं। हम 90 के दशक की पुस्तकें पढ़ रहे हैं जो अधूरी हैं। कॉलेज में प्रयोगशाला की हालत इतनी खराब है कि विज्ञान जैसे विषय भी किताबी ज्ञान पर चल रहे हैं और अधिकतर छात्र-छात्राओं को किताबें भी उपलब्ध नहीं हो पातीं।"

आंदोलन कर रहे छात्रसंघ अध्यक्ष राकेश जोशी कहते हैं कि "हम नई किताबों और शिक्षकों की मांग कर रहे हैं लेकिन हमारी इस जायज मांग को पूरा नही किया जा रहा है। हम कैसे वही पुरानी किताबों से नई पढ़ाई कर सकते हैं।"


आंदोलनरत छात्रों की यह है मांगे

पिथौरागढ़ के लक्ष्मण सिंह महर महाविद्यालय में नई किताबों और पर्याप्त शिक्षको की मांग को लेकर 17 जून से छात्रों का धरना प्रदर्शन परीक्षाओं और बारिश के बीच भी अनवरत जारी है।

आंदोलनरत छात्र-छात्राओं की मांग है कि महाविद्यालय में पुस्तकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। महाविद्यालय में प्राध्यापकों के रिक्त पदों को तुरंत भरा जाए और नए पदों का भी सृजन हो। महाविद्यालय में अध्ययनरत शोधार्थियों को शोध सहायता दी जाए।

महाविद्यालय में एक सब–रजिस्ट्रार कार्यालय खोला जाए जिसके अभाव में छात्रों को डिग्री निकालने और अंकतालिका में त्रुटि जैसी छोटी समस्याओं के समाधान के लिए नैनीताल का चक्कर लगाना पड़ता है। आंदोलनरत युवाओं की यह भी मांग है कि कुलपति महोदय महाविद्यालय में आकर खुद इनकी समस्याओं का सुनें।

आंदोलन कर रहे पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष महेंद्र रावत कहते है कि "सीमान्त क्षेत्र के महाविद्यालय में मूलभूत सुविधाओं के अभाव के कारण अधिकतर छात्र बेहतर उच्च शिक्षा के लिए देहरादून या दिल्ली की और पलायन कर जाते हैं। इसलिए पुस्तक आंदोलन के साथ-साथ ही पिथौरागढ़ में विश्वविद्यालय बनाने की मांग को लेकर भी आंदोलन चल रहा है। शिक्षा के कारण हो रहे पलायन को दूर करने में एक पृथक विश्वविद्यालय की स्थापना सकारात्मक कदम होगी। राज्य सरकार को इस पर तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए।"


आंदोलनकारी छात्रों ने बना दिया धरनास्थल को कला और रचनात्मक मंच

किताबों और शिक्षकों की नियुक्ति की मांग कर रहे पिथौरागढ़ महाविद्यालय के आंदोलनकारी छात्र गांधीवादी तरीके से अपनी मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। इतना ही नही परीक्षा के बीच चल रहे इस आंदोलन में यह छात्र धरना स्थल पर अपनी पढ़ाई के साथ पोस्टर, कविताओं का पाठ कर रहे हैं, पेंटिंग के जरिए अपनी मांग को उठा रहे हैं। यही नही धरने पर बैठे सीनियर छात्र अपने जूनियर को धरना स्थल पर पढा भी रहे हैं।

धरने पर बैठीं एमए गृह विज्ञान की छात्रा चेतना पाटनी का कहना है कि "धरना स्थल अपने आप में एक रचनात्मक मंच होता है और हमारी कोशिश यही है कि धरने प्रदर्शन को एक कलात्मक रूप दिया जाए। इसलिए हम यहां अपनी पढ़ाई के साथ अपने हुनर का प्रदर्शन भी कर रहे हैं।"


निकाला मौन जुलूस, समर्थन में आने लगे अभिभावक व शहरवासी

पिथौरागढ़ महाविद्यालय में अपनी मांगों को लेकर धरना-प्रदर्शन कर रहे सैकड़ों छात्रों ने शहर में मौन जुलूस भी निकाला। हाथों में अपनी मांगों के पोस्टर लिए छात्रों के साथ उनके अभिभावक व शहर के लोग भी उनके साथ आ गए। उनके समर्थन में महिला संगठन भी सड़क पर उतर आईं हैं।

पीएचडी की तैयारी कर रहे छात्र शिवम पांडे कहते हैं कि "17 जून से छात्रों द्वारा किए जा रहे धरना प्रदर्शन की शुरुआत 10-15 छात्रों ने की थी और सेमेस्टर परीक्षाओं के बीच साथी धरने पर बैठे थे तो ज्यादा संख्या तो मुश्किल थी। धीरे-धीरे इस आंदोलन में छात्रों की संख्या बढ़ती गई। रेगुलर करीब 40 छात्र-छात्राएं इस धरने में बैठ रहे हैं। अभी मौन रैली निकली थी जिसमें करीब 250 छात्र साथी शामिल हुए थे। महिला अभिभावक भी अब आंदोलनकारी छात्रों की मांगों के समर्थन में आ गए हैं।"

अभिभावक लक्ष्मी जोशी कहती हैं कि "बच्चें अपने हक की मांग कर रहे हैं इसमें गलत क्या है। उनकी मांगों को पूरा किया जाना चाहिए। अगर छात्रों को पढ़ने के किताबें और पढ़ाने के लिए टीचर नही होंगे तो वह कैसे इस देश का भविष्य बनेंगे।"

महिला अभिभावक शीला का कहना है कि "बच्चे 22 दिनों से धरना दे रहे हैं, कुछ बच्चे बीमार भी हो गए हैं। अगर जल्द ही उनकी मांगें पूरी नही हुई तो पूरा शहर आंदोलन करेगा।"



नही सुन रहे उच्चाधिकारी से लेकर शिक्षा मंत्री

पिथौरागढ़ महाविद्यालय के छात्रों ने अपनी मांगों को उच्चाधिकारियों से लेकर प्रदेश के शिक्षा मंत्री तक ज्ञापन के माध्यम से अवगत कराया लेकिन उनकी मांगों को पूरा नही किया जा रहा है। यहां तक कि 17 जून को धरने पर बैठने से पहले एक अंतिम ज्ञापन जिलाधिकारी के माध्यम से कुलपति और शिक्षा मंत्रालय को भेजा गया जिसमें एक हफ्ते के भीतर जवाब न आने पर धरने पर बैठने की चेतावनी दी गयी थी। जवाब न आने पर छात्र-छात्राओं ने धरना शुरू कर दिया।

छात्रसंघ अध्यक्ष राकेश जोशी कहते हैं कि "हमने पहले भी इस मांग को शिक्षा मंत्री को ज्ञापन द्वारा बताया था। मैंने शिक्षकों और पुस्तकों की मांग को लेकर छात्रसंघ में चुनकर आने के तुरंत बाद ही 8 अक्टूबर 2018 को जिलाधिकारी कार्यालय के माध्यम से उच्च शिक्षा मंत्री को ज्ञापन दिया गया था जिसमें महाविद्यालय में शिक्षकों और पुस्तकों की पर्याप्त उपलब्धता के संदर्भ में बात रखी गयी थी परंतु उस पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। इस सम्बन्ध में 5 बार जिलाधिकारी कार्यालय के माध्यम से ज्ञापन भेजा जा चुका है और एक-एक बार नैनीताल जाकर कुलपति महोदय और उच्च शिक्षा निदेशालय से बात की गयी थी जिस पर कोई कार्यवाही न होने पर ही हमें परीक्षाओं के बीच भी धरने पर बैठने के लिए बाध्य होना पड़ा है।"

धरने प्रदर्शन में बैठे छात्रों का कहना है कि मांगो को लेकर एक दिन कलेक्ट्रेट परिसर में भी धरने पर बैठा गया परन्तु अधिकारियों द्वारा सुरक्षा कारणों से उन्हें हटा दिया गया और बात करने के नाम पर एडीएम द्वारा उन्हें 'सीजन' आने जैसे शब्द कहे गए और जिलाधिकारी द्वारा छात्रसंघ कार्यकारिणी भंग करने को कहा गया जिससे नाराज होकर छात्रों ने जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर काफी नारेबाजी भी हुई और छात्रों को हटाने के लिए कोतवाली से पुलिस तक बुलानी पड़ी।


फिलहाल यह है महाविद्यालय की स्थिति

छात्र शिवम पांडे कहते हैं कि "वर्तमान स्थिति पर नजर डाले तो महाविद्यालय में करीब 6900 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। इसमें पिथौरागढ़ जनपद के अलावा अल्मोड़ा और चम्पावत के छात्र भी शिक्षा हासिल कर रहे हैं। यही नही महाविद्यालय में नेपाली छात्र-छात्राओं की भी अच्छी तादाद है।

हैरत की बात यह है कि महाविद्यालय में 120 प्राध्यापकों के पद हैं, जिनमें से लगभग 3 दर्जन से अधिक पद रिक्त पड़े हैं। महाविद्यालय के पुस्तकालय में पुस्तकों का भारी अभाव है और जो पुस्तकें उपलब्ध भी हैं वो इतनी पुरानी हैं कि उनकी प्रासंगिकता खत्म हो गयी है।


बदहाल है पहाड़ी राज्य उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था

पिथौरागढ़ के महाविद्यालय में छात्र किताबों और शिक्षकों की मांग इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वह पढ़ना चाहते हैं। हालांकि उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था पर नजर डाले तो स्थिति काफी दयनीय है।

आंकड़ों पर गौर करें तो यहां शिक्षा के लिए बजट तो बढ़ाया गया लेकिन सुविधाएं शून्य ही रहीं। प्रदेश में साल 2001 में शिक्षा पर होने वाला खर्च 6.74 अरब रुपये था, जो अब 61 अरब तक पहुंच चुका है। हैरत की बात यह है कि बजट बढ़ने के बाद भी प्राथमिक शिक्षा में बच्चों की संख्या में 50 फीसद तक कमी आई है। इतना ही नहीं उच्च-प्राथमिक स्तर पर भी बच्चों की संख्या 67 हजार तक कम हो चुकी है।

वहीं साल 2014 में आई सालाना स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों के क्लास आठ तक के करीब 42 फीसदी बच्चे शब्द तक ठीक से नहीं पढ़ पाते। गणितीय आकलन से पता चला कि छठी, सातवीं, और आठवीं के बच्चे सामान्य जोड़-घटाना और गुणा-भाग तक करने में सक्षम नहीं हैं।


रिपोर्ट बताती है कि पहाड़ी इलाकों के कई स्कूल एक शिक्षक के भरोसे चल रहें हैं। तीस फीसदी स्कूलों में शौचालय नहीं है। 56 फीसदी में लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था नहीं है। 32 फीसदी स्कूलों में खेल के मैदान नहीं हैं। 30 फीसदी में पीने के पानी की व्यवस्था तक नहीं है। करीब 54 फीसदी विद्यालय चारदीवारी से वंचित हैं। इन सबके बीच पुस्कालय के बारे में तो सोचना भी बेकार है। केवल 37 फीसदी स्कूलों में यह सुविधा है।

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार शिक्षा के लिए राज्य के बजट में 2010-11 में 22 प्रतिशत राशि रखी गई थी। जो 18-19 में 19 प्रतिशत हो गया था। राज्य के 15 से 29 साल के 10 प्रतिशत लोग निरक्षर हैं। आज भी दो प्रतिशत स्कूलों में मिड डे मील पकाने के लिए रसोई नहीं है। 13 प्रतिशत स्कूलों में पीने का पानी, दो प्रतिशत स्कूलों में शौचालय, 18 प्रतिशत स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय नहीं है। इसी तरह 14 प्रतिशत स्कूलों में बिजली नहीं है और महज दस प्रतिशत स्कूलों में ही कंप्यूटर की सुविधा है।

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