Union Budget 2019: क्या ग्रामीण पेजयल योजना के लिए बजट बढ़ेगा?

Union Budget 2019: क्या ग्रामीण पेजयल योजना के लिए बजट बढ़ेगा?

ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए शुरु की गई राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल योजना के लिए जहां वर्ष 2014-15 में 9007.64 करोड़ रुपये जारी हुए थे, वो वर्ष 2018-19 में यह घटकर 5466.24 करोड़ रुपये हो गया। इसलिए ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट से काफी उम्मीदें हैं।

Manish Mishra

Manish Mishra   4 July 2019 8:57 AM GMT

लखनऊ। देश आज भयंकर जल संकट से जूझ रहा है, इससे निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाने की अपील की है।

लेकिन क्या आने वाले बजट में पेयजल को लेकर कुछ विशेष कदम उठाए जाएंगे? गाँवों में नल से पानी सप्लाई (पाइप्ड वाटर सप्लाई) के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल योजना के तहत जारी होने वाले बजट में क्या पिछले पांच सालों में हो रही कटौती को हटाकर क्या उसे बढ़ाया जाएगा?

सरकार का दावा था कि वर्ष 2020 तक वो 70 प्रतिशत ग्रामीणों तक नल से स्वच्छ पेयजल सप्लाई सुनिश्चित करेगी। लेकिन वर्ष 2017 तक मात्र 17 फीसदी ग्रामीण परिवारों तक ही नल से पानी की सप्लाई की जा सकी।

गुरूवार को बजट से ठीक पहले आए आर्थिक सर्वे में भविष्य में जल संकट की ओर गंभीर इशारा किया गया है। 2050 तक भारत में 'पानी की किल्लत' एक बड़ी समस्या होगी। सर्वे में कहा गया है कि सिंचाई जल पर तुरंत विचार करने की जरूरत है ताकि कृषि की उत्पादकता बढ़ सके।

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लोकसभा में सरकार ने माना भी कि राष्ट्रीय ग्रमीण पेयजल योजना के के लिए वर्ष 2014-15 में जो 9007.64 करोड़ रुपये जारी हुए थे उसके बाद वर्ष 2018-19 में यह घटकर 5466.24 करोड़ रुपये हो गया। मतलब पिछले पांच सालों में करीब इस योजना में 40 प्रतिशत बजट की कमी की गई।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण शुक्रवार को अपना पहला बजट पेश करेंगी, उम्मीद है कि ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की इस योजना के लिए आगामी बजट में धनराशि बढ़ा के ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने में तेजी आएगी।

वर्ष 2018 में आई नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत इतिहास में जल संकट के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। जबकि हर साल दो लाख लोग साफ पीने का पानी न मिलने से अपनी जान गंवा देते हैं। भारत के 60 करोड़ लोग इस समय इतिहास के सबसे बुरे जल संकट से जूझ रहे हैं।

गाँव कनेक्शन के 19 राज्यों में हुए सर्वे में यह बात सामने आई कि सिर्फ आठ प्रतिशत ग्रामीणों को पाइप लाइन से पेयजल की सप्लाई होती है। जबकि 35 फीसदी महिलाओं को पानी के लिए हर रोज आधा किमी की दूरी तय करनी पड़ती है।

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यही नहीं, गाँवों में पेयजल दूर-दूर से लाने के लिए बच्चों को भी स्कूल छोड़कर जाना पड़ता है। दस साल के मोहित को हर रोज स्कूल जाने में देर हो जाती है, उसको यह देर कोई खेलने की वजह से नहीं होती। मोहित की तरह दूसरे बच्चों का भी देर से स्कूल जाना मजबूरी है।

"हमें हर रोज एक किमी दूर से पानी लाना पड़ता है, जिस वजह से रोज स्कूल जाने में देर हो जाती है। यह काम दिन में दो बार करना पड़ता है," कई पीले बड़े-बड़े डिब्बों के बीच बैठे मध्य प्रदेश में विदिशा जिले के चकरघुनाथपुर गाँव में रहने वाले मोहित ने बताया।

"जहां तक लोगों के घरों तक पानी नहीं पहुंचने का सवाल है, तो भारत सरकार की बहुत ही महात्वकांक्षी योजना है 'नेशनल रुरल ड्रिंकिंग वाटर प्रोग्राम (राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल योजना)', जिसका लक्ष्य था कि 2020 तक देश के 70 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक पाइप वाटर सप्लाई पहुंचाना। लेकिन 2017 तक मात्र 17 प्रतिशत घरों में ही पाइप्ड ड्रिंकिग वाटर सप्लाई (नल से पेयजल की सप्लाई) हो पाई," वाटर ऐड इंडिया में प्रोग्राम एंड पॉलिसी के निदेशक अविनाश कुमार बताते हैं।

नीति आयोग की वर्ष 2018 में आई रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2020 तक दिल्ली और बंगलुरू जैसे भारत के 21 बड़े शहरों से भूजल गायब हो जाएगा। इससे करीब 10 करोड़ लोग प्रभावित होंगे। अगर पेयजल की मांग ऐसी ही रही तो वर्ष 2030 तक स्थिति और विकराल हो जाएगी। वर्ष 2050 तक भारत के सकल घरेलू उत्पाद में छह प्रतिशत तक की कमी आएगी।

एक तो पानी दूर से लाना, दूसरे उसकी गुणवत्ता सही न होने से लाखों परेशान होते हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 70 प्रतिशत पानी दूषित है और पेयजल स्वच्छता गुणांक की 122 देशों की सूची में भारत का स्थान 120वां है।

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"हमारी सबसे बड़ी समस्या है हम मैप नहीं करते कि कहां क्या समस्या है? योजना बनाने लगते हैं। पाइप से पानी कहां से लाएंगे, कैसे घरों तक पहुंचाया जाएगा। इन सभी पर अध्ययन करने की जरूरत है। जल संरक्षण के क्षेत्र में ईमानदारी से काम नहीं हो रहा है। हमारी पॉलिसी इन्वेस्टमेंट बेस्ड हो गई हैं, " ग्राउंड वाटर एक्शन ग्रुप के आरएस सिन्हा समझाते हैं।

आरएस सिन्हा आगे कहते हैं, "हम लोग पानी को मैनेज नहीं कर पा रहे, हमें देखना होगा कि भूजल नीचे जा रहा है तो उसे कैसे रिचार्ज करेंगे। हम यही नहीं कर पा रहे।"

वहीं, भारत में पानी के कुप्रबंधन को समझाते हुए अविनाश कुमार कहते हैं, "इससे बड़ा दु:खद पहलू क्या होगा कि द इकोनॉमिस्ट ने जल संकट को लेकर एक रिपोर्ट छापी जिसमें बढ़िया चीजों के लिए इजराइल से तुलना की गई थी और कुप्रबंधन के बारे में भारत को दिखाया गया।"

आगे कहते हैं, "एक केन्द्रीयकृत विजन के तहत हम स्थानीय स्रोतों को पकड़ने की कोशिश करते हैं। यहीं दिक्कत है, योजनाओं में स्थानीय स्रोतों को पकड़ना होगा," आगे कहते हैं, "इसमें समुदाय की भागीदारी को सुनिश्चित करना पड़ेगा, लोकल गवर्नेंस को शामिल करना पड़ेगा। ताकि पानी सचमुच लोगों तक पहुंच पाए।"

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इंडिया वाटर पोर्टल के अनुसार धरती पर कुल 14000 लाख घन किमी पानी है। इतने पानी से पूरी धरती पर 3000 किमी मोटी परत बन सकती है, पर कुल पानी का 2.7 प्रतिशत पानी ही शुद्ध है। इसका भी अधिकांश हिस्सा ध्रुवों पर जमा है। यह पानी उपयोग के लिए नहीं है। इस तरह से एक प्रतिशत से भी कम पानी हमें उपलब्ध है। यह नदियों, झीलों, कुँओं, तालाबों और भूमिगत भंडारों के रूप में है।

"जबसे होश संभाला है तब से पानी की ही दिक्कत रही है, कोई सरकार पानी के बारे में नहीं सोच रही। तीन किमी दूर से साइकिल से हम लोग पानी लाते हैं, जानवर पाल नहीं पा रहे, भैंस खरीद नहीं पा रहे। गर्मी के दिनों में तो पूरा घर पानी ढोने में ही लगा रहता है," मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के चकरघुनाथपुर गाँव के घनश्याम यादव कहते हैँ।

विदिशा से 350 किमी दूर मध्य प्रदेश के ही सतना जिले के कैमासन गाँव में रहने वाली मालती को ज़िंदगी की एक जंग हर रोज लड़नी होती है, उन्हें पानी लाने के लिए हर रोज एक किलोमीटर जाना और हैंडपंप पर लाइन लगाना पड़ता है।

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वर्ष 2012 में बनी जल नीति के अनुसार भारत में विश्व की 18 प्रतिशत जनसंख्या रहती है, जबकि महज 4 प्रतिशत उपयोग लायक पानी के स्रोत हैं। उसपे भी तुर्रा यह कि नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि नीति निर्धारकों के सामने बड़ा संकट यह है कि उनके पास कोई आंकड़ा ही नहीं है कि घरेलू कार्यों और उद्योगों में कितना पानी का उपयोग होता है।

जल संकट से सिर्फ भारत ही नहीं, पूरा विश्व जूझ रहा है। संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल विकास रिपोर्ट-2019 के अनुसार पूरी दुनिया में 1980 के बाद से हर साल पानी का उपयोग एक प्रतिशत बढ़ जाता है। जबकि वर्ष 2050 तक पूरी दुनिया में 20 से 30 प्रतिशत जब पानी की मांग मौजूदा उपयोग से बढ़ जाएगी।

दुनिया भर के दो बिलियन लोग पानी को लेकर तनाव में रहते हैं जबकि 4 बिलियन लोग साल में कम से कम एक महीने गंभीर पानी की समस्या का सामना करते हैं।

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