किसान मुक्ति यात्रा (भाग-6) : और एक दिन मेधा ताई के नाम

Prabhat SinghPrabhat Singh   2 Oct 2017 5:12 PM GMT

किसान मुक्ति यात्रा (भाग-6) : और एक दिन मेधा ताई के नामएक किसान के घर के बाहर लिखा स्लोगन।

जंतर-मंतर पर तमिलनाडु के किसानों के प्रदर्शन और मंदसौर कांड के बाद शुरू हुई किसान मुक्ति यात्रा, जो मध्यप्रदेश समेत 7 राज्यों में गई। उस यात्रा में देश कई राज्यों के 130 किसान संगठन और चिंतक शामिल हुए। किसानों की दशा और दिशा को समझने के लिए वरिष्ठ पत्रकार प्रभात सिंह इस यात्रा में शामिल हुए। एक फोटोग्राफर और पत्रकार के रूप में उनकी मध्य प्रदेश यात्रा का छठवां और अंतिम भाग

पहला भाग यहां पढ़ें-किसान मुक्ति यात्रा और एक फोटोग्राफर की डायरी (भाग-1)

दूसरा भाग यहां पढ़ें-

किसान मुक्ति यात्रा और एक फोटोग्राफर की डायरी (भाग-2)

तीसरा भाग- किसान मुक्ति यात्रा (भाग-3) : किसान नेताओं की गिरफ्तारी और अफीम की सब्जी

चौथा भाग- किसान मुक्ति यात्रा (भाग-4) : स्वागत में उड़ते फूल और सिलसिला नए तजुर्बात का

पांचवां भाग-किसान मुक्ति यात्रा (भाग-5) : महाराज से मुलाक़ात और इन्दौर में प्रवास

इंदौर में बीती वह रात शायद यात्रा के दौरान हुआ सबसे ख़राब तजुर्बा थी। सुबह जल्दी नहाकर बाहर निकल आया। हरीश को गाड़ी के पहियों में हवा भरवानी थी सो उसे साथ लेकर बाज़ार का रुख किया। बच्चे स्कूल के लिए निकल पड़े थे, दूध और नाश्ता जुटाने के लिए निकले लोगों के साथ ही पूजा-पाठ के निमित्त आवाजाही भी शुरू हो गई थी। टी-स्टॉल आबाद हो चुके थे। उनके खुल जाने की पहचान अब भट्टी से उठता धुआं तो रहा नहीं, गिलास लेकर या फिर अपनी बारी के इंतज़ार में खड़े लोग ही इस बात की तस्दीक़ हैं कि दिन शुरू हो चुका है। बाहर की ओर ऊंचाई पर रखे बड़े थाल में पोहे का पहाड़ दिखाई दिया। भूख जाग गई।

वहां रुके और चाय का आर्डर करने के साथ पोहा देने को कहा। इस यात्रा में अब तक जितनी जगह पोहा खाया है, चिउड़ा के अलावा पोहे की अन्य सामग्री भिन्न मिली और इस तरह ज़ायका भी अलग हुआ। कहीं नमकीन सेव या मूंगफली तो कहीं प्याज़ भी, यहां बूंदी डालकर मिला। हां, एक बदलाव यह हुआ है कि सड़क किनारे के इन ठिकानों पर ताज़े हरे पत्ते के दोने की जगहपोहा अब अख़बार के टुकड़ों में ही मिलता है। और चाय इतने छोटे गिलास में मिलती है कि एक गिलास से कभी तसल्ली नहीं हुई सो हरीश हवा डलवाने चला गया और मैं दूसरे गिलास का इंतज़ार करने लगा।

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शाम तक महाराष्ट्र में दाख़िल होना है और दिन में बड़वानी में रैली और सभा है। लगातार धूप में बने रहने का असर मालूम होने लगा था, काया की हरारत इसका एक लक्षण थी। सोचा कि लौटते ही दवा खाता हूं मगर लौटे तब तक कूच की तैयारी हो चुकी थी। सामने की गाड़ी में ड्राइविंग सीट पर बैठे सज्जन ने मिनरल वॉटर की बोतल में सत्तू घोल रखा था, मज़े से पीते हुए स्टीयरिंग संभाल रहे थे। उनकी समझदारी से रश्क हुआ।

सोचा कि आइंदा यह इंतज़ाम करके ही निकलेंगे। भूख नहीं लगेगी और धूप से बचाव भी होता रहेगा। शहर से बाहर निकलने से पहले कारवां गीतापुर चौराहे पर रुका। नेता गाड़ियों से बाहर निकलकर दाहिनी ओर लपके। वहां बाबा साहब की एक भव्य प्रतिमा थी। मेधा पाटकर और आनंद मोहन माथुर भी आ गए थे। बाबा साहब के बुत को मालाएं पहनाई गईं, इरादे पूरे करने का संकल्प लिया। बहुत सारी तस्वीरें खिंचीं। फिर हम लोग आगे बढ़ गए।

बाबा साहब की जन्मस्थली और बेनेट मस्जिद

महू हमारा अगला पड़ाव था। अहम् फौज़ी इदारा महू, जॉन मैल्कम का बसाया कैंटोनमेंट, बाबा साहब की जन्मस्थली महू। बरसों पहले सेना की ओर से अख़बारनवीसों के प्रशिक्षण के एक कार्यक्रम में महू जाना था मगर किसी वजह से नहीं जा सका। उन ख़ामोश और हरियाली से ढंकी सड़कों पर गुज़रते हुए सोच रहा था कि फौजी के तौर पर विंस्टन चर्चिल क्या सचमुच यहां रहा होगा? तब यह सब कैसा रहा होगा? हम जहां रुके, वहां दाईं ओर सफेद पत्थर के एक विशाल स्तूप की तरह बना जन्मस्थली स्मारक चमक रहा था।

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सामने ही डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की प्रतिमा थी और बाहर की ओर से एक शिला पर ‘भीम जन्मस्थली‘ लिखा हुआ था। रेलिंग पर एक बैनर बंधा हुआ था, बेरछा-हेमा फायरिंग रेंज विस्थापित संघर्ष समिति की ओर से लगाए गए इस बैनर पर भूमि अधिग्रहण के विस्थापितों की मांग बाबा साहब को संबोधित थी, जिसमें उनकी ज़मीनों के बदले दिए जाने वाले मुआवजे का मामला तीन दशकों से लम्बित होने और प्रधानमंत्री को इस मामले से अवगत कराकर मौलिक अधिकारों की रक्षा का आग्रह किया गया था। वहां नेताओं का स्वागत वगैरह होने लगा। मैं अपने मतलब की कुछ तस्वीरें बनाकर आसपास देखने निकल गया। थोड़ा ही आगेस्मारक की चहारदीवारी से स़टी हुई एक मस्जिद दिखाई दी। बाहर लोहे के गेट के ऊपर लगे एक छोटे बोर्ड पर नाम दर्ज था- बेनेट मस्जिद।

ख़ासतौर पर फौजियों के लिए बनाई गई मस्जिद। ख़ूब सारे बड़े और पुराने पेड़ों से घिरी छोटी सी मस्जिद। बस इसके अलावा देखने लायक़ कुछ नहीं मिला। किसान यात्रा के लिहाज़ तैनात पुलिस के लोग आसपास चहलक़दमी कर रहे थे। मुझे दवा लेने का ख़्याल आया तो लौट आया। क्रोसिन की एक गोली निकालकर खाने ही वाला था कि हापुड़ वाली टीम में से किसी ने आकर पूछा कि बुखार की दवा है?‘मुझे भी चाहिए’, मैंने एक टेबलेट निकालकर उनकी ओर बढ़ाई तो उन्होंने कहा चार और लोगों को बुखार है। मैंने पूरी स्ट्रिप उन्हें थमा दी मगर देवास में भरी दुपहरी की सभा का असर अब तक मालूम होने लगा।

गुलझरा के मंदिर में सभा औऱ नाश्ता भी

धामनोद के गुलझरा में अलबेला हनुमान मंदिर का परिसर सभा का अगला पड़ाव था. वी.एम.सिंह अब तक बुखार से इतने पस्त हो चुके थे कि गाड़ी से बाहर आने की स्थिति में थे। मेधा पाटकर का संदेश भी आया मगर वी.एम. निढाल पड़े थे। तब तक बाकी लोग अंदर जा चुके थे। किसान मुक्ति यात्रा के हरे झंडों के साथ ही इस बार तिरंगा भी लहराता दिखाई दे रहा था। याद पड़ा कि अब तो सावन में कांवड़ लेकर निकलने वाले शिवभक्त भी तिरंगा लेकर चलने लगे हैं। ये तो ख़ैर किसानों के हक़ की लड़ाई है। मंदिर में मुख्य द्वार के सामने पीपल का पुराना पेड़ था, जिसके काफी चौड़े तने को घेरकर बना सीमेंट का चबूतरा। तने पर लिपटे धागे और चबूतरे पर आसीन सिंदूर में रंगी कुछ शिलाएं और त्रिशूल। बाईं ओर शिव और हनुमान के मंदिर के बाहर शहीदों की तस्वीरों पर माला-फूल भेंट करने के बाद सभा शुरू हो गई।

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उस चबूतरे पर मेहमानों के लिए नाश्ता लग रहा था- समोसा, केला और चाय। भीड़भाड़ देखकर और भाषण-नारों की आवाज़ से आसपास के कुछ ऐसे लोग भी जुट आए, जिनकी दिलचस्पी सभा में हरगिज़ नहीं थी। वे सारे चबूतरे के आसपास मंडरा रहे थे। किसी ने केले के घार की तरफ हाथ बढ़ाया तो इंतज़ाम में लगे युवक ने टोका, “ये लोग बाहर से आए हैं। पहले इन्हें दे देने दो, फिर लेना।” वे रुक गए और वहीं चबूतरे पर एक ओर जमकर बैठ गए।

चाय के कप बड़ी सी ट्रे में रखकर भरे जा रहे थे। सभा में बैठे कुछ लोग भी उठकर इधर आ गए थे। केले खाकर छिलके वहीं चबूतरे पर रखे एक टब में फेंक रहे थे। पास के प्राइमरी स्कूल में बच्चे पढ़ रहे थे। कुछ शिक्षक कौतूहल से सभा की ओर टकटकी लगाए स्कूल की दीवार पर झुकी हुई थीं। वीरेंद्र ने चाय पी ली थी और उसकी ताऱीफ़ करते हुए एक कप मेरे लिए भी ले आए थे। चाय में चीनी थी और वह मेरे लिए नहीं थी मगर वीरेंद्र ने इतना इसरार किया कि पीनी पड़ी।

चबूतरे की ओर देखते हुए सोच रहा था कि किसी और समय में इस चबूतरे की पवित्रता का कितना ख़्याल रखा जाता होगा? पूजा के फूल, धूप-कपूर की महक की जगह केले के छिलके और समोसों की महक! कितनी ही जगहों पर हम अपनी सहूलियत के हिसाब से नियम गढ़ लेते हैं। मंदिर की दीवारों पर ए-फोर साइज़ के कुछ प्रिंट चिपके देखे। उन पर शादी-ब्याह की बुकिंग के लिए संपर्क करने का मशविरा और फोन नम्बर लिखे हुए थे। रास्ते में मिले मां दुर्गा सोडा एण्ड नमकीन सेंटर, मां नर्मदा एकेडमी, नर्मदा टी स्टॉल वाले बोर्ड आए थे। श्रद्धा का कारोबार से यह रिश्ता शायद इंसानी फितरत का हिस्सा है। सभा पूरी हो चुकी थी और नाश्ता भी। मेधा ताई वी.एम. का हालचाल पूछकर आगे की तरफ बढ़ चुकी थी। धामनोद के बाज़ार से गुज़रते हुए हम आगे बढ़ गए। बाद में खलघाट के बाज़ार में एक और नुक्कड़ सभा हुई।

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डूब गया तो कहां जाएंगे छोटा बड़दा के लोग

बड़वानी की अंजड़ तहसील में नर्मदा के किनारे बसा है, छोटा बड़दा गांव। अतीत में जलमार्ग से व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र रहा यह इलाका। किवदंति है कि अज्ञातवास के दिनों में पांडव यहां ठहरे थे। नर्मदा के किनारे अग्नेश्वर महादेव का एक पुराना मंदिर है। छह स्कूल और 17 पुराने मंदिरों के साथ एक मस्जिद भी है यहां। मछुआरे, कुम्हार और आदिवासियों की करीब चार हज़ार की आबादी वाला छोटा बड़दा सरदार सरोवर बांध के डूब क्षेत्र में है।

करीब सौ परिवार गांव छोड़कर जा भी चुके हैं। गांव के लोगों के सहयोग से बने अग्नेश्वर घाट के करीब ही हमारे लिए भोजन का इंतज़ाम था। बढ़िया बाटी, दाल, सब्ज़ी, भात, चटनी, सोंठ, सलाद और लड्डू और ख़ूब मेहमानवाज़ लोग। खाने के बाद घाट की तरफ चला गया, दाहिनीं ओर मंदिर और सामने नर्मदा का चौड़ा पाट, किनारे लगी कुछ छोटी नावें। मौसम में कितनी भी गर्मी हो, पानी को छूकर आती हवा का झोंका पसीने में भीगी देह को सिहरा देता है। आसपास ऊंचे-नीचे टीले थे और उन पर यहां-वहां खड़े खपरैल वाले घर। वह सब कुछ आंखों को भाने और मन को सुकून से भर देने वाला था। तुरंत ख्याल आया कि 31 जुलाई गांव खाली कर देने की डेडलाइन है।

यह घाट-मंदिर, ये टीले, ये घर कौन जाने पानी की कितनी गहराई में बिला जाएंगे। और इन घरों में रहने वाले? वे रहने कहां जाएंगे? बसाहट का जो सरकारी इंतज़ाम है, वह नाकाफी है। मछुआरों की रोज़ी जाएगी, किसानों की खेती भी। विकास का ख़ाका तैयार करने वाले लोगों को उजाड़ कर बसाने की जो योजना बनाते हैं, योजना को पूरा करने के जो दावे करते हैं वे सचमुच इंसानी नज़रिये के होते तो इन लोगों को भला क्या परेशानी होती? सुनील उमराव से सुने टिहरी बांध के इलाके वाले गांवों का ब्योरा याद आया और मन ही मन छोटा बड़दा की उन गांवों से तुलना करने लगा।

तब तक मेधा ताई आ गईं। वह इन गांवों को डूब से बचाने के लिए बरसों से लड़ रही हैं, रैलियां करती हैं, धरना देती हैं, ज्ञापन भेजती हैं, उपवास करती हैं, जेल जाती हैं। मगर पानी बढ़ने ही लगेगा, तब! तब क्या कर पाएंगी ताई और गांव के लोग? तय हुआ कि सब लोग इकट्ठे होकर जुलूस की शक्ल में लौटेंगे। बाहर आए तो चौक पर अपने घर के बाहर बैठेबाबूलाल मिल गए। उनके घर की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में दो बार लिखा हुआ था – ‘लड़ेंगे जीतेंगे।‘ कोई और समय होता तो शायद यह नारा उनमें भी जोश भरता मगर अभी तो वह थके से बैठे थे। पूछा तो मालूम हुआ कि वह और उनकी तरह के 70 और कुनबे सरकारी सर्वे में शामिल ही नहीं हैं। यानी सरकारी दस्तावेज़ के मुताबिक इस गांव में उनका कोई वजूद नहीं है। और इसका साफ मतलब यह है कि जिन लोगों के पुनर्वास का इंतज़ाम होना है, बाबूलाल और वे 70 परिवार उसके हक़दार नहीं। हम लौट रहे थे।

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खिड़की से बाहर दौड़ते खेतों में फसल को मुग्ध भाव से निहारते पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की टोली के लोग बतिया रहे थे, ‘लाइन में बुआई करने से फसल अच्छी होती है। बड़ी मेहनत करते हैं यहां के किसान। ज़मीन भी बहुत उपजाऊ है। अगर यहां पानी का बढ़िया इंतज़ाम हो जाए तो जाने क्या कर दें।’ मैं उनकी बातें सुन रहा था मगर ज़ेहन में कैलाश भाई राठौड़ की दुकान पर टंगा वह बोर्ड घूम रहा था, जो अभी गांव छोड़ते वक़्त दीखा था, ‘पेट्रोल उधार नई दुंगा।‘ मात्रा ग़लत थी मगर इस इबारत में संकल्प की जो सख्ती थी, वैसी ही गांव के लोगों में भी बन पाती तो कौन जाने कुछ बदल ही जाता।

राजा के हाते मे सब्ज़ी मंडी और सामने जनसभा

सतपुड़ा की पहाड़ियों से घिरा और नर्मदा के किनारे बसा बड़वानी शहर कभी बड़वानी रियासत की राजधानी हुआ करता था। बारिश के दिनों में इसकी ख़ूबसूरती से प्रभावित लोगों ने इसे ‘निमाड़ का पेरिस’कहा। बड़वानी ख़ास शक्ल और स्वाद वाले पपीतों के लिए भी जाना जाता है, जिसकी बानगी हम छोटा बड़दा जाते हुए रास्ते के बाज़ार में भी देख चुके थे। और जिसे देखते ही कुछ साथियों ने खरीदकर चखा भी था।

तो बड़वानी में दाख़िल होते ही हमें ‘लड़े हैं, जीते हैं ‘ और ‘ हर ज़ोर-जुल्म की टक्कर में..‘ वाले नारों की गूंज सुनाई दी। दूर तक लाइन बनाकर चलती महिलाओं के हाथ में कई तरह के बैनर और नर्मदा बचाओ आंदोलन की झंडियां थीं। कई महिलाएं एक बैनर लेकर सामने से गुज़रीं, जिस पर दर्ज़ ‘नर्मदा घाटी विनाश प्राधिकरण‘ उनकी तकलीफ़ और ग़ुस्से का गवाह था. इसी बीच एक प्रचलित नारे का नया वर्ज़न सुनाई दिया, ‘ जो हमसे टकराएगा, सीधा ऊपर जाएगा।‘ ये महिलाएं वर्षों से मेधा पाटकर के संघर्ष में उनके साथ रही हैं। सिर्फ नारे नहीं, अपने हक़ के लिए अपनी बात कहना सलीका भी उन्होंने सीख लिया है।

उस सख्त धूप में मेधा पाटकर के साथ ही पूर्व विधायक पारस सकलेचा भी पूरे जोश में नारे लगाते हुए उनके साथ निकले। बाक़ी के नेता आगे चल रहे थे। और उनसे भी आगे चल रहे प्रेस के फोटोग्राफर काफी बदहवास थे। कोई एड़ी पर उचककर कैमरा अपने सिर से ऊपर उठाकर फोटो खींच रहा था तो कोई पास की दुकान में बाहर रखा स्टूल उठा लाया ताकि उसकी तस्वीर में दूर तक भीड़ दिखाई दे सके। प्रेस फोटोग्राफी की ख़स्लत इन दिनों अख़बार-वख़बार से कहीं ज्यादा सड़कों पर देखने को मिल जाती है।

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अख़बारों में तो फोटो के लिए जगह ही नहीं बची है। बाज़ार में पान की दुकान पर खड़े एक शख़्स ने योगेंद्र यादव को देखा तो पत्ते पर कत्था लगाने में मशगूल दुकानदार को आवाज़ लगाकर देखने को कहा। ‘अरे, ये वही हैं न जो केजरीवाल के संग रहे? ‘, ‘कहां? वो तो कभी का पार्टी से निकाल दिए। अब अउर कामै क्या रह गया है? यही सब करेंगे।‘ पान लगवा रहे सज्जन की जिज्ञासा अभी ख़त्म नहीं हुई थी। इस बार मुझे लक्ष्य करके पूछा, ‘ये इतने सारे लोग, झंडा-पोस्टर, आना-जाना्र। काफी खर्चा होता होगा। नहीं! इतना पैसा कहां से लाते हैं लोग?‘ यह अर्थशास्त्र तो ख़ैर मुझे भी नहीं मालूम था और अगर मालूम भी होता तो उनके चेहरे की शरारत से अंदाज़ लगाया जा सकता था कि वह समझने के इरादे नहीं पूछ रहे थे।

नारे लगाती भीड़ के साथ चौक तक पहुंचे तो वहां एक बड़े तम्बू के एक सिरे पर मंच बना था। रैली में शामिल महिलाएं आकर बैठती गईं। कुछ नारों के साथ सभा शुरू हुई। मेधा नीचे महिलाओं के साथ बैठीं। हालांकि उनकी पीठ पर बंधी बेल्ट उनकी सेहत की गवाही देती थी मगर उन्होंने मंच के बजाय संगियों के साथ बैठना मुनासिब समझा।

नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथियों ने एक गीत सुनाया, ‘नर्मदा की घाटी में अब लड़ाई जारी है, चलो उठो, चलो उठो रोकना विनाश है..‘ कोई साज़-वाज़ नहीं, बस गाने की लय और तालियों के साथ कोरस ने मिलकर जबरदस्त समां बांध दिया। मंच पर बैठे नेता भी साथ देने लगे। मेहमानों को भेंट देने के लिए वे पपीते और केले लाए थे। भेंट में पपीता पाकर सांसद राजू शेट्टी ख़ासे विह्वल हो गए। अपने भाषण में उन्होंने बीस बरस पहले पपीता उगाने और बेचने का अपना तजुर्बा भी साझा किया। वी.एम.सिंह को मेधा ताई ने अपने किसी परिचित डॉक्टर के पास भेज दिया था, जहां डॉक्टर ने उन्हें फौरी तौर पर भर्ती कर लिया था।

धूप में चलने और पंडाल में गर्मी और उमस के मारे गला सूख रहा था। सभा ऐन बाज़ार के बीच ही थी। पास की दुकान से पानी की बोतल खरीदकर आगे चाय की दुकान में जाकर बैठ गया। पुराने ढब की उस दुकान में दीवारों पर कालिख और सामने के काउण्टर पर शीशे के मर्तबानों में नमकीन देखना किसी टाइम मशीन में सवार होने से कम नहीं था। मैंने झट से कोने की एक टेबिल पर कैमरा बैग रख दिया, जहां बैठकर बाहर की हलचल भी देखी जा सके. कुछ तस्वीरें बनाईं और दो गिलास तसल्लीबख़्श चाय पीकर बाहर आ गया।

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पंडाल के पीछे वाले हिस्से में एक बड़ा सा घेर था, जिसमें सब्ज़ी और फल बिकते दिखाई दिए। बहुत व्यवस्थित और साफ-सुथरी सब्ज़ी मंडी थी। एक चक्कर लगाकर बाहर निकलने को था कि एक दुकान पर खड़े लड़के ने इशारा करके रोक लिया। बाहर चल रही सभा के बारे में पूछा और बताया कि मंडी की वह जगह कभी निमाड़ के महाराजा रंजीत सिंह का हाता हुआ करती थी। फिर जंगलों के पीछे सड़क के उस पार दिखाई देती धूसर रंगों वाली ऊंची दीवारों की ओर इशारा करके बताया कि वह उनका महल है, जो कुछ वर्ष पहले बिक गया और अब किसी और की मिल्कियत है। दिन ढलने लगा था, बाज़ार में भीड़ बढ़ने लगी थी और सभा पूरी होने को थी। मध्य प्रदेश में किसान यात्रा का सफ़र पूरा हुआ। अब यहां कोई सौ किलोमीटर दूर लोणखेड़ा में पड़ाव है।

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