और ऐसा रहा मेरा छठ इन अमेरिका 

और ऐसा रहा मेरा छठ इन अमेरिका वर्जीनिया स्टेट के अलगोंकीयन पार्क में की गई छठ पूजा।

तपस्या चौबे

वर्जीनिया । छठ में इस बार घर न आने पर बहुत बुरा लग रहा था। वैसे तो बुरा हर साल लगता है पर इस साल ज्यादा मायूसी हुई। हुआ यूँ था कि हमलोग को दिवाली में ही घर आना था ।शतेश को छः साल हो गए यहां आए हुए, तो उसी के वीज़ा का कुछ पेपर आना था, जो समय से नहीं आ पाया। उसी ने घर आने की ख़ुशी का गुड़-गोबर कर दिया।

उधर मेरी माँ और मम्मी दोनों दुखी थीं। उन्होंने ने भी हमारे आने से पहले बहुत कुछ सोच रखा था। छोटे देवर के प्यार भरे तानों से मैं थक गई हूं, हर बार यही पूछते हैं :-ये जी कब आइएगा ? अबतक पेपर नहीं आया आपलोग का ।

पहले साल "टेक्सस "में तो दूर -दूर तक छठ की कोई ख़बर ना लगी। फिर" न्यू जर्सी "में ,बिहार -झारखंड समिति के कुछ लोग अपने घर पर करते थे। पर उनमें से किसी से बात नहीं हो पाई। तीसरे साल फिर से वहीं "जर्सी के प्रिन्स्टन "में ठंड में हम भी ठंडे पड़ गए। चौथे साल हमलोग "स्टैम्फ़र्ड" में और सत्यार्थ पेट में। सातवाँ महीना चल रहा था। छठ का पता किया तो कुछ नेपाली लोग ,किसी के प्राइवेट घर पर छठ कर रहे थे। स्टैम्फ़र्ड से दो-ढाई घंटे की दूरी पर। ऐसे में हमें जाना ठीक नहीं लगा।

इस बार हमलोग " वर्जीनिया स्टेट के अलगोंकीयन पार्क" मे शाम के अर्घ्य के लिए गए। हम लोग "डेलावेर "में रहते हैं। हमारे यहाँ से तीन घंटे की दूरी पर ये पार्क है। नौ साल पहले "पोटोमयक नदी "के किनारे अनीता सिंह ने छठ करना शुरू किया। फिर धीरे -धीरे उनके ही जानने वाले और लोग भी करने लगे। इस बार तो मुझे आठ नौ लोग अर्घ्य देते दिखे ।बाक़ी जनता देखने वाली थी, हमारी तरह।

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शुरू में हमें थोड़ा अटपटा लगा। सभी थे बिहार से पर कोई जानने वाला नहीं था। हमलोग छठ भी नहीँ किए थे। एक तरफ़ खड़े थे फिर एक दो लोग बात करने लगे। हमलोग फल ले गए थे। व्यवस्थापक रंजित जी ने हमारी बहुत मदद की। कुछ लोगों से मिलवा भी दिया, फल भी चढ़ गया।

कैसे मनाया विदेश में छठ

नदी के किनारे एक तांबे की लक्ष्मी जी की मूर्ति रखी गई थी। एक तरफ़ धो कर अर्घ्य के सूप और बास्केट रखने की जगह बनाई गई थी। साथ ही एक एल्यूमीनियम के बड़े से परात में छठी माई बनाई गईं थीं। उनके चारों तरफ़ लकड़ी का पटरा बिछा कर ऊपर से कम्बल बिछाया गया था। अर्घ्य के बाद सभी व्रती और दूसरी महिलाओं ने वहां बैठ कर छठ कथा सुनी और मंगल गीत गाए। कुछ कुर्सियां भी रखी गईं थीं। एक ज़नरेटर के सहारे कुछ लाइट -बल्ब लगाए गए थे।

रंजित ने बताया, "पिछले साल लोग ज़्यादा थे, ठंड भी ज़्यादा थी तो टेंट और समोसे चाय की भी व्यवस्था थी। ऐसे में भगदड़ हो गई थी, इसलिए इस साल चाय समोसा कट।"

वैसे सच में छठ जैसा पर्व कोई नहीं। प्रकृति की पूजा करते करते सब इंसान बन जाते हैं ।कोई छोटा-बड़ा, औरत-मर्द का भेद नहीं। देश-विदेश सब एक हो जाते हैं। एक भाई साहब ने भी अपनी पत्नी के साथ छठ किया था। दोनों मानो अर्धनरेश्वर लग रहे थे। महिलाएं अर्घ्य के पहले पीला सिंदूर लगा रही थीं, जो रह गईं वो भी दौड़ के सिंदूर लगवाने आईं।

पूजा के सारे सामान व्यव्स्थित।

अर्घ्य के कुछ देर बाद हमलोग डेलावेर निकलने लगे तो हमने उनसे पूछा कि क्या प्रसाद हमारे घर भेज सकतीं है। वो बोली बेटा इतनी दूर से आई हो रुक जाओ हमारे यहां। कल सुबह के अर्घ्य के साथ प्रसाद खा कर जाना।

मैंने कहा रुक जाती पर बच्चे का और अपना समान भी नहीं लाई। वो मुस्कुराते हुए बोली -बच्चा हमारे घर में है। उसकी चिंता मत करो। इधर शतेश की भी कुछ लोगों से जान पहचान हो गई थी। सब अपने यहां रुकने को कह रहे थे। सच में ऐसी आत्मीयता कम ही देखने को मिलती है। शायद इसलिए भी कि हम लोग इतनी दूर से गए थे। कुछ लोगों ने शतेश से नम्बर लिया और बोले प्रसाद कुरीयर करने की कोशिश करेंगें।

मज़े की बात तो ये रही इस बार पहली बार मुझे बेतिया का कोई मिला। एक बुज़ुर्ग चाची आईं थीं। पहली बार यहां छठ में थी। दूर खड़े अपने बेटे को ए बाबू, ए बाबू कहकर पुकार रहीं थीं। पर बेटा सुन नहीं पाया। मैंने पूछा -क्या हुआ चाची ? बेटे की ओर इशारा करके बुला देने को कहा। उनका बेटा पूजा के इंतज़ाम में लगा था। उन्हें कल रात को मालूम हुआ की, यहाँ छठ हो रहा है। बस वही तैयारी ठीक से नहीं हो पाई। ख़ैर चाची ने मेरा घर पूछा, बेतिया सुनकर गदगद हो गईं।

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विदेश में ऐसी रखी गईं छठी मइया।

बेटे को बताया पति को बताया, सबसे मिलवाया। सब मुझसे बेतिया के बारे में कई बाते पूछने लगे और शर्म की बात ये रही की मुझे इतना कुछ मालूम ना था। उनलोगों ने भी उनके यहां रुकने की ज़िद की। शतेश का अगले दिन ऑफ़िस और हमारा कुछ सामान साथ ना होना मजबूरी हो गई लौटने की। नम्बर अदलने-बदलने के बाद मैनें चाची को प्रणाम किया । वो मेरे बेटे सत्यार्थ का तो बार -बार बबुआ कह कर कान ढांकती रहीं। फिर सभी व्रती को भी प्रणाम कर हमलोग घर को चल दिए।

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